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दतिया में BJP का 'चेहरा बदलो' फॉर्मूला पस्त : 'नरोत्तम फैक्टर' पर भारी पड़ा कांग्रेस का घनश्याम कार्ड

दतिया विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारना पार्टी को भारी पड़ गया, वहीं कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने 12 हजार से ज्यादा वोटों से प्रचंड जीत दर्ज की. कांग्रेस के लिए ये जीत 2023 की जीत से भी बड़ी है. जानिए क्या रहे वो फैक्टर जिसने घनश्याम सिंह के माथे पर जीत का सेहरा चढ़ा दिया.

दतिया में BJP का 'चेहरा बदलो' फॉर्मूला पस्त : 'नरोत्तम फैक्टर' पर भारी पड़ा कांग्रेस का घनश्याम कार्ड

मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में BJP को बड़ा झटका लगा है. बीजेपी का अभेद्य किला मानी जाने वाली इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह की प्रचंड जीत ने न केवल बीजेपी के 'चेहरा बदलो' फॉर्मूले पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि दतिया में बीजेपी का आधार सीधे तौर पर 'नरोत्तम मिश्रा' से ही जुड़ा था.अब ऐसा माना जा रहा है कि पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर नए चेहरे पर दांव लगाना बीजेपी को भारी पड़ गया, जहां उनके समर्थकों की नाराजगी और भीतरघात ने पार्टी के गढ़ को ढहा दिया. हालांकि इसे और गहराई से समझने के लिए कुछ फैक्ट्स पर भी निगाह डालने की जरुरत है. 

दतिया उपचुनाव में मतदान केंद्र क्रमांक 121 पर बीजेपी की हार शायद उसे सालों तक चुभेगी. यह मतदान केंद्र मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से जुड़ा है, जिनके इर्द-गिर्द करीब दो दशकों तक दतिया की बीजेपी राजनीति घूमती रही. लेकिन इसी बूथ पर कांग्रेस को 291 और बीजेपी को 264 वोट मिले. यानी उस इलाके में भी कांग्रेस ने 27 वोटों की बढ़त बना ली, जहां सत्तारूढ़ दल को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करना चाहिए था.

बीजेपी अपने जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाहा से जुड़े मतदान केंद्र पर भी पीछे रही. ये केवल कुछ बूथों पर मिली छोटी-मोटी पराजय नहीं थीं. इन आंकड़ों ने दतिया उपचुनाव की पूरी कहानी कह दी. बीजेपी ने उम्मीदवार तो बदल दिया, लेकिन उसके चारों ओर मौजूद राजनीतिक ढांचे को नहीं बदल सकी.कांग्रेस के वरिष्ठ नेता घनश्याम सिंह की बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी पर जीत को केवल एक उम्मीदवार की दूसरे पर विजय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह उस राजनीतिक विरोधाभास का परिणाम था, जिसे बीजेपी पूरे चुनाव में कभी सुलझा नहीं सकी.

बदलाव और निर्भरता के बीच फंसा बीजेपी का अभियान

पार्टी ने नरोत्तम मिश्रा को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया. ऐसा लगा कि उसने 2023 के विधानसभा चुनाव का संदेश स्वीकार किया है, जब कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने तत्कालीन गृह मंत्री को 7,742 वोटों से हराया था. लेकिन टिकट न देने के बावजूद बीजेपी ने पूरा उपचुनाव मिश्रा के गहरे राजनीतिक प्रभाव और छाया में ही लड़ा. नतीजा यह हुआ कि बीजेपी का अभियान बदलाव और निर्भरता के बीच फंसा रहा.आशुतोष तिवारी को पीढ़ीगत और संगठनात्मक बदलाव का प्रतीक बनाया गया था.

45 साल के तिवारी, 72 साल के घनश्याम सिंह से उम्र में छोटे थे, युवा थे और उन्हें किसी बड़े राजनीतिक व्यक्तित्व के बजाय जमीनी संगठन से निकले नेता के रूप में पेश किया गया.लेकिन दतिया के सामने तिवारी को किसी नई राजनीतिक व्यवस्था के निर्माता के रूप में नहीं, बल्कि पुराने नेतृत्व की स्वीकृति, उसके संगठन और भावनात्मक मेल-मिलाप पर निर्भर उम्मीदवार के रूप में पेश किया गया.

