रेस्टोरेंट की चमचमाती टेबल और साफ-सुथरा किचन देखकर हम अक्सर मान लेते हैं कि खाना भी सुरक्षित होगा. लेकिन फूड सेफ्टी सिर्फ सफाई तक सीमित नहीं है. World Food Day पर NDTV Food के लिए लिखे आर्टिकल में महाराष्ट्र के कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने बताया कि खाने की सुरक्षा कच्चा माल खरीदने से लेकर उसके आपकी प्लेट तक पहुंचने की पूरी चेन पर निर्भर करती है. पनीर-खोया और तेल कहां से आया, दूध-मांस किस तापमान पर रखा गया, पानी-बर्फ की जांच हुई या नहीं, तेल कितनी बार इस्तेमाल हुआ और खाना किस पैकेजिंग में पहुंचा, इन सभी जगहों पर ऐसे खतरे हो सकते हैं जो ग्राहक को दिखाई नहीं देते.
पनीर-खोया ही मिलावटी हो तो साफ किचन भी क्या करेगा?
मुंढे के मुताबिक Food Safety की पहली कड़ी कच्चा माल है. कई बार सामग्री खुले में, बिना बिल और बिना लाइसेंस वाले सप्लायर से खरीदी जाती है. अगर पनीर, खोया या तेल ही मिलावटी है तो बाद में किचन को कितना भी साफ रखा जाए, उस सामग्री को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता. डेयरी प्रोडक्ट, मांस और सीफूड को सही तापमान पर रखना भी जरूरी है. ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज के दौरान कोल्ड चेन टूटने से जोखिम बढ़ सकता है. इसी तरह खाना बनाने और पीने का पानी और ड्रिंक्स में इस्तेमाल होने वाली बर्फ भी जांची हुई होनी चाहिए. पका हुआ खाना घंटों कमरे के तापमान पर पड़ा रहे या रेफ्रिजरेटर सही से काम न करे तो बैक्टीरिया बढ़ सकते हैं.
एक ही तेल में बार-बार तल रहे हैं खाना ? यहां है बड़ा खतरा
अपने आर्टिकल में मुंढे ने पके हुए तेल के बार-बार इस्तेमाल को भी बड़ी चिंता बताया है . लगातार गर्म करने से तेल खराब होता है और उसमें हानिकारक कंपाउंड बन सकते हैं. FSSAI ने टोटल पोल कंपाउंड यानी TPC की सीमा 25% तय की है, जिसके बाद तेल को इस्तेमाल से हटा देना चाहिए. FSSAI की नीति के मुताबिक इस्तेमाल हो चुके तेल को दोबारा फूड चेन में जाने के बजाय बॉयोडीजल बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है. आर्टिकल में FSSAI के अनुमान के हवाले से बताया गया है कि देश में करीब 220 करोड़ लीटर इस्तेमाल किया हुआ कुकिंग ऑयल को इस काम के लिए रिकवर किया जा सकता है.

एक ही चाकू और चॉपिंग बोर्ड भी बढ़ा सकते हैं खतरा
कच्चे और पके हुए खाने के लिए एक ही चॉपिंग बोर्ड, चाकू या स्टोरेज एरिया इस्तेमाल करने से कच्चे खाने के बैक्टीरिया और दूसरे हानिकारक तत्व पके हुए खाने तक पहुंच सकते हैं. इससे खाना दूषित हो सकता है. मुंढे ने ग्रेवी, मिठाइयों, स्नैक्स और पेय पदार्थों में गैर-अनुमति वाले सेंथेटिक कलर्स के इस्तेमाल को भी संभावित खतरा बताया. खाना बनाने वाले कर्मचारियों की ट्रेनिंग के साथ उनकी सेहत भी मायने रखती है. नियमों के मुताबिक ऐसे कर्मचारियों का प्रशिक्षित और चिकित्सकीय रूप से फिट होना खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है.
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ऑनलाइन खाना मंगाते समय भी जरूरी है सावधानी
तुकाराम मुंढे के मुताबिक ऑनलाइन खाना मंगाने और क्लाउड किचन के मामले में भोजन के रसोई से निकलकर ग्राहक तक पहुंचने के बीच कई और पड़ाव जुड़ जाते हैं. इस दौरान खाना कैसे रखा और पहुंचाया गया, यह ग्राहक की नजरों से दूर रहता है. इसलिए ऑनलाइन खाना पहुंचाने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके प्लेटफॉर्म पर केवल लाइसेंस वाले रेस्टोरेंट और खाना बेचने वाले कारोबारी ही जुड़े हों. खाना किस चीज में पैक किया जा रहा है, यह भी बेहद अहम है. गर्म खाने को घटिया या खाने के लिए सुरक्षित न माने जाने वाले प्लास्टिक में पैक करना नुकसानदेह हो सकता है. अखबार में खाना लपेटना भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसकी छपाई में इस्तेमाल स्याही खाने तक पहुंच सकती है. इसके अलावा किसी व्यंजन में ऐसी सामग्री मौजूद है जिससे कुछ लोगों को एलर्जी हो सकती है, तो इसकी जानकारी ग्राहक को देना भी जरूरी है.
साफ टेबल ही फूड सेफ्टी की गारंटी नहीं है. मुंढे ने हाइजीन रेटिंग और ईट राइट स्टेशन जैसी पहलों का भी जिक्र किया है, जिनका मकसद खाने की जगहों पर बेहतर मानकों को बढ़ावा देना है. उनके मुताबिक सिर्फ साफ-सुथरी जगह देखकर खाने को सुरक्षित नहीं माना जा सकता. खाने का सामान कहां से आया, कैसे रखा गया, पानी-बर्फ की गुणवत्ता कैसी थी, तेल कितनी बार इस्तेमाल हुआ और खाना कैसे तैयार व पैक किया गया, असली खाद्य सुरक्षा इन सभी चीजों पर निर्भर करती है.
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