अगर आपको लगता है कि आजकल के बच्चे पढ़ाई में कमजोर हो रहे हैं, तो आप गलत नहीं हैं. OECD की ताजा PISA 2025 रिपोर्ट ने इस बात पर मुहर लगा दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर के 23 देशों में 15 साल के छात्रों का परफॉर्मेंस पिछले 10 साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है.
ये टेस्ट मैथ्स, साइंस और रीडिंग तीनों में छात्रों की क्षमता को परखता है और तीनों ही सब्जेक्ट में बच्चे पहले से खराब कर रहे हैं. सबसे बड़ी गिरावट कोविड महामारी के बाद देखी गई है.
कितना नीचे गिरा ग्राफ?
आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर साफ हो जाती है. 2006 में जहां मैथ्स में औसत स्कोर 501 था, वो 2025 में लुढ़क कर 469 पर आ गया. ऐसा ही हाल रीडिंग का भी है, 495 से गिरकर 466 रह गया है. साइंस में भी 503 से 486 पर आ गया है. 2000 के आखिर तक और 2010 की शुरुआत में स्कोर लगभग स्थिर था, लेकिन पिछले कुछ सालों में लगातार गिरावट आ रही है.

मोबाइल चला तो नंबर घटा
रिपोर्ट की सबसे चौंकाने वाली बात स्क्रीन टाइम को लेकर है. पता चला है कि जो बच्चे दिन में सिर्फ 1 घंटे मोबाइल या लैपटॉप चलाते हैं, उनका साइंस में स्कोर सबसे ज्यादा 507 है.
जैसे-जैसे स्क्रीन टाइम बढ़ा, नंबर घटते गए. 2 घंटे से ज्यादा डिवाइस चलाने वालों का औसत स्कोर 482 रहा, वहीं जो बच्चे 5 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं, उनका स्कोर सबसे कम सिर्फ 434 रह गया.

दिलचस्प बात ये है कि जिन्होंने बिल्कुल भी डिवाइस यूज नहीं किया, उनका स्कोर 499 रहा. मतलब साफ है, थोड़ा इस्तेमाल ठीक है लेकिन दिनभर मोबाइल में घुसे रहना पढ़ाई के लिए खतरनाक है.
हालांकि रिपोर्ट ये भी कहती है कि सिर्फ मोबाइल ही इसकी वजह नहीं है, लेकिन ज्यादा स्क्रीन टाइम और खराब परफॉर्मेंस के बीच कनेक्शन जरूर है.
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