विरोध, इस्तीफे और मंच पर नरोत्तम के आंसू

यह विरोधाभास आशुतोष तिवारी की उम्मीदवारी की घोषणा होते ही खुलकर सामने आ गया. नाराज नरोत्तम मिश्रा समर्थक सड़कों पर उतर आए. रास्ते जाम किए गए, पुलिस से झड़प हुई और कई पदाधिकारियों ने पार्टी पदों से इस्तीफे देने की घोषणा कर दी. बीजेपी का औपचारिक प्रचार शुरू भी नहीं हुआ था, लेकिन उसका आंतरिक संघर्ष सार्वजनिक हो चुका था.फिर चुनाव की सबसे निर्णायक तस्वीर सामने आई. आशुतोष तिवारी के पक्ष में भाषण के दौरान नरोत्तम मिश्रा भावुक हो गए और रो पड़े. यह पूरी तरह मानवीय क्षण हो सकता था, लेकिन चुनाव भावनाओं को भी राजनीतिक संकेतों में बदल देते हैं. नामांकन तिवारी भर रहे थे, लेकिन कैमरे, चर्चाएं और राजनीतिक व्याख्याएं मिश्रा के आंसुओं पर केंद्रित हो गईं. बीजेपी का नया उम्मीदवार पुराने नेता के दुख के पीछे गायब हो गया.

ये भी आशुतोष तिवारी का अभियान नहीं बन सका

इसके बाद नरोत्तम मिश्रा ने व्यापक प्रचार किया. वे घर-घर गए और पार्टी के लिए वोट मांगे. मतगणना शुरू होने के समय भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से बीजेपी की जीत का दावा किया. लेकिन यह अभियान कभी पूरी तरह आशुतोष तिवारी का अभियान नहीं बन सका. पूरा चुनाव इस सवाल पर जनमत संग्रह बन गया कि मिश्रा को टिकट क्यों नहीं मिला, क्या उनके समर्थकों ने पार्टी के फैसले को स्वीकार किया और यह परिणाम उनके राजनीतिक भविष्य के लिए क्या मायने रखेगा.

जो मतदाता बीजेपी को मिश्रा युग की राजनीति से आगे बढ़ते देखना चाहते थे, उन्हें तिवारी पर्याप्त रूप से स्वतंत्र नहीं दिखाई दिए. दूसरी ओर मिश्रा के कट्टर समर्थकों के लिए टिकट कटना अपने नेता का अपमान था, जिसे केवल उन्हें मंचों पर बैठा देने से भुलाया नहीं जा सकता था. बीजेपी दोनों में से किसी भी पक्ष को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सकी.

कांग्रेस का स्थापित स्थानीय चेहरा और मजबूत नेटवर्क

घनश्याम सिंह अचानक उठी किसी कांग्रेस लहर की उपज नहीं थे. वे दतिया के परिचित स्थानीय चेहरा थे. उनके पास पुराना राजनीतिक नेटवर्क, दतिया के पूर्व राजपरिवार से जुड़ाव और दतिया तथा सेवढ़ा दोनों सीटों से विधायक रहने का अनुभव था.घनश्याम सिंह पहली बार 1993 में दतिया से विधायक बने. 2003 में वे फिर इसी सीट से विधानसभा पहुंचे और बाद में सेवढ़ा का प्रतिनिधित्व किया. उनकी उम्मीदवारी ने कांग्रेस को वह चीज दी, जिसकी कठिन चुनावों में उसके संगठन के पास अक्सर कमी होती है - एक ऐसा उम्मीदवार जिसकी अपनी सामाजिक पहचान और राजनीतिक पकड़ पार्टी संगठन से बाहर भी काम कर सके.इसलिए यह मुकाबला केवल युवा बनाम अनुभवी का नहीं था. यह एक ऐसे नए उम्मीदवार और एक स्थापित स्थानीय नेता के बीच मुकाबला था, जिसमें नए उम्मीदवार के कंधों पर किसी दूसरे की राजनीति का बोझ था, जबकि पुराने नेता की पहचान को किसी परिचय की जरूरत नहीं थी.

भीतरघात का दावा और कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता

मतगणना के दौरान घनश्याम सिंह ने दावा किया कि नाराज बीजेपी कार्यकर्ताओं ने भीतर से कांग्रेस की मदद की. विस्तृत बूथवार आंकड़ों और वोट ट्रांसफर के प्रमाण के बिना ऐसे दावों को स्थापित करना मुश्किल है. लेकिन टिकट की घोषणा के बाद हुए विरोध, इस्तीफों और नाराजगी को देखते हुए यह दावा राजनीतिक रूप से पूरी तरह अविश्वसनीय भी नहीं लगता.संभव है कुछ बीजेपी कार्यकर्ता कांग्रेस की ओर चले गए हों. कई अन्य कार्यकर्ताओं ने उत्साह वापस खींच लिया हो, बूथ स्तर की सक्रियता कम कर दी हो या चुनाव के प्रति उदासीन हो गए हों. उपचुनाव में निष्क्रिय विद्रोह भी सक्रिय भीतरघात जितना नुकसान पहुंचा सकता है.

