Dal Bati Churma Name History: दाल बाटी चूरमा का नाम सुनते ही देसी घी की खुशबू और पारंपरिक स्वाद याद आ जाता है. आज राजस्थान की यह डिश हर त्योहार और खास मौके पर शान से परोसी जाती है. लेकिन इसकी शुरुआत बेहद साधारण थी. यह उस समय की देन है जब सैनिकों को जल्दी बनने वाला और पेट भरने वाला खाना चाहिए था. धीरे-धीरे इस साधारण खाने में स्वाद जुड़ता गया और यह खास बन गया. आज यह व्यंजन सिर्फ खाने का हिस्सा नहीं बल्कि संस्कृति और परंपरा का प्रतीक बन चुका है.
कैसे हुआ ‘बाटी' का जन्म?
पुराने समय में सैनिक लंबे समय तक युद्ध में रहते थे और उनके पास खाना बनाने का ज्यादा समय नहीं होता था. ऐसे में उन्होंने आटे की लोइयां बनाकर उन्हें गर्म रेत या अंगारों में दबा देना शुरू किया. कुछ समय बाद यही लोइयां पककर सख्त और सुनहरी हो जाती थीं. इन्हें ही ‘बाटी' कहा गया. यह तरीका आसान था और खाना लंबे समय तक चल सकता था.
दाल ने बढ़ाया स्वाद और ताकत
धीरे-धीरे लोगों ने बाटी के साथ दाल खाना शुरू किया. दाल प्रोटीन से भरपूर होती है और शरीर को ऊर्जा देती है. साथ ही यह बाटी के सूखेपन को कम करती है. इस तरह दाल और बाटी का मेल एक परफेक्ट कॉम्बिनेशन बन गया, जो स्वाद और सेहत दोनों के लिए अच्छा था.
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चूरमा की बनी अलग पहचान
कहते हैं कि चूरमा गलती से बना लेकिन बाद में यह सबसे खास हिस्सा बन गया. जब कुछ बाटियां नरम हो गईं, तो उन्हें तोड़कर घी और गुड़ के साथ मिलाया गया. इससे मीठा और स्वादिष्ट चूरमा तैयार हुआ. ‘चूरमा' का मतलब ही होता है मसलकर बनाना. इसकी मिठास ने इस डिश को और खास बना दिया.
कैसे बना पूरा मील?
दाल, बाटी और चूरमा जब एक साथ परोसे जाने लगे, तब यह एक पूरा मील बन गया. इसमें नमकीन, कुरकुरा और मीठा तीनों स्वाद एक साथ मिलते हैं. यही वजह है कि यह डिश खाने वालों को अलग अनुभव देती है और हर किसी को पसंद आती है.
आज क्यों है इतनी फेमस?
आज दाल बाटी चूरमा राजस्थान की पहचान बन चुका है. यह शादी, त्योहार और खास मौकों पर जरूर बनाया जाता है. इसका स्वाद और इतिहास दोनों इसे खास बनाते हैं.
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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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