- बीजेपी ने महाराष्ट्र में 29 में से 23 नगर निगम जीतकर सत्ता संतुलन पूरी तरह बदल दिया है.
- शुगर बेल्ट में पवार परिवार का पतन एनसीपी की राजनीति को कमजोर कर गया है, जहां बीजेपी को बड़ी बढ़त मिलती दिखी.
- मुंबई में उद्धव ठाकरे की पकड़ बरकरार है और AIMIM मुस्लिम वोट बैंक में कांग्रेस की जगह लेती दिख रही है.
महाराष्ट्र की राजनीति अब हमेशा के लिए बदलने जा रही है, क्योंकि हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है. अलग-अलग इलाकों में उसकी बड़ी जीत (29 में से 23 नगर निगम), जिसमें देश की सबसे अमीर नगरपालिका बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) भी शामिल है, यह बताती है कि पार्टी ने उस राज्य में कितनी गहरी पकड़ बना ली है, जिसे कभी कांग्रेस, पवार और ठाकरे परिवारों का गढ़ माना जाता था. इसके मायने बहुत बड़े हैं. महाराष्ट्र जीतने के बाद बीजेपी अब न सिर्फ देश के सबसे बड़े आर्थिक केंद्र पर काबिज हो गई है, जहां देश की वित्तीय राजधानी और बड़े कॉरपोरेट घराने मौजूद हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा राजनीतिक असर रखने वाले राज्य पर भी उसकी मजबूत पकड़ बन गई है, जहां लोकसभा की 48 सीटें हैं.
एक बड़ा रीसेट
पुराने ताकतवर नेताओं के कमजोर पड़ने और नए चेहरों के उभरने से महाराष्ट्र की राजनीति के सारे समीकरण बदलते दिख रहे हैं. यह बदलाव अभी जारी है, इसलिए नए महाराष्ट्र की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तस्वीर को पूरी तरह समझना आसान नहीं है. लेकिन हालिया चुनाव नतीजों से कुछ बड़े रुझान साफ दिखते हैं. सबसे अहम बदलाव यह है कि दशकों से सत्ता की धुरी रहे मराठा नेतृत्व की जगह अब एक ब्राह्मण नेता महाराष्ट्र की राजनीति का चेहरा बन गया है.

यह वही राज्य है, जिसे कभी यशवंतराव चव्हाण, वसंतदादा पाटिल और शरद पवार जैसे मजबूत मराठा नेताओं ने चलाया. अब सत्ता की कमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के हाथ में है. वह बीजेपी के नए स्टार बनकर उभरे हैं. पार्टी की जीत का बड़ा श्रेय उन्हीं को जाता है. उनकी राजनीतिक समझ, लगातार चुनावी मेहनत और गैर-मराठा खासकर ओबीसी समुदायों तक बनाई गई पहुंच ने बीजेपी को शीर्ष पर पहुंचा दिया है. उनकी यह जीत उन्हें मोदी के बाद के दौर में शीर्ष नेतृत्व की दौड़ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ खड़ा करती है.
अनाथ होती एनसीपी
दूसरा बड़ा बदलाव पश्चिम महाराष्ट्र के उस शुगर बेल्ट से जुड़ा है, जिसने दशकों तक मराठाओं को राजनीतिक ताकत दी थी. वहां एनसीपी के दोनों गुटों का लगभग सफाया हो गया है. एक गुट शरद पवार के नेतृत्व में था और दूसरा उनके भतीजे अजित पवार के नेतृत्व में, जिन्हें कभी उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था. पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ जैसे उनके मजबूत गढ़ों में हार ने मराठा राजनीति को नेतृत्वविहीन और कमजोर कर दिया है.
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हिंदुत्व की राजनीति से प्रभावित नजर आते ओबीसी वोटरों के समर्थन से बीजेपी ने मराठा समुदाय को बांटने और कमजोर करने में सफलता पाई है. पार्टी की नजर लंबे समय से शुगर और बैंकिंग सहकारिताओं पर रही है, जो मराठा ताकत की आर्थिक रीढ़ रही हैं. पवार परिवार के पतन और फिलहाल किसी उत्तराधिकारी के नजर न आने से बीजेपी को वह मौका मिल गया है, जिसकी उसे तलाश थी, ताकि वह इस पूरे सेक्टर की संरचना बदल सके और शुगर बेल्ट की राजनीति की तस्वीर नए सिरे से गढ़ सके.
