- सुप्रीम कोर्ट में केरलम के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हुई
- केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हर धर्म के भीतर आंतरिक बहुलता और विभिन्न उप-संप्रदाय मौजूद हैं
- इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संविधान पीठ कर रही है जो धार्मिक परंपरा और मौलिक अधिकारों के टकराव को देखेगी
केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद से उपजे संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. 9 जजों की संविधान पीठ मामले की सुनवाई कर रही है. केंद्र की तरफ से अदालत में पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हर धर्म के भीतर आंतरिक बहुलता मौजूद है. सबरीमाला मामले में अयप्पा भक्त एक अलग संप्रदाय है, यही निर्धारित कर सकते हैं कि कौन-सी प्रथा धर्म का आवश्यक हिस्सा है. संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संप्रदायों को अपनी धार्मिक प्रथाओं का निर्धारण करने का अधिकार है, और इसलिए अयप्पा भक्तों की परंपराओं का सम्मान करना आवश्यक है.
एसजी मेहता और महिला जस्टिस BV नागरत्ना की बहस
तुषार मेहता ने कहा कि सबरीमाला मामले में एक मत यह है कि अनुच्छेद 17 महिलाओं पर लागू होता है, आप उन्हें अछूतों की तरह मान रहे हैं. मुझे इस पर कड़ी आपत्ति है. भारत उतना पितृसत्तात्मक या लैंगिक रूढ़िवादिता वाला देश नहीं है जितना उसको समझाता जाता है. इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि मुझे नहीं पता कि कैसे सबरीमाला मामले के संदर्भ में अनुच्छेद 17 पर बहस की जा सकती है.
जस्टिस नागरत्ना ने अनुच्छेद 17 (छूआछूत उन्मूलन) का हवाला देते हुए कहा इसे सबरीमला पर लागू करना समझ में नहीं आता. एक महिला के तौर पर हर महीने तीन दिन छूआछात हो और चौथे दिन नहीं हो, ऐसा नहीं हो सकता. इस पर तुषार मेहता ने कहा कि वह मासिक धर्म की बात नहीं कर रहे. इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि एक महिला के तौर पर बोलते हुए, अनुच्छेद 17 तीन दिनों के लिए लागू नहीं हो सकता.
तुषार मेहता ने कहा कि वह सबरीमाला का अलग तरीके से बचाव करेंगे. इसका मतलब चार दिन नहीं है, बल्कि एक विशेष आयु वर्ग है. भगवान अय्यप्पन के मंदिर दुनिया भर में