- डालडा ब्रांड की शुरुआत 1930 के दशक में लीवर ब्रदर्स द्वारा की गई थी, जो वनस्पति तेल का व्यवसाय था
- डालडा ने 1950 से 1980 के बीच भारतीय वनस्पति घी बाजार का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त किया था
- डालडा हाइड्रोजनीकरण प्रक्रिया से बना वनस्पति तेल था, जो सस्ता और लंबे समय तक खराब न होने वाला था
Dalda Ghee Downfall story: अगर आप 1960 से 90 के दशक के भारत को याद करेंगे, तो कम से कम दो ऐसी पीढ़ियां सामने आएंगी जो डालडा के स्वाद के साथ बड़ी हुई हैं. यह वह दौर था जब शादियों के कार्ड छपते ही सबसे पहले डालडा के डिब्बों का एडवांस ऑर्डर बुक होता था. उसे देखकर ही बच्चे समझ जाते थे कि आज घर में कोई त्योहार है या कोई खास मेहमान आने वाला है. दरअसल देसी घी के दाम तब भी आम आदमी के बजट से बाहर थे, और ऐसे में पीले टिन और हरे रंग के ताड़ के पेड़ की तस्वीर वाला ये डिब्बा देश के 90% वनस्पति बाजार पर अकेले राज कर रहा था.लेकिन फिर वक्त बदला, सेहत का नजरिया बदला और बाजार के समीकरण भी बदल गए. जो डालडा कभी भारतीय रसोई का पर्याय था, वह धीरे-धीरे थाली से दूर होता गया. आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश के बाजार पर राज करने वाला यह 'सिकंदर' अचानक अर्श से फर्श पर आ गया? क्यों भारतीय परिवारों की सबसे पहली पसंद रहा डालडा देखते ही देखते मार्केट से गायब हो गया? आइए जानते हैं डालडा के उस साम्राज्य की कहानी, जो जितनी तेजी से खड़ा हुआ, उतनी ही खामोशी से बिखर भी गया.

ऐसे पड़ा 'डालडा' नाम
डालडा की शुरुआत 1930 के दशक में हुई थी. तब भारत में पैर पसार रही ब्रिटिश कंपनी 'लीवर ब्रदर्स' ने डच कंपनी 'जैकब वैन डेन बर्ग' से वनस्पति तेल का बिजनेस खरीदा था. वह डच कंपनी भारत में इस घी को 'दादा' (Dada) ब्रांड नाम से इम्पोर्ट करके बेचती थी.
आजादी के बाद डालडा का विज्ञापन अभियान दुनिया के सबसे सफल मार्केटिंग कैंपेन में से एक बना. सड़कों पर घूमती गाड़ियां, लाउडस्पीकर पर प्रचार और सिनेमाघरों में शॉर्ट फिल्मों ने इसे हर घर तक पहुंचा दिया. नतीजा यह हुआ कि 1950 से 1980 के दशक तक डालडा का मार्केट शेयर लगभग 90% तक पहुंच गया. हालत यह थी कि लोग वनस्पति घी नहीं, बल्कि दुकानदार से सीधे कहते थे- "एक किलो डालडा दे दो."
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कीमतों और शेल्फ लाइफ का खेल
देखा जाए तो भारत में शुद्ध देसी घी हमेशा से एक लग्जरी आइटम रहा है, जिसे मध्यमवर्गीय घरों में सिर्फ त्योहारों या खास मौकों पर ही निकाला जाता था. डालडा ने इसी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया. 1930 और 40 के दशक में जब डालडा बाजार में आया, तो यह शुद्ध देसी घी के मुकाबले आधी से भी कम कीमत पर उपलब्ध था. आगे चलकर 1970 और 80 के दशक में भी यह अंतर साफ दिखा. अगर देसी घी 30-40 रुपये किलो था, तो डालडा 12 से 15 रुपये किलो में आसानी से मिल जाता था. यह अंतर बजट संभालने वाली महिलाओं और थोक में मिठाई बनाने वाले हलवाइयों को आकर्षित करने के लिए काफी था. इसके अलावा, साधारण तेल के मुकाबले डालडा की 'शेल्फ लाइफ' यानी खराब न होने की अवधि बहुत ज्यादा थी. हाइड्रोजनीकरण (Hydrogenation) की वजह से यह जमे रहने के कारण महीनों तक खराब नहीं होता था.

क्यों बना असली घी का विकल्प?
डालडा मूल रूप से एक वनस्पति तेल था, जिसे 'हाइड्रोजनीकरण' की रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता था. इस प्रक्रिया में तरल वनस्पति तेल में हाइड्रोजन गैस मिलाकर उसे गाढ़ा और दानेदार बनाया जाता था. इससे उसका रूप, रंग और बनावट बिल्कुल गाय या भैंस के शुद्ध देसी घी जैसी हो जाती थी.कम दाम और देसी घी जैसे रूप के कारण डालडा देखते ही देखते भारतीय किचन्स का 'किंग' बन गया.
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हेल्थ अवेयरनेस और रिफाइंड ऑयल
डालडा के इस सुनहरे सफर को पहला बड़ा झटका तब लगा, जब डॉक्टरों ने 'ट्रांस फैट' (Trans Fat) के नुकसानों पर बात करना शुरू किया. हाइड्रोजनीकरण के कारण डालडा में ट्रांस फैट बहुत ज्यादा था, जो शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाकर दिल की बीमारियों का कारण बनता था.
लोग भारी और जमे हुए वनस्पति घी को छोड़कर लिक्विड रिफाइंड ऑयल की तरफ शिफ्ट होने लगे. हालांकि, 90 के दशक में शादियों और हलवाइयों की दुकानों पर डालडा की डिमांड बनी हुई थी, लेकिन घरेलू बजट से यह बाहर होने लगा था.
2003 में बदला मालिक
डालडा की गिरती सेल और रिफाइंड तेलों के बढ़ते बाजार को देखकर आखिरकार साल 2003 में हिंदुस्तान यूनीलीवर (HUL) ने इस ब्रांड से अपने हाथ खींच लिए. कंपनी ने डालडा ब्रांड को अमेरिकी एग्रीबिजनेस कंपनी 'बंज' (Bunge) को बेच दिया. इस तरह 2000 के शुरुआती सालों में HUL का यह सबसे बड़ा चेहरा बाजार के बदलते रुख के कारण बिक गया.
बदला रूप, आज भी है जिंदा
डालडा आज बाजार से पूरी तरह गायब नहीं हुआ है, बल्कि बंज कंपनी ने 'डालडा' नाम की ब्रांड वैल्यू का चतुराई से इस्तेमाल किया. समय की मांग को देखते हुए कंपनी ने अब 'डालडा' नाम के तहत ही सोयाबीन, सरसों, सनफ्लावर और राइस ब्रान जैसे रिफाइंड तेल बाजार में उतार दिए हैं.हालांकि, मूल 'वनस्पति घी' वाला डालडा आज भी मिलता है, लेकिन घरेलू रसोइयों में इसका इस्तेमाल न के बराबर होता है. आज इसका बड़ा मार्केट सिर्फ कमर्शियल बेकरी, समोसे-कचौड़ी की दुकानों और रेस्टोरेंट्स तक ही सीमित रह गया है. एक दौर के किंगमेकर डालडा की यह कहानी बदलती तकनीक, सेहत के प्रति जागरूकता और नए कॉम्पिटिशन के सामने बड़े-बड़े ब्रांड्स के बदलने की एक बेहतरीन मिसाल है.
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