चंबल की माटी सिर्फ बागियों की गोलियों से नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे सनक,सियासत और लोककथाओं के रहस्यों से भी भरी पड़ी है. सिनेमा ने हमें डाकुओं की जो छवि दिखाई, वो अक्सर काल्पनिक रही. लेकिन असल जिंदगी के ये किरदार उससे कहीं ज्यादा खूंखार और हैरान करने वाले थे और हैं भी. चंबल के उन्हीं पुराने पड़ चुके पन्नों को पलटने, पुलिस की फाइलों में दबे सच को सामने लाने और बीहड़ के इस खूनी इतिहास की अनकही दास्तानों को पाठकों तक पहुंचाने के लिए हम शुरू कर रहे हैं विशेष सीरीज—'चंबल डायरी'. इसकी पहली कड़ी में कहानी उस डाकू की, जिसके नाम के खौफ ने भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े विलेन को जन्म दिया. जी हां हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा इतिहास की सबसे मशहूर फिल्म शोले के सबसे मशहूर कैरेक्टर गब्बर सिंह की.
भिंड के डांग गांव से बीहड़ का 'गबरा' बनने का सफर
तो हम अपनी बात शुरु से शुरु करते हैं. सफेद मूंछें,आंखों में तैरती क्रूरता और हाथ में धारदार खंजर. 1950 के दशक में जब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के ट्राई जंक्शन पर बसे चंबल के बीहड़ों में 'गबरा' नाम गूंजता था, तो कोई भी खौफ से कांप उठता था. यह कहानी हाड़-मांस के उस खूंखार बागी डाकू गब्बर सिंह की है, जिसके नाम के खौफ को सलीम-जावेद ने परदे पर उतारा और वह भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे बड़ा खलनायक बन गया. दरअसल चंबल की तासीर में ही कुछ ऐसा है कि वहां बगावत की कहानियां मिट्टी से ही उपजती हैं. मध्य प्रदेश के भिंड जिले के एक छोटे से गांव डांग में जन्मा गब्बर सिंह शुरुआत में एक आम ग्रामीण था. लेकिन स्थानीय रंजिशों ने उसके भीतर के इंसान को मार दिया और उसने बंदूक थाम ली.

डकैत गब्बर सिंह की एकमात्र फोटो...इसे Swaroop Chaturvedi के ब्लॉग से साभार लिया गया है.
Photo Credit: Swaroop Chaturvedi
कैसे प्रीतम सिंह गूजर बना गब्बर सिंह?
बता दें कि गब्बर सिंह का असली नाम प्रीतम सिंह गूजर था, जिसे लोग प्यार और बाद में खौफ से 'गबरा' बुलाते थे. उसका जन्म 1926 में भिंड के डांग गांव में रघुवीर सिंह के घर हुआ था. गबरा का परिवार बेहद गरीब था और वह अपने पिता के साथ खदानों में मज़दूरी किया करता था. उस दौर में चंबल के ग्रामीण इलाकों में सामंती वर्चस्व बहुत ज़्यादा था. डांग गांव के ही कुछ स्थानीय रसूखदारों के साथ गबरा के परिवार का ज़मीनी विवाद शुरू हो गया. एक दिन विवाद इतना बढ़ा कि गांव के दबंगों ने गबरा के पिता रघुवीर सिंह की बेरहमी से पिटाई कर दी.इस ज़ुल्म के खिलाफ गांव में बाकायदा पंचायत बुलाई गई. गबरा को उम्मीद थी कि पंचायत उसके परिवार को न्याय दिलाएगी, लेकिन रसूखदारों के दबाव में पंचायत ने उल्टा फैसला सुना दिया. पंचायत ने न सिर्फ मारपीट करने वालों का साथ दिया, बल्कि गबरा के पिता की ज़मीन भी छीनकर दबंगों के कब्ज़े में दे दी.
इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने के बाद 1955 में गबरा हमेशा के लिए अपना घर-गांव छोड़कर बीहड़ में कूद गया.
