मध्य प्रदेश में नर्सिंग घोटाले की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि अब प्रदेश के बीएड और शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेजों का एक बड़ा 'कागजी साम्राज्य' सामने आया है.दरअसल जमीनी हकीकत यह है कि राज्य में कहीं खाली खेतों में कॉलेज चल रहे हैं, कहीं छोटे स्कूल परिसरों में कक्षाएं लग रही हैं, तो कहीं एक ही खसरा नंबर पर तीन-तीन संस्थान मान्यता लेकर बैठे हैं. ये बात और चौंकाती है कि ऑन-स्पॉट वेरिफिकेशन में भारी गड़बड़ियां और गायब पते मिलने के बावजूद, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय (BU) ने सिर्फ एक नोटरी हलफनामे के आधार पर 125 निजी बीएड कॉलेजों को प्रवेश प्रक्रिया की हरी झंडी दे दी. इस पूरे खेल में उच्च शिक्षा विभाग और खुद उच्च शिक्षा मंत्री की एक विवादित नोटशीट भी सामने आई है जिसने पूरे मामले को और गरमा दिया है.कुल मिलाकर छात्रों के भविष्य से जुड़े इस पूरे शिक्षा कारोबार की जमीनी हकीकत बेहद चौंकाने वाली है.

कागजों में यहां तीन कॉलेज हैं....लेकिन मौके पर पहुंचे तो पता चला कि इसी एक कैंपस में तीन कॉलेज चल रहे हैं.
Photo Credit: अनुराग द्वारी
जमीनी हकीकत: खेत में कॉलेज और कागजों में डिग्रियां
इस जांच की पहली और सबसे हैरान करने वाली तस्वीर भोपाल के विदिशा रोड पर स्थित ग्राम मुगलिया कोट से सामने आती है. सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, यहां 'श्रीराम कॉलेज' खसरा नंबर 148/149/2/1 पर संचालित होना चाहिए, जहां हर साल 150 छात्र (100 बीएड और 50 बीएससी बीएड) पढ़कर निकलते हैं. लेकिन जब मौके पर NDTV टीम ने पड़ताल की तो वहां श्रीराम कॉलेज नाम की कोई संस्था मिली ही नहीं. हमें उस परिसर में तीन भवन दिखे, जिनमें से एक बंद था, दूसरे पर मिलेनियम ग्रुप का बोर्ड था और तीसरा निर्माणाधीन था, जिसके बाहर बगलामुखी कॉलेज का बोर्ड लगा था. श्रीराम कॉलेज के नाम पर दर्ज प्लॉट नंबर 148 असल में सिर्फ एक खाली खेत है, जहां खेती-बाड़ी होती है. यानी जमीन पर कोई कॉलेज, क्लासरूम, लैब या लाइब्रेरी नहीं है, लेकिन कागजों में हर साल एडमिशन, परीक्षाएं और डिग्रियां बांटने का सिलसिला पिछले दस साल से लगातार जारी है. हालांकि एनसीटीई की वेबसाइट में बगलामुखी का पता प्लाट नंबर 150-1 मुगलिया कोट लिखा हुआ है.

हद ये है कि कोर्स कागजों में पूरे हो रहे हैं और दिखावे के लिए बिल्डिंग कहीं और बनी हुई है.
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स्कूल परिसर और एक कमरे से चल रहे प्रशिक्षण संस्थान
गड़बड़ियों का यह सिलसिला केवल मुगलिया कोट तक सीमित नहीं है. भोपाल के ही बावड़िया कलां में 'सेवियर कॉलेज' एक छोटे से स्कूल परिसर के भीतर चलता मिला, जहां मोहल्ले की एक सोसायटी का दफ्तर भी संचालित है. कॉलेज की प्राचार्या डॉ. प्रीति श्रीवास्तव ने खुद स्वीकार किया कि विश्वविद्यालय द्वारा बताई गई कमियों जैसे लाइब्रेरी में किताबें और जर्नल की कमी को उन्होंने अब पूरा कर लिया है. उन्होंने यह भी माना कि छात्र आते हैं, लेकिन जो रेगुलर आना चाहिए, वैसे नहीं आते.
