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VIDEO: पोती गोल्ड जीतकर लौटी तो दर्द भूलकर नाची दादी, बहन ने गिफ्ट किए जूते, उमड़ पड़ा पूरा गांव

'लड़की है, क्या करेगी?' जैसे ताने सुनने के बावजूद परिवार ने खुशी राणा का साथ नहीं छोड़ा और बेटी ने गोल्ड मेडल जीतकर उस भरोसे को सही साबित कर दिया. गोल्ड जीतकर गांव पहुंची खुशी का ऐसा स्वागत हुआ कि पैरों के दर्द से परेशान दादी भी डीजे पर झूम उठीं और पूरा गांव जश्न में डूब गया.

VIDEO: पोती गोल्ड जीतकर लौटी तो दर्द भूलकर नाची दादी, बहन ने गिफ्ट किए जूते, उमड़ पड़ा पूरा गांव
Khushi Rana Gold Medal Winner
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'लड़की है, क्या करेगी?'... यह ताना हरियाणा की बेटी खुशी राणा के परिवार ने कई बार सुना. लेकिन परिवार ने भरोसा नहीं छोड़ा और बेटी ने भी मेहनत का दामन नहीं थामा. नतीजा यह रहा कि आज वही बेटी गोल्ड मेडल जीतकर गांव लौटी तो स्वागत में पूरा गांव उमड़ पड़ा और घर की दहलीज से लेकर चौपाल तक जश्न का माहौल बन गया. गांव की गलियों में ढोल बज रहे थे, डीजे पर दादी दर्द भूलकर नाच रही थीं और फूलों से सजी एक बेटी लोगों का अभिवादन स्वीकार कर रही थी.

दरअसल, हरिद्वार से गोल्ड मेडल जीतकर लौटी खुशी राणा का स्वागत किसी चैंपियन की तरह हुआ. एक इंटरव्यू में खुशी की दादी मूर्ति देवी ने बताया कि उनके पैरों में दर्द रहता है और ठीक से खड़ा होना भी मुश्किल होता है, लेकिन जैसे ही पोती गोल्ड मेडल जीतकर गांव पहुंची, वह सारी तकलीफ भूल गईं और स्वागत समारोह में डीजे की धुन पर खुलकर नाचीं.

बेटी के लिए पिता ने नहीं सुनी किसी की बात

A to Z Fast News को दिए इंटरव्यू में खुशी के पिता सुनील कुमार ने बताया कि जब उन्होंने बेटी को खेल के लिए बाहर भेजा तो कई लोगों ने सवाल उठाए. लोगों ने कहा कि लड़की को इतनी आजादी क्यों दे रहे हो, लेकिन परिवार ने समाज की बातों को नजरअंदाज कर बेटी का साथ दिया और आज वही फैसला सफलता की वजह बना.

गोल्ड जीतते ही सबसे पहले याद आई मां-पिता की मेहनत

खुशी ने बताया कि गोल्ड मेडल जीतने के बाद उनके मन में सबसे पहला ख्याल अपने माता-पिता का आया. उन्हें खुशी इस बात की थी कि परिवार ने उन पर जो भरोसा जताया और मेहनत की, उसे उन्होंने बेकार नहीं जाने दिया. खुशी ने बताया कि कई बार लोगों ने परिवार को उसे खेल छोड़ने की सलाह दी, लेकिन माता-पिता, चाचा और चाची हमेशा उसके साथ खड़े रहे. परिवार का यही भरोसा उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहा.

अब एशियन गोल्ड पर नजर

खुशी ने खुलासा किया कि 12 साल की उम्र में 'दंगल' फिल्म देखने के बाद उनके मन में पहलवान बनने का सपना पैदा हुआ. गीता और बबीता फोगाट से प्रेरित होकर उन्होंने कुश्ती की राह चुनी और अब एशियाई चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने का लक्ष्य रखा है. खुशी के पिता ने कहा कि हर माता-पिता को अपने बच्चों को खेलों में मौका देना चाहिए. उनके मुताबिक खेल बच्चों का भविष्य संवारने के साथ-साथ उन्हें नशे जैसी बुराइयों से भी दूर रखते हैं.

गांव में जिस दिन गोल्ड पहुंचा, दादी को भूख तक नहीं लगी

दादी ने मुस्कुराते हुए बताया कि पोती की जीत की खुशी इतनी ज्यादा थी कि उन्हें खाने-पीने तक का ध्यान नहीं रहा. पूरे दिन उत्साह में डूबी रहीं और बार-बार पोती की उपलब्धि का जिक्र करती रहीं. पिता ने बताया कि कई लोगों को भरोसा नहीं था कि उनकी बेटी खेल में आगे बढ़ पाएगी, लेकिन खुशी ने गोल्ड मेडल जीतकर उन सभी धारणाओं को गलत साबित कर दिया. खुशी के घर लौटते ही बहन ने उसे नए कपड़े और जूते गिफ्ट किए.

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