- सुप्रीम कोर्ट ने एक पूर्व जिला जज की याचिका पर सुनवाई के दौरान की टिप्पणी
- शीर्ष अदालत ने कहा कि चाहे चपरासी हो या मुख्य सचिव सब कानून की नजर में बराबर
- कोर्ट ने पूर्व जज की याचिका पर कहा कि वो अन्य याचिकाकर्ताओं के साथ अन्याय नहीं कर सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून की नजर में सब बराबर हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित पूर्व जिला जज की सेवा से कथित अवैध बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका पर प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई कराने का निर्देश देने से इनकार करते हुए शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी की. पीठ ने कहा कि चाहे वह बस का चपरासी हो या राज्य का प्रमुख सचिव, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हर व्यक्ति को न्याय तक समान पहुंच का अधिकार है.
कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक समानता के इस क्षेत्र में वह व्यक्तिगत आधार पर किसी के लिए अलग व्यवस्था नहीं कर सकता है. पूर्व जिला जज की ओर से दलील दी गई कि उनकी याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है और अदालत में मामलों का भारी बोझ होने के कारण सुनवाई में काफी समय लग रहा है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हाईकोर्ट को इस मामले की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई का निर्देश दिया जाता है तो यह उन दूसरे वादियों के साथ अन्याय होगा जो अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं.
पीठ ने शुरुआत में संकेत दिया था कि मामले पर CJI की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष आगे विचार किया जा सकता है, लेकिन CJI आज अदालत में नहीं बैठे थे. याचिकाकर्ता के वकील द्वारा शीघ्र राहत पर जोर दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. जस्टिस बागची ने कहा कि आप जिस आदेश की मांग कर रहे हैं, वह हमारे सामने मौजूद याचिकाओं के लिए उचित होगा, लेकिन उन असंख्य याचिकाकर्ताओं के लिए अनुचित होगा जो हमारे सामने नहीं हैं. इसलिए हम ऐसा आदेश पारित नहीं करेंगे.
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि देरी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने से उन अन्य याचिकाकर्ताओं के साथ अनुचित व्यवहार होगा, जो अपने मामलों की सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं. इसलिए याचिकाकर्ता को उचित अदालत के समक्ष अपनी याचिका आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले का निपटारा कर दिया. जस्टिस बागची ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले की शीघ्र सुनवाई का निर्देश तभी दिया जा सकता है जब हाईकोर्ट की ओर से गंभीर चूक, अनुचित कार्रवाई या बेईमानीपूर्ण बयान जैसी असाधारण परिस्थितियां सामने हों, उन्होंने कहा कि केवल यह तथ्य कि याचिकाकर्ता पूर्व न्यायिक अधिकारी हैं, उन्हें अन्य नागरिकों से अलग व्यवहार का आधार नहीं बन सकता.
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