इसी तरह, भोपाल के साकेत नगर में कागजों पर दर्ज 'कमलनाथ बीपीएड कॉलेज' के पते पर पहुंचने पर वहां सिर्फ एक कमरे में एक शिक्षिका बैठी मिलीं. उन्होंने बताया कि कॉलेज कहीं और चल रहा है. इस पर अरेरा एजुकेशन सोसायटी के सदस्य डॉ. वाय पी सिंह ने तर्क दिया कि उन्होंने 2015 से ही शिफ्टिंग के लिए आवेदन किया हुआ है और प्रक्रिया अंडर प्रोसेस है. उन्होंने बताया कि वे छात्रों को प्रैक्टिकल के लिए सुबह बस से दूसरी जगह ले जाते थे. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि नियामक संस्थाओं ने बिना नए पते के वेरिफिकेशन के किस आधार पर इतने सालों तक छात्रों को प्रवेश देने की अनुमति दी?
जांच में खुली पोल, पर 'शपथ पत्र' से मिली क्लीन चिट
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय (BU) के दस्तावेजों के मुताबिक, उनके अधीन कुल 129 बीएड कॉलेज हैं, जिनमें से 127 निजी हैं. कार्यपरिषद (EC) के निर्देश पर जब इन निजी कॉलेजों का भौतिक निरीक्षण कराया गया, तो बेहद गंभीर नतीजे सामने आए. कुल 25 कॉलेजों में बड़ी कमियां मिलीं, 5 कॉलेजों में भारी गड़बड़ियां पाई गईं, 2 कॉलेज अपने पंजीकृत पते पर मिले ही नहीं और 3 कॉलेज ऐसे मिले जो पंजीकृत पते की जगह किसी दूसरी ही लोकेशन से चोरी-छिपे चल रहे थे.
कॉलेजों से सिर्फ इतना लिखवा लिया गया कि वे सभी मानकों को पूरा करते हैं और यदि भविष्य में कमी मिली तो संबद्धता रद्द कर दी जाएगी. प्रशासन का यह रवैया साफ दिखाता है कि यहां 'कार्रवाई बाद में और प्रवेश पहले' की नीति अपनाई गई.
मंत्री की नोटशीट पर बवाल और विश्वविद्यालय की सफाई
इस पूरे मामले में तब नया मोड़ आ गया जब उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार की एक नोटशीट के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन कटघरे में आ गया. दस्तावेजों के अनुसार, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. समर बहादुर सिंह की नोटशीट में मंत्री के निर्देश पर 82 बीएड कॉलेजों की प्रोफाइल को ई-प्रवेश पोर्टल पर 'ओके' कर दिया गया था. इसका सीधा मतलब यह था कि कार्यपरिषद की औपचारिक मंजूरी और संबद्धता मिलने से पहले ही इन कॉलेजों को सीधे एडमिशन प्रोसेस में शामिल कर लिया गया, जिस पर कार्यपरिषद के सदस्यों ने ही कड़ी आपत्ति भी जताई थी. इस विवाद पर रजिस्ट्रार प्रो. समर बहादुर सिंह ने सफाई देते हुए कहा कि मंत्री जी के निर्देश पर जिन 82 कॉलेजों की प्रोफाइल ओके की गई थी, वे निरीक्षण रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से फिट पाए गए थे. हालांकि, उनका यह तर्क नई उलझन पैदा करता है कि अगर कॉलेज पूरी तरह फिट थे, तो कार्यपरिषद की औपचारिक मंजूरी का इंतजार क्यों नहीं किया गया और उनसे हलफनामा क्यों लिया गया?

