किस्सा यूपी का: तीसरे CM चंद्रभानु गुप्ता, जो खुद खुलेआम कहते थे- 'गली-गली में शोर है, CB गुप्ता चोर है'
'किस्सा यूपी का' सीरीज की तीसरी किस्त में आज बात यूपी के तीसरे सीएम चंद्रभानु गुप्ता की. जिन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ तो चार बार ली, जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल कभी पूरा नहीं कर सके.
लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था. 15 साल का एक लड़का उस अधिवेशन में जाना चाहता था. उसने अपने बड़े भाई से 5 रुपए मांगे, ताकि वो कांग्रेस के अधिवेशन में जा सके. लेकिन घरवालों ने उसे मना कर दिया. फिर उस लड़के ने किसी से 5 रुपए उधार लिए और लखीमपुर से पहुंच गया लखनऊ. वो कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल हुआ, वहां उसके बड़े भाई भी थे. जिन्होंने उसे देखा तो ताज्जुब करते हुए फिर पहले तो डांटा लेकिन बाद में फिर उसे साथ कर लिया. लेकिन कौन जानता था कि 5 रुपए उधार लेकर कांग्रेस के अधिवेशन में पहुंचने वाला वह बच्चा आगे चलकर इतना बड़ा नेता बनेगा कि वो यूपी का 4-4 बार मुख्यमंत्री बनेगा. हम बात कर रहे हैं यूपी के तीसरे मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता की. जो सीबी गुप्ता के नाम से बड़े मशहूर हुए.
चंद्रभानु गुप्ता का सबसे मशहूर किस्सा- जब खुद कहते थे- 'गली-गली में शोर है, सीबी गुप्ता चोर है'
यूपी के तीसरे सीएम चंद्रभानु गुप्ता के बारे में एक किस्सा बड़ा मशहूर है. अक्सर विपक्ष की ओर से उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाते रहे, पर चंद्रभानु गुप्ता कभी भी इन आरोपों से विचलित नहीं हुए. उल्टे आरोपों की जिक्र पर दिल खोलकर ठहाके लगाकर हंसते थे. कभी-कभी तो वे खुद ही मजाक में कहा करते थे कि 'गली-गली में शोर है, सीबी गुप्ता चोर है.' पर जब चंद्रभानु का निधन हुआ तो उनके बैंक खाते में महज 10 हजार रुपये थे.

यूपी के तीसरे मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता.
अलीगढ़ के बिजौली गांव में हुआ था चंद्रभानु गुप्ता का जन्म
चंद्रभानु गुप्ता मूल रूप से अलीगढ़ के बिजौली के रहने वाले थे. उनका जन्म 14 जुलाई, 1902 को हुआ था. उनके पिता हीरालाल गुप्ता की सामाजिक प्रतिष्ठा थी. ऐसे में चंद्रभानु का मन भी समाजसेवा में लगता गया. वे आर्य समाज से जुड़े. आजीवन ब्रह्मचर्य रहे. उनकी शुरुआती पढ़ाई लखीमपुर खीरी में हुई. चंद्रभानु गुप्ता के 5 रुपए उधार लेकर लखनऊ अधिवेशन में जाने वाली कहानी उसी दौरान की है.
वकालत से राजनीति में आए और फिर छा गए
बाद में उन्होंने लखनऊ से कानून की पढ़ाई की और लखनऊ में ही वकालत करने लगे. कुछ ही दिनों में वो वकालत में बड़े मशहूर हुए. चंद्रभानु गुप्ता ने आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. काकोरी कांड में क्रांतिकारियों के पक्ष में कोर्ट में दलीलें भी दी. बाद में कांग्रेस में उनका कद बढ़ता गया. सत्ता के साथ-साथ संगठन में भी उनका वर्चस्व ऐसा बना कि आलाकमान की नाराजगी के बाद भी वो 4 बार यूपी के सीएम रहे.
4 बार सीएम पद की शपथ ली, लेकिन 5 साल का टर्म कभी पूरा नहीं कर पाए
उत्तर प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता 4 बार मुख्यमंत्री बने, हालांकि उन्हें कभी भी पूरा पांच साल का कार्यकाल नहीं मिला. उनके 4 मुख्यमंत्री कार्यकालों को मिलाकर 1960 और 1970 के बीच कुल लगभग तीन साल और दस महीने का समय रहा. गुप्ता यूपी के पहले मुख्यमंत्री जी.बी. पंत और दूसरे मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद दोनों के मंत्रिमंडलों में मंत्री रहे थे.
1957 और 1958 में मिली चुनावी हार, फिर भी बना रहा दबदबा
1952 में हुए पहले यूपी विधानसभा चुनावों में उन्होंने लखनऊ शहर पूर्व सीट से जीत दर्ज की थी, लेकिन 1957 के चुनावों में वह यह सीट हार गए. फिर 1958 में बुंदेलखंड के मौदहा में हुए उपचुनाव में भी उन्हें हार मिली. इसके बावजूद, यूपी कांग्रेस पर गुप्ता की पकड़ बरकरार रही और चौधरी चरण सिंह और कमलापति त्रिपाठी जैसे मंत्रियों के जरिए वो संपूर्णानंद सरकार की मुश्किलें बढ़ाते रहे. अक्टूबर 1960 में उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (UPCC) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया.
जब संपूर्णानंद ने नवंबर 1960 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो कांग्रेस नेतृत्व ने चंद्रभानु गुप्ता को सीएम बनाने का फैसला किया, जिन्होंने 7 दिसंबर 1960 को पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. फरवरी 1962 में हुए तीसरे यूपी विधानसभा चुनावों के बाद गुप्ता ने दूसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.

