अंतरिक्ष में ब्रह्मांड की 22 साल तक निगरानी करने वाला NASA का एक शक्तिशाली टेलीस्कोप अब पृथ्वी की ओर लौट रहा है. लेकिन यह वापसी सामान्य नहीं होगी. टेलीस्कोप बेकाबू हालात में पृथ्वी की ओर री-एंट्री करेगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका अधिकांश हिस्सा वायुमंडल में जल जाएगा, लेकिन कुछ टुकड़े धरती तक पहुंच सकते हैं. भारत के कई बड़े शहर उस अक्षांशीय क्षेत्र में आते हैं जहां इसका मलबा गिरने की सैद्धांतिक संभावना है.
NASA का Neil Gehrels Swift Observatory नाम का अंतरिक्ष टेलीस्कोप पृथ्वी की ओर तेजी से बढ़ रहा है. करीब 1.5 टन वजनी इस वेधशाला को 20 नवंबर 2004 को लॉन्च किया गया था. शुरुआत में इसका नाम Swift Gamma-Ray Burst Explorer था. इसका मूल मिशन सिर्फ दो साल का था, लेकिन इसने लगभग 22 सालों तक अंतरिक्ष में काम करते हुए वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड की कई अहम जानकारियां दीं.
कब होगी री-एंट्री?
NASA के अनुसार, टेलीस्कोप 4 नवंबर को भारतीय समयानुसार दोपहर करीब 2 बजे पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर सकता है. हालांकि, री-एंट्री के समय में लगभग 11 घंटे की अनिश्चितता बनी हुई है. इसी वजह से अभी यह बताना संभव नहीं है कि टेलीस्कोप का मलबा किस सटीक स्थान पर गिरेगा.
भारत के कौन-कौन से इलाके संभावित दायरे में?
NASA से जुड़े मिशन के मुख्य वैज्ञानिक ब्रैड सेंको ने बताया कि अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य तथा दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्से इस री-एंट्री जोन के भीतर आते हैं.
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, संभावित री-एंट्री क्षेत्र 20.6 डिग्री दक्षिण अक्षांश से 20.6 डिग्री उत्तर अक्षांश के बीच कहीं होगा. भारत के नक्शे पर देखें तो यह क्षेत्र लगभग पश्चिम में दमन से लेकर पूर्व में ओडिशा के कटक तक खींची गई एक काल्पनिक रेखा के दक्षिण वाले हिस्सों को कवर करता है.
इस वजह से मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहर इस अक्षांशीय पट्टी में आते हैं. वहीं दिल्ली, कोलकाता और उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा इस दायरे से बाहर माना जा रहा है.
क्या इन शहरों पर मलबा गिरने का खतरा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ किसी शहर का इस अक्षांशीय क्षेत्र में होना यह नहीं दर्शाता कि वहां मलबा जरूर गिरेगा. वास्तविक री-एंट्री का स्थान इस बात पर निर्भर करेगा कि वायुमंडल में प्रवेश के समय टेलीस्कोप पृथ्वी के किस हिस्से के ऊपर होगा.
यानी मुंबई, हैदराबाद या चेन्नई का नाम संभावित क्षेत्र में जरूर है, लेकिन इनके ऊपर सीधे मलबा गिरने की संभावना को लेकर अभी कोई निश्चित जानकारी नहीं है.
समुद्र में गिरने की संभावना ज्यादा
कई विशेषज्ञों का मानना है कि टेलीस्कोप के अवशेष समुद्र में गिर सकते हैं. डरहम यूनिवर्सिटी के खगोलभौतिकीविद जोनाथन मैकडॉवेल ने कहा कि उन्हें हैरानी होगी अगर 1,500 किलोग्राम के इस यान में से 100 किलोग्राम से ज्यादा हिस्सा री-एंट्री के बाद बच पाए.
वहीं ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के खगोलभौतिकीविद ब्रैड टकर का कहना है कि पृथ्वी की लगभग 70 प्रतिशत सतह महासागरों से ढकी है. ऐसे में सांख्यिकीय रूप से मलबे के समुद्र में गिरने की संभावना अधिक रहती है.
विशेषज्ञों ने यह भी साफ किया है कि किसी व्यक्ति के घायल होने या बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने की संभावना बेहद कम है.
ISRO की नजर भी रहती है ऐसे ऑब्जेक्ट्स पर
भारत के पास भी अंतरिक्ष से लौटने वाली वस्तुओं की निगरानी के लिए व्यवस्था मौजूद है. श्रीहरिकोटा स्थित ISRO के मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार (MOTR) के जरिए उपग्रहों, रॉकेट बॉडी और अन्य अंतरिक्ष मलबे पर नजर रखी जाती है.
हालांकि, फिलहाल ISRO की ओर से यह जानकारी नहीं दी गई है कि वह Swift Observatory की री-एंट्री को ट्रैक कर रहा है या नहीं.
22 साल का शानदार सफर
Swift Observatory का मिशन वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद सफल माना जाता है. दो साल के लिए भेजा गया यह टेलीस्कोप करीब 22 साल तक सक्रिय रहा. अपने लंबे करियर में इसने 2,000 से ज्यादा गामा-रे विस्फोट (Gamma-Ray Bursts) और 1,400 सुपरनोवा का अवलोकन किया. इन आंकड़ों ने ब्रह्मांड में होने वाली सबसे शक्तिशाली घटनाओं को समझने में वैज्ञानिकों की बड़ी मदद की.
अब यही टेलीस्कोप अपनी ऐतिहासिक यात्रा के अंत में पृथ्वी की ओर लौट रहा है. आने वाले घंटों में दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां इसकी री-एंट्री पर नजर बनाए रखेंगी.
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