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POCSO एक्ट में फंसाने के लिए बेटी का इस्तेमाल ! इलाहाबाद HC ने डॉक्टर पति को किया बरी, रद्द की उम्रकैद

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने POCSO कानून के दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी करते हुए डॉक्टर पति को बरी कर दिया है. कोर्ट ने पाया कि संपत्ति विवाद में पत्नी ने मासूम बेटी को भड़काकर झूठा केस दर्ज कराया था. अदालत ने वाराणसी POCSO कोर्ट के उम्रकैद के फैसले को रद्द कर दिया.

POCSO एक्ट में फंसाने के लिए बेटी का इस्तेमाल ! इलाहाबाद HC ने डॉक्टर पति को किया बरी, रद्द की उम्रकैद

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बच्चों को यौन अपराधों से बचाने वाले पोक्सो (POCSO) कानून के दुरुपयोग पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए उत्तराखंड के एक सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर को अपनी ही नाबालिग बेटी से कथित रेप के संगीन आरोप से पूरी तरह बरी कर दिया है. हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने वाराणसी की विशेष पोक्सो कोर्ट द्वारा डॉक्टर और उनके भाई को दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया. डॉक्टर पिछले डेढ़ साल से भी अधिक समय से जेल में बंद थे. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि यह मामला पति-पत्नी के संपत्ति विवाद से जुड़ा था, जिसमें पत्नी ने बदला लेने के लिए अपनी ही मासूम बेटी को भड़काकर हथियार की तरह इस्तेमाल किया और झूठा केस दर्ज कराया.

संपत्ति विवाद से शुरू हुई थी रंजिश

यह पूरा मामला उत्तराखंड के रहने वाले डॉक्टर और उनकी पत्नी के बीच अस्पताल निर्माण व संपत्ति को लेकर शुरू हुए पारिवारिक विवाद से जुड़ा है. रंजिश के चलते पत्नी ने साल 2018 में वाराणसी में अपने पति और जेठ के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी.

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जब बेटी अपने पिता के साथ उत्तराखंड गई थी, तब वहां उसका यौन उत्पीड़न किया गया था. इसी मामले में वाराणसी की विशेष पोक्सो अदालत ने 2025 में सुनवाई करते हुए डॉक्टर और उनके भाई को दोषी माना था और उम्रकैद की सजा सुना दी थी.

इस फैसले के खिलाफ डॉक्टर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

FIR में दो महीने की देरी और झूठी कहानी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने मामले की गहराई से समीक्षा की तो कानूनी पहलुओं और सबूतों के आधार पर पूरी कहानी मनगढ़ंत निकली. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि घटना के तथाकथित आरोप और एफआईआर दर्ज कराने के बीच दो महीने की अकारण देरी की गई थी. पत्नी का दावा था कि उसने परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए शिकायत में देरी की, लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह देरी परिवार का सम्मान बचाने के लिए नहीं, बल्कि पति को पूरी तरह कानून के शिकंजे में फंसाने की सोची-समझी साजिश का हिस्सा थी.

सिखाई-पढ़ाई गवाही पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

अदालत ने बच्चे के बयान की बारीकी से जांच करते हुए एक बेहद अहम बात कही. हाईकोर्ट ने माना कि आमतौर पर समाज में यही धारणा है कि बच्चे हमेशा सच बोलते हैं. लेकिन इस मामले में स्थिति अलग थी. जब माता-पिता के बीच कड़वाहट होती है और उनमें से कोई एक बच्चे के मन में दूसरे के प्रति लगातार नफरत भरता रहता है, तो बच्चा धीरे-धीरे उसी झूठी बात को सच मानने लगता है जो उसे सिखाई-पढ़ाई जाती है.

इसी बात को परखने के लिए कोर्ट ने पिता और बेटी की कुछ पुरानी तस्वीरें देखीं. तस्वीरों में बच्ची अपने पिता के साथ बेहद खुश, सहज और उनसे लिपटती हुई नजर आ रही थी. इन तस्वीरों से यह साफ हो गया कि दोनों के बीच गहरा प्यार था, जिसने मां द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों और बच्ची की सिखाई गई गवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.

बाद में कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उत्पीड़न की बात पूरी तरह गलत है.
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हाईकोर्ट ने दिए तुरंत रिहाई के आदेश

जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने साफ किया है कि जब माता-पिता के आपसी झगड़े में बच्चे को मोहरा बनाया जाए, तो अदालत को बच्चे की गवाही की गहन जांच करनी चाहिए. केवल सिखाई गई गवाही के आधार पर किसी व्यक्ति को जीवनभर के लिए जेल नहीं भेजा जा सकता. पोक्सो कानून के ऐसे दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने वाराणसी की स्पेशल कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया और जेल में बंद डॉक्टर व उनके भाई को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया.
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