कामराज प्लान के तहत चंद्रभानु गुप्ता को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था.
कामराज प्लान के तहत छोड़ना पड़ा सीएम पद
कांग्रेस में बढ़ते गुटबाजी के बीच और सरकार से कुछ नेताओं को संगठन में भेजने की के. कामराज की योजना के तहत, उन्हें 1 अक्टूबर 1963 को इस्तीफा देना पड़ा और उनकी जगह सुचेता कृपलानी को नियुक्त किया गया. मुख्यमंत्री कृपलानी ने 1967 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा, जिसमें कांग्रेस कुल 425 सीटों में से केवल 199 सीटें ही जीत सकी, और इस तरह बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई. इसने गुप्ता के लिए वापसी करने और सबसे बड़ी पार्टी के नेता बनने का रास्ता साफ कर दिया. इस प्रकार उन्होंने तीसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, लेकिन इस बार उनकी पारी केवल 19 दिनों तक ही चल सकी.
चरण सिंह की बगावत के कारण तीसरी बार गंवाई कुर्सी
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस ने चरण सिंह द्वारा तैयार किया गया अपना पहला बड़ा दलबदल देखा, जिन्होंने इसके बाद 'संयुक्त विधायक दल' (SVD) नामक गठबंधन के नेता के रूप में मुख्यमंत्री का पद संभाला. लेकिन चरण सिंह भी ज्यादा दिनों तक सरकार नहीं चला पाए. चरण सिंह सरकार गिरने के कारण कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद मध्य अवधि के चुनावों के बाद सीबी गुप्ता ने 26 फरवरी 1969 को चौथी बार मुख्यमंत्री का पद संभाला.

यूपी के मुख्यमंत्रियों पर किताब लिखने वाले चर्चित पत्रकार श्यामलाल यादव ने चंद्रभानु गुप्ता कैबिनेट की यह तस्वीर एक्स पर साझा की थी.
राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के बीच बोले- मैं इस्तीफा देने जा रहा
इसी बीच 1 अप्रैल 1967 को जब विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा हो रही थी, तब सीबी गुप्ता अचानक खड़े हुए और कहा, "मैं बस इतना अनुरोध करना चाहता हूं कि चूंकि विपक्ष को बहुमत मिल गया है, इसलिए सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी जानी चाहिए. मैं इस्तीफा सौंपने के लिए राज्यपाल के पास जाऊंगा."
कांग्रेस में विभाजन के कारण चौथी बार छोड़ना पड़ा पद
इसके बाद कांग्रेस में विभाजन के परिणामस्वरूप दो धड़े—कांग्रेस (I) और कांग्रेस (O) बने. बहुमत खोने पर उन्हें 17 फरवरी 1970 को सीबी गुप्ता को फिर से इस्तीफा देना पड़ा. गुप्ता कांग्रेस (O) के साथ गए, जिसका नेतृत्व पहले के. कामराज और बाद में मोरारजी देसाई ने किया था, और 1977 में इसका जनता पार्टी में विलय हो गया. इसके बाद गुप्ता को जनता पार्टी का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया.
गुप्ता लखनऊ में विभिन्न शैक्षणिक, समाज कल्याण और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से लगे रहे थे. उन्होंने लखनऊ और यूपी के अन्य स्थानों पर छात्रों के लिए हॉस्टल, रवींद्रालय, चिल्ड्रेन म्यूजियम, बाल विद्या मंदिर, होम्योपैथिक अस्पताल, एक पब्लिक लाइब्रेरी और कई अन्य शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
अविवाहित रहे, परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में नहीं आने दिया
जीवन भर अविवाहित रहे चंद्रभानु गुप्ता अपने "सादा जीवन और सीधे व मददगार स्वभाव" के लिए जाने जाते थे. उन्होंने राजनीति में अपने परिवार के सदस्यों को बढ़ावा नहीं दिया. वह 1970 के दशक की शुरुआत तक यूपी की राजनीति में एक कद्दावर शख्सियत बने रहे, जिसके बाद उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा. हालांकि उन्हें जनता पार्टी का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया था, लेकिन खराब स्वास्थ्य के कारण वह पार्टी की सरकार में कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा सके. मार्च 1980 में उनका निधन हो गया
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