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यूपी के गुंडा एक्ट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का सवाल- परेशान करने का क्यों बन रहा हथियार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोंडा डीएम के ऑर्डर पर कठोर टिप्पणी की है. जाहिद अली पर 16 साल पुराने मामलों को लेकर गुंडा एक्ट लगाया गया था. 2010 के मामले में बरी होने के बावजूद जाहिद पर गुंडा एक्ट लगा, जिस पर कोर्ट ने टिप्पणी की है.

यूपी के गुंडा एक्ट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का सवाल- परेशान करने का क्यों बन रहा हथियार
गुंडा एक्ट के 'गलत उपयोग' पर इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त टिप्पणी (File Photo)
  • इलाहाबाद HC ने कहा- राज्य सरकार लोगों को परेशान करने पर आमादा लगती है.
  • हाई कोर्ट ने कहा कि गुंडा एक्ट ताकतवर कानून है, इसका इस्तेमाल सावधानी से होना चाहिए.
  • गोंडा DM ने जाहिद अली नाम के शख्स को 6 महीने जिलाबदर किया था.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में 'गुंडा एक्ट' के कथित गलत इस्तेमाल को लेकर कड़ी आलोचना की है. कोर्ट ने कहा कि उसके सामने आए मामलों से ऐसा लगता है कि राज्य सरकार इस कड़े कानून का इस्तेमाल करके लोगों को परेशान करने पर आमादा है. लखनऊ बेंच के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा कि 'गुंडा एक्ट' एक 'बहुत ताकतवर' कानून है और इसका इस्तेमाल बहुत सावधानी से, सिर्फ साफ मामलों में और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ही किया जाना चाहिए.

कोर्ट ने यह टिप्पणी जाहिद अली को 'गुंडा' घोषित करने और छह महीने के लिए जिले से बाहर निकालने के गोंडा जिला मजिस्ट्रेट (DM) के आदेश को रद्द करते हुए की है.

कोर्ट ने डिविजनल कमिश्नर के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें DM के फैसले को सही ठहराया गया था.

क्या है पूरा मामला?

गोंडा के डीएम ने 11 मई, 2026 को गुंडा एक्ट की धारा 3(1) के तहत आदेश जारी किया था. यह आदेश दो आपराधिक मामलों और एक बीट सूचना रिपोर्ट के आधार पर दिया गया था. इनमें से एक आपराधिक मामला 2010 का था और दूसरा 2020 से जुड़ा था.

हाई कोर्ट ने पाया कि जाहिद अली को 26 अगस्त, 2017 को गोंडा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 2010 वाले मामले में पहले ही बरी कर दिया था. कोर्ट ने कहा कि जिस मामले में किसी शख्स को पहले ही बरी किया जा चुका हो, उसे बाद में उसे 'गुंडा' घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता.

कोर्ट ने पाया कि 2020 के आपराधिक मामले और अली को 'गुंडा' घोषित करने वाले 2026 के आदेश के बीच करीब छह साल का अंतर था. कोर्ट ने कहा कि इन दोनों के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं दिखाया जा सकता.

हाई कोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट में उस मामले का जिक्र करने पर भी आपत्ति जताई, जिसमें अली पहले ही बरी हो चुके थे. अदालत ने कहा कि इससे पता चलता है कि DM के सामने याचिकाकर्ता की गलत तस्वीर पेश की गई थी.

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कोर्ट ने कहा कि 2020 के सिर्फ एक आपराधिक मामले में शामिल होने से यह साबित नहीं होता कि अली आदतन अपराधी था या आदतन अपराध करता था या अपराध के लिए उकसाता था.

बेंच ने 'बीट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट' को 'गुंडा एक्ट' लागू करने का सही आधार मानने से भी इनकार कर दिया. उस जानकारी के आधार पर न तो कोई आपराधिक मामला दर्ज किया गया था और न ही अली को उस मामले में अपनी बात रखने का मौका दिया गया था. कोर्ट ने कहा कि ऐसी जानकारी पर भरोसा करना 'नैचुरल जस्टिस' (प्राकृतिक न्याय) के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा.

कोर्ट ने यह भी पाया कि गोंडा कमिश्नर ने बरी किए जा चुके मामले को जाहिद अली के खिलाफ लंबित मामला माना, जो सही तरीके से अपने विवेक का इस्तेमाल न कर पाने को दिखाता है.

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