वोटिंग प्रतिशत में गिरावट और महिला मतदाताओं का रुख

दतिया में 71.44 प्रतिशत मतदान हुआ. यह 2023 के विधानसभा चुनाव में हुए लगभग 80 प्रतिशत मतदान से करीब नौ प्रतिशत अंक कम था.उपचुनाव में कम मतदान असामान्य नहीं है. लेकिन सत्तारूढ़ दल के लिए कम मतदान शायद ही कभी तटस्थ आंकड़ा होता है. बीजेपी राज्य सरकार, मजबूत बूथ संगठन, व्यापक संसाधनों और मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाले अभियान के साथ चुनाव में उतरी थी. इसके बावजूद वह अपने संभावित समर्थकों को अपेक्षित संख्या में मतदान केंद्रों तक नहीं ला सकी.

महिला और पुरुष मतदान के बीच अंतर विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा. पुरुष मतदान लगभग 74.09 प्रतिशत था, जबकि महिलाओं का मतदान लगभग 68.48 प्रतिशत रहा. दोनों के बीच पांच प्रतिशत से अधिक का अंतर था. हालांकि इससे ये साबित नहीं होता कि महिलाओं ने बीजेपी के खिलाफ मतदान किया, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि क्या सरकारी योजनाओं से लाभान्वित वर्ग चुनाव में भाग लेने के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरित था.

लाड़ली बहना जैसी योजनाओं की राजनीतिक सफलता के बाद महिलाओं को मध्य प्रदेश में बीजेपी के सबसे भरोसेमंद मतदाता समूहों में गिना जाने लगा है. दतिया ने सरकारी योजना के समर्थन और चुनावी सक्रियता के बीच का अंतर दिखाया. कोई लाभार्थी किसी योजना की सराहना कर सकता है, लेकिन फिर भी उसके उम्मीदवार को वोट देने के लिए मतदान केंद्र तक न जाए.

विकास के वादे बनाम स्थानीय राजनीति का ढांचा

बीजेपी ने उपचुनाव को विकास और डबल इंजन सरकार के फायदों से जोड़ने की कोशिश की. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने रोड शो किए और मतदाताओं को भरोसा दिलाया कि दतिया सरकार की प्राथमिकता बना रहेगा.लेकिन स्थानीय चुनाव केवल प्रचार वाहनों से किए गए भविष्य के वादों पर तय नहीं होते. मतदाता यह भी देखते हैं कि स्थानीय सत्ता किसके हाथ में है, कार्यकर्ताओं का व्यवहार कैसा है, नेता कितने सुलभ हैं और उम्मीदवार बदलने का अर्थ क्या वास्तव में राजनीतिक संस्कृति का बदलना भी है.

वर्षों तक दतिया में बीजेपी का संगठन नरोत्तम मिश्रा के व्यक्तित्व और नेटवर्क के इर्द-गिर्द विकसित हुआ. जब पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाने का फैसला किया, तो उसे या तो एक वैकल्पिक संगठनात्मक ढांचा तैयार करना चाहिए था या तिवारी को इतनी स्वतंत्रता देनी चाहिए थी कि वे अभियान का स्पष्ट केंद्र बन सकें.

बीजेपी ने इनमें से कुछ भी नहीं किया.
इसके बजाय उसने मिश्रा को उम्मीदवार बनाए बिना उनके संगठन का उपयोग करने की कोशिश की. पार्टी ने उनका चुनावी प्रभाव भी चाहा और साथ ही यह संकेत भी दिया कि वह उनके नेतृत्व से आगे बढ़ना चाहती है. यह वास्तविक बदलाव कम और राजनीतिक आधा-अधूरा कदम अधिक था. मिश्रा को टिकट न देकर बीजेपी ने उनके समर्थकों को असहज किया. लेकिन उनकी छाया में चुनाव लड़कर वह उनके विरोधियों को भी यह विश्वास नहीं दिला सकी कि वास्तव में कुछ बदला है. दरअसल दतिया की कहानी को पिछले दो चुनावों के क्रम में सबसे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.2023 में मतदाताओं ने नरोत्तम मिश्रा को हराया. 2026 में उन्होंने ऐसे बीजेपी उम्मीदवार को हराया, जो नरोत्तम मिश्रा नहीं था, लेकिन जिसका चुनाव अभियान नरोत्तम मिश्रा की छाया से कभी बाहर नहीं निकल सका. बीजेपी ने पोस्टर पर चेहरा बदल दिया. दतिया के मतदाताओं ने फैसला सुनाया कि उसके पीछे की राजनीति अब भी वही थी.
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