- इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने 2013 में नियुक्त जनरल कैटेगरी के जूनियर इंजीनियरों की नौकरी फिर बहाल की
- अदालत ने कहा कि अधिकारियों की गलतियों की सजा बेकसूर कर्मचारियों को नहीं दी जा सकती
- कोर्ट ने आरक्षण नीति को सही और कानूनी तरीके से लागू किए जाने पर जोर देते हुए गड़बड़ी सुधारने का तरीका बताया
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने शुक्रवार को यूपी जल निगम द्वारा 2013 में भर्ती किए गए जनरल कैटेगरी के दो दर्जन से ज्यादा जूनियर इंजीनियरों को नौकरी से हटाने का फैसला रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में अधिकारियों की गलतियों की सजा बेकसूर कर्मचारियों को नहीं दी जा सकती.जस्टिस इरशाद अली ने जूनियर इंजीनियर राकेश प्रताप सिंह और 25 अन्य जूनियर इंजीनियरों की अलग-अलग याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए कहा कि इन कर्मचारियों को कंपीटेंट अथॉरिट ने स्वीकृत पदों पर रेगुलर सिलेक्शन प्रोसेस के तहत नियुक्त किया था. उन पर धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने या हेरफेर करने का कोई आरोप नहीं था.
आरक्षण को ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए
अदालत ने कहा कि रिजर्वेशन पॉलिसी लागू करना जरूरी है. लेकिन अधिकारी रिजर्वेशन से जुड़ी गड़बड़ियों को ठीक करने के नाम पर ऐसा तरीका नहीं अपना सकते जो कानून और मूल सिलेक्शन प्रोसेस के खिलाफ हो. कानूनी आरक्षण को ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए, इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता. हालांकि, आरक्षण का कार्यान्वयन खुद कानूनी नियमों के मुताबिक होना चाहिए.
हाई कोर्ट की बेंच ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के 28 जनवरी, 2014 के आदेश को भी रद्द कर दिया.क्योंकि वह आदेश अधिकार क्षेत्र के बिना जारी किया गया था. कोर्ट ने कहा कि बिना कानूनी आधार जारी आदेश के आधार पर की गई बाद की प्रशासनिक कार्रवाई को स्वतंत्र रूप से बरकरार नहीं रखा जा सकता.
जूनियर इंजीनियरों के 470 पदों पर भर्ती से जुड़ा मामला
बता दें कि यह मामला 2013 में जल निगम द्वारा जूनियर इंजीनियरों के 470 पदों पर भर्ती से जुड़ा है. चयन प्रक्रिया शुरू में कैटेगरी के तहत की गई थी. बाद में आरक्षित श्रेणियों के कुछ उम्मीदवारों के चयन को लेकर आपत्तियां उठाई गईं. उत्तर प्रदेश जल निगम के प्रबंध निदेशक ने 7 जनवरी, 2014 को कथित अनियमितताओं की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया.
याचिकाकर्ताओं के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता उपेंद्र नाथ मिश्र ने तर्क दिया कि समिति ने 15 जनवरी, 2014 की अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि आरक्षित श्रेणी के छूटे हुए अतिरिक्त योग्य उम्मीदवारों को दूसरे चरण में उपलब्ध 469 रिक्तियों के खिलाफ समायोजित किया जाए. समिति ने विशेष रूप से यह भी सिफारिश की थी कि पहले से चयनित किसी भी सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को सेवा से न हटाया जाए.
73 जूनियर इंजीनियरों को नौकरी से किया था बर्खास्त
अधिकारियों ने आरक्षित श्रेणी के अतिरिक्त उम्मीदवारों को समायोजित करने की सिफारिश मान ली. इसके बाद, 136 अतिरिक्त SC/OBC उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया, जिससे मूल 470 पदों के मुकाबले कुल नियुक्तियों की संख्या 543 हो गई.उपेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि उन्हें उपलब्ध रिक्तियों के विरुद्ध समायोजित किया गया था. हालांकि, 2 दिसंबर 2014 को राकेश प्रताप सिंह समेत सामान्य श्रेणी के 73 जूनियर इंजीनियरों की सेवाएं खत्म कर दी गईं. कर्मचारी हाई कोर्ट गए. अदालत ने 18 दिसंबर 2014 को बर्खास्तगी के आदेश रद्द कर यूपी जल निगम को मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया.
कोर्ट ने अपने नवीनतम फैसले में कहा कि 18 दिसंबर 2014 के आदेश को किसी हाई कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई थी और इसलिए यह जल निगम पर बाध्यकारी था. इसके बावजूद, अधिकारियों ने पहले के न्यायिक निर्देशों के विपरीत कार्रवाई की.
'नौकरी से निकालना ही एकमात्र विकल्प नहीं था'
कोर्ट ने बाद की कार्यवाही के तरीके की आलोचना करते हुए कहा कि कारण बताओ नोटिस से ही पता चलता था कि बर्खास्तगी अपरिहार्य हो गई थी. याचिकाकर्ताओं ने श्रेणी-वार चयन प्रक्रिया, आरक्षण प्रावधानों की प्रयोज्यता, पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकार क्षेत्र, रिक्तियों की उपलब्धता और पहले के हाई कोर्ट के आदेश के संबंध में कई महत्वपूर्ण आपत्तियां उठाई थीं.
अदालत ने कहा कि 'कारण बताओ नोटिस'को महज एक औपचारिकता नहीं माना जा सकता. समर्थ अधिकारी को कर्मचारी के जवाब पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और उठाए गए अहम आपत्तियों पर ध्यान देना चाहिए.जल निगम के इस तर्क को खारिज करते हुए कि नौकरी से निकालना ही एकमात्र विकल्प था, कोर्ट ने कहा कि आरक्षित श्रेणी के अतिरिक्त उम्मीदवारों को उपलब्ध रिक्तियों पर समायोजित किया जा सकता था, और असल में ऐसा किया भी गया था. इसलिए, कोर्ट ने कहा कि पहले से नियुक्त सामान्य श्रेणी के कर्मचारियों को हटाना जरूरी नहीं था.
4 मई, 2015 के बर्खास्तगी के आदेश रद्द
अदालत ने आगे कहा कि वित्तीय कठिनाइयों के आधार पर ऐसे आदेश को सही नहीं ठहराया जा सकता जो अधिकार क्षेत्र से बाहर हो, मनमाना हो, या कानूनी प्रावधानों और बाध्यकारी न्यायिक निर्देशों के खिलाफ हो.कोर्ट ने 14 मई, 2015 के बर्खास्तगी आदेशों को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को सेवा में बने रहने की अनुमति दी जाए. वे अपनी नियुक्ति की मूल तिथि, यानी 21 अक्टूबर, 2013 से निरंतर सेवा का लाभ पाने के भी हकदार होंगे.
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