बगुला मुखी ग्रुप का ये कॉलेज तो सीधा खेतों में ही संचालित हो रहा है.
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श्रीराम और बगलामुखी कॉलेज पर कड़ा रुख, पर सिस्टम मौन
कार्यपरिषद की बैठक में मुगलिया कोट के श्रीराम कॉलेज और बगलामुखी कॉलेज के मामले में कड़ा रुख अपनाने का दावा जरूर किया गया है. तय हुआ है कि इन दोनों कॉलेजों को संबद्धता नहीं दी जाएगी और पूरे मामले की जांच एक सेवानिवृत्त जिला एवं प्रधान न्यायाधीश से कराई जाएगी. जांच इस बात की होगी कि जब निर्धारित स्थान पर कॉलेज ही नहीं था, तो वहां के छात्र परीक्षाओं में कैसे शामिल हुए और पास होकर डिग्रियां कैसे ले गए. हालांकि, यह कड़ा रुख खुद पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा करता है कि जब सालों से वहां कोई भवन नहीं था, तो हर साल भौतिक सत्यापन करने कौन जाता था, परीक्षा फॉर्म कैसे भरे गए और डिग्रियां किसने बांटी?
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'छात्रों के भविष्य' का तर्क और करोड़ों का शिक्षा कारोबार
जब इस पूरे घालमेल और बिना भवन मान्यता देने पर एनडीटीवी ने उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार से सीधा सवाल किया, तो उन्होंने कहा,
मंत्री भले ही इसे छात्रों का भविष्य बचाने का फैसला कहें, लेकिन असलियत यह है कि मध्य प्रदेश में यह बहुत बड़ा और करोड़ों रुपये का निजी शिक्षा कारोबार है. प्रदेश में करीब 600 से अधिक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों में बीएड की 58 हजार से अधिक सीटें हैं, जिनमें हर साल 47 से 48 हजार छात्र प्रवेश लेते हैं. सरकारी कॉलेज नाममात्र के हैं और निजी कॉलेजों की सालाना फीस 30 हजार रुपये या उससे भी अधिक है.
तीन बड़े सवाल
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद व्यवस्था के सामने तीन बड़े और गंभीर सवाल खड़े होते हैं:
- क्या विश्वविद्यालय ने वर्षों तक बिना पर्याप्त भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के इन कॉलेजों को संबद्धता और निरंतरता दी?
- क्या मंत्री की नोटशीट के बाद 82 कॉलेजों को सीधे पोर्टल पर अनुमति देना विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की स्वायत्तता (Autonomy) को कमजोर करता है?
- जिन कॉलेजों में आज भारी कमियां हैं, उन्हें पहले प्रवेश प्रक्रिया में शामिल कर बाद में जांच करना छात्रों के हित में है या निजी संस्थानों के हित में?
जब तक यह कागजी और कानूनी कार्रवाई पूरी होगी, तब तक इन संदेहास्पद कॉलेजों में छात्रों का एक और नया बैच अपनी मोटी फीस भर चुका होगा, प्रवेश ले चुका होगा और शायद डिग्री लेकर निकल भी चुका होगा. यह मामला सिर्फ कुछ कॉलेजों की कमियों का नहीं है, बल्कि उस ढर्रे का है जहां खेत में कॉलेज खड़ा कर दिया जाता है और सब कुछ ठीक बताने के लिए महज एक हलफनामा काफी मान लिया जाता है. मध्य प्रदेश में अब सवाल यह नहीं है कि कितने कॉलेजों में कमियां हैं, बल्कि सवाल यह है कि जो संस्थान खुद आने वाली पीढ़ी के शिक्षक तैयार कर रहे हैं, क्या वे खुद शिक्षा के नाम पर सबसे बड़ा सबक यह दे रहे हैं कि अगर आपके कागज मजबूत हों, तो जमीन की कोई जरूरत नहीं पड़ती?
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