पवार फैक्टर
शरद पवार अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर में हैं, लेकिन अजित पवार नहीं. इसके बावजूद उन्हें बड़ा झटका लगा है और फडणवीस के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में उपमुख्यमंत्री के तौर पर उनकी स्थिति कमजोर पड़ गई है. उन्होंने अपने चाचा के गुट से हाथ मिलाकर यह उम्मीद की थी कि परिवार फिर से एकजुट होकर शुगर बेल्ट पर अपनी पकड़ बनाए रखेगा, लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया और अब वे राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में फंसे नजर आ रहे हैं. अजित पवार कभी बीजेपी या आरएसएस के पसंदीदा नहीं रहे. उन्हें एनडीए में जगह सिर्फ शरद पवार को कमजोर करने के मकसद से दी गई थी. उनके खिलाफ ईडी जांच फिर से तेज होने की खबरें पहले ही सामने आ रही हैं. राजनीति में किसी को पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता, लेकिन फिलहाल अजित पवार का भविष्य धुंधला दिख रहा है.
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मुंबई अब भी चुनौती
तीसरा बड़ा मोर्चा मुंबई है. राज्य की राजधानी की राजनीति हमेशा महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों से अलग रही है. भले ही बीजेपी तीन दशकों तक बीएमसी पर कब्जा रखने वाले ठाकरे परिवार को उससे बाहर करने की सफलता पर जश्न मना रही हो लेकिन पार्टी को कुछ सख्त सच्चाइयों को समझना होगा, जो आने वाले समय में शहर की राजनीति को प्रभावित करेंगी. बीजेपी को बीएमसी में 2017 के मुकाबले सिर्फ तीन सीटें ज्यादा मिली हैं. हां, निगम में उसके पास बहुमत है, लेकिन वह भी एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना के साथ गठबंधन के दम पर.
बीजेपी की रणनीति थी कि वह उद्धव ठाकरे और उनकी शिवसेना को उसी तरह खत्म कर देगी, जैसे उसने पश्चिम महाराष्ट्र में पवारों को किया. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उद्धव ठाकरे ने मुंबई के मराठी इलाकों में अपना जनाधार बचाए रखा और एक मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरे हैं. यहां तक कहा जा रहा है कि अगर उन्होंने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से दोबारा हाथ मिलाने की बजाय कांग्रेस से गठबंधन किया होता, तो यह गठबंधन बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकता था.
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मुंबई की राजनीति अब भी संभावनाओं पर टिकी है. शिंदे पहले से ही अगले मेयर के चयन को लेकर बीजेपी के साथ सौदेबाजी कर रहे हैं. वहीं उद्धव ठाकरे की शिवसेना उस नेता पर लगातार हमलावर है, जिसने पार्टी तोड़ी और 2021 में उसकी सरकार गिरा दी थी. बीजेपी के लिए मुंबई को उसी तरह पूरी तरह कंट्रोल करना आसान नहीं होगा, जैसे उसने राज्य के अंदरूनी इलाकों में किया है.
AIMIM पर नजर
चौथा बड़ा बदलाव असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM का मुस्लिम समुदाय के लिए बड़े आकर्षण के तौर पर उभरना है. स्थानीय चुनावों में AIMIM ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अलग-अलग नगर निगमों में 121 सीटें जीतीं, जिनमें मुंबई की आठ सीटें भी शामिल हैं. पार्टी ने लगभग सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में जीत दर्ज की. AIMIM को मिली सफलता बताती है कि कांग्रेस मुसलमानों की पहली पसंद और समाजवादी पार्टी दूसरी पसंद से पीछे चली गई है.
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अगर बीजेपी खुलकर अपना हिंदुत्व एजेंडा आगे बढ़ाती है, तो आने वाले दिनों में महाराष्ट्र में AIMIM की मौजूदगी और मजबूत हो सकती है. यह देखना दिलचस्प होगा कि हैदराबाद के अपने पारंपरिक गढ़ से बाहर AIMIM किस तरह अपनी राजनीति का विस्तार करती है.
स्पष्ट है कि आने वाले महीनों में महाराष्ट्र की राजनीति लगातार उथल-पुथल से गुजरेगी, क्योंकि बीजेपी 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पहले अपनी बढ़त को और मजबूत करने की तैयारी में जुटी है.
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