मध्यप्रदेश के जिन नदियों को पहले प्रदेश की लाइफलाइन माना जाता था उसमें बेतवा नदी भी शामिल थी लेकिन तमाम वजहों से नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया. अब इसी नदी को फिर से नया जीवन देने के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर सरकार ने काम शुरू कर दिया है. इस बार बेतवा नदी पुनर्जीवन परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) सिर्फ वर्तमान की समस्याओं को देखकर नहीं बनाई जा रही है, बल्कि अगले 27 साल यानी साल 2053 तक की अनुमानित आबादी, शहरी विस्तार और उससे पैदा होने वाले सीवेज (गंदे पानी) के दबाव को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है. अच्छी बात ये है कि DPR में इसका ध्यान रखा जाएगा कि शहरों का भले ही विस्तार हो लेकिन नदी में गंदगी न पहुंचे और प्रशासन को बार-बार नई योजनाएं बनाने पर पैसा खर्च न करना पड़े.इस मास्टरप्लान के तहत सीवर नेटवर्क, पंपिंग स्टेशन और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की क्षमता को भविष्य की जरूरतों के अनुसार 'एडवांस' मोड में डिजाइन किया जा रहा है, ताकि आने वाले समय में सिस्टम पर कोई अतिरिक्त लोड न आए.

नदी का 'सुरक्षा कवच': गिरने से पहले ही थम जाएगा नालों का गंदा पानी
इस पूरी परियोजना का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट इसका इंटरसेप्शन और डायवर्जन सिस्टम होगा, जो नदी के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा. इसके तहत बेतवा नदी में मिलने वाले हर छोटे-बड़े नाले की सटीक मैपिंग की जाएगी और उनके पानी के बहाव का आकलन होगा. नाले का गंदा पानी नदी की धार में मिले, उससे ठीक पहले ही इंटरसेप्शन स्ट्रक्चर बनाकर उसे रोक लिया जाएगा.इसके बाद इस रोके गए सीवेज को आधुनिक सीवर नेटवर्क या राइजिंग मेन पाइपलाइनों के जरिए सीधे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) तक भेजा जाएगा. जिन इलाकों में ढलान न होने के कारण पानी प्राकृतिक रूप से आगे नहीं बढ़ पाएगा, वहां हाई-पावर पंपिंग स्टेशन बनाए जाएंगे. इसके अलावा, बारिश के मौसम में नालों में आने वाले बाढ़ के अतिरिक्त पानी को संभालने के लिए एक अलग बायपास सिस्टम तैयार किया जा रहा है, ताकि ट्रीटमेंट प्लांट्स पर अचानक कोई दबाव न आए और वे सुचारू रूप से काम करते रहें.
मंडीदीप और विदिशा से बिगड़ी बात
हालांकि परियोजना के शुरुआती सर्वे में बेतवा नदी के मौजूदा हालात का जो एक्सरे सामने आया है, उसने बड़ी चिंता खड़ी की है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय नदी को सबसे ज्यादा नुकसान मंडीदीप औद्योगिक क्षेत्र और विदिशा शहर से पहुंच रहा है. मंडीदीप से निकलने वाला फैक्ट्रियों का जहरीला केमिकल, घरेलू सीवेज और खुले नालों का गंदा पानी सीधे बेतवा में समा रहा है. यहां अभी तक कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) न होने की वजह से स्थिति लगातार खतरनाक बनी हुई है.ठीक इसी तरह, विदिशा शहर के तीन बड़े नालों का सीवेज भी बिना किसी ट्रीटमेंट (सफाई) के सीधे नदी में बहाया जा रहा है. रही-सही कसर कोलार जलशोधन संयंत्र से निकलने वाला बैकवॉश पानी पूरी कर देता है. इस भारी प्रदूषण के कारण नदी के कई हिस्सों में जलकुंभी का जाल बिछ गया है और पानी में ऑक्सीजन की भारी कमी देखी जा रही है.

हाईटेक होगी निगरानी: कंप्यूटर से लाइव मॉनिटरिंग
इस बार योजना को सिर्फ कागजों या निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसमें जवाबदेही भी तय की गई है. जो भी एजेंसी इस प्रोजेक्ट पर काम करेगी, उसे निर्माण के बाद अगले 15 वर्षों तक इसके संचालन और रखरखाव (ओएंडएम) की पूरी जिम्मेदारी संभालनी होगी.यही नहीं, ट्रीटमेंट प्लांट्स के कामकाज और नदी के पानी की शुद्धता पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखने के लिए इसे पूरी तरह डिजिटल और हाईटेक बनाया जा रहा है. इसके लिए 'स्काडा' (SCADA) और ऑनलाइन कंटीन्यूअस एफ्लुएंट मॉनिटरिंग सिस्टम (OCEMS) जैसी आधुनिक तकनीकें इस्तेमाल होंगी. इससे पानी की गुणवत्ता की लाइव और ऑनलाइन निगरानी की जा सकेगी और कहीं भी कोई गड़बड़ी या लापरवाही दिखते ही तुरंत एक्शन लिया जाएगा.
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सर्वे से बजट तक: फुलप्रूफ होगी डीपीआर की तैयारी
इस पूरी योजना को बेहद कड़े और वैज्ञानिक चरणों से गुजारा जा रहा है ताकि बाद में कोई कमी न रह जाए. सबसे पहले नदी, उसके कैचमेंट एरिया, नालों, वहां की मिट्टी और ढलान का एक विस्तृत और आधुनिक सर्वे किया जा रहा है. इसके बाद सीवेज की मात्रा का सटीक अंदाजा लगाकर सबसे बेस्ट ट्रीटमेंट तकनीक चुनी जाएगी और फिर इंजीनियरिंग डिजाइन और बजट को फाइनल किया जाएगा.बजट तय करने के लिए सरकार के नवीनतम शेड्यूल ऑफ रेट (SOR) का सहारा लिया जा रहा है. इसमें एक सख्त शर्त यह भी जोड़ी गई है कि प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलने के बाद यदि लापरवाही या देरी के कारण लागत बढ़ती है, तो उसका अतिरिक्त आर्थिक बोझ सरकार नहीं उठाएगी, बल्कि काम करने वाली एजेंसी को खुद वहन करना होगा. इसलिए शुरुआती लागत का बेहद सटीक आकलन किया जा रहा है.
नदी संरक्षण का नया मॉडल: चार स्तंभों पर टिकी योजना
बेतवा नदी को नया जीवन देने वाली यह परियोजना सिर्फ एक कंस्ट्रक्शन वर्क नहीं है, बल्कि इसे देश में नदी संरक्षण के एक दीर्घकालिक मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है. यह पूरा प्रोजेक्ट मुख्य रूप से चार मजबूत आधारों पर टिका है—पर्यावरण का संरक्षण, आर्थिक रूप से टिकाऊ बजट, प्रशासनिक जवाबदेही और स्थानीय समाज की भागीदारी. इसका अंतिम लक्ष्य बेतवा के पानी को पूरी तरह साफ करना, शहरों के प्रदूषण लोड को शून्य पर लाना और आम जनता को स्वच्छ जल मुहैया कराना है ताकि साल 2053 की पीढ़ी को भी एक अविरल और निर्मल नदी मिल सके.
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