21 बच्चों को एक लाइन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया
बीहड़ में उतरने के बाद गबरा उस समय के कुख्यात डाकू कल्याण सिंह गूजर के गैंग में शामिल हो गया, जहां उसने लूट, अपहरण और बीहड़ के दांव-पेंच सीखे. लेकिन गबरा ज़्यादा दिन किसी के नीचे काम नहीं कर सकता था, इसलिए 1956 के अंत तक उसने अपना खुद का एक खूंखार गैंग बना लिया.साल 1959 आते-आते सरकार ने उसके सिर पर 50,000 रुपये का इनाम घोषित किया था. 50 के दशक में पचास हज़ार की यह रकम भारत के इतिहास में किसी भी अपराधी पर रखी गई सबसे बड़ी इनामी राशि थी.गब्बर की क्रूरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उसे पता चला कि पुलिस बच्चों को मुखबिर के तौर पर इस्तेमाल कर रही है, तो उसने भिंड के पास एक गांव में 21 बच्चों को एक साथ लाइन में खड़ा करके गोलियों से भून दिया था. जिसके बाद तब की जवाहर लाल नेहरू की सरकार भी परेशान हो गई थी.
आतंक का वो अंधविश्वास: 116 नाक-कान की बलि
गबरा सिर्फ एक अपराधी नहीं, बल्कि अंधविश्वास के दलदल में धंसा एक साइकोलॉजिकल क्रिमिनल था. बीहड़ के गलियारों में यह हकीकत आज भी दफन है कि एक तांत्रिक ने गब्बर से कहा था कि यदि वह अपनी कुलदेवी को 116 इंसानों के कटे हुए नाक और कान चढ़ाएगा, तो वह अमर हो जाएगा. इस खौफनाक तांत्रिक विद्या के चक्कर में आकर उसने पुलिस के मुखबिरों और बेकसूर ग्रामीणों को तड़पाना शुरू किया. जो भी उसके खिलाफ जाता, गबरा भरी पंचायत में उसके नाक-कान काट लेता था ताकि उसका आतंक भी जिंदा रहे और उसका खूनी संकल्प भी पूरा होता रहे.
जब सलीम खान के पिता की डायरी से निकला 'शोले' का खलनायक
साल 1975 में जब निर्देशक रमेश सिप्पी फिल्म 'शोले' बना रहे थे, तो सलीम-जावेद की जोड़ी एक ऐसे विलेन का किरदार गढ़ रही थी जो पारंपरिक डाकुओं से अलग हो. इस किरदार को नाम मिला 'गब्बर सिंह'. दरअसल, सलीम खान के पिता मध्य प्रदेश पुलिस में डीआईजी (DIG) के पद पर तैनात रहे थे. उनके पास चंबल के डाकुओं की फाइलों और उनकी डायरियों का पूरा रिकॉर्ड था.
हालांकि, परदे का गब्बर सेना की चितकबरी वर्दी पहनता था और खैनी चबाता था, जबकि असली गबरा चंबल के पारंपरिक पहनावे और धोती-कुर्ते में रहकर ही दहशत फैलाता था.
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रुस्तमजी का वो मिशन और असली गब्बर का खौफनाक अंत
गबरा का आतंक इस कदर बढ़ चुका था कि तत्कालीन सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए वह सबसे बड़ी चुनौती बन गया था. तब मध्य प्रदेश पुलिस के जांबाज आईजी (IG) केएफ रुस्तमजी ने गब्बर सिंह के खात्मे के लिए खुद कमान संभाली. रुस्तमजी ने चंबल डायरी में दर्ज गबरा की कमजोरियों और उसके मूवमेंट पैटर्न का बारीकी से अध्ययन किया.साल 1959 में पुलिस को खुफिया तंत्र से सटीक जानकारी मिली कि गबरा अपने कुछ साथियों के साथ एक गांव के पास छिपा हुआ है. पुलिस बल ने बिना वक्त गंवाए पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी. खुद को चारों तरफ से घिरा देख गबरा और उसके गैंग ने फायरिंग शुरू कर दी. कई घंटों तक चली इस ऐतिहासिक और भीषण मुठभेड़ में गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा बीहड़ गूंज उठा. आखिरकार, आईजी के.एफ. रुस्तमजी के नेतृत्व में पुलिस ने गब्बर के ठिकाने पर हैंड ग्रेनेड फेंके, जिससे गब्बर सिंह बुरी तरह घायल हो गया और वहीं मारा गया. गबरा की मौत के साथ ही चंबल के एक सबसे खूंखार अध्याय का अंत हुआ, लेकिन वह सिनेमा की दुनिया में हमेशा के लिए अमर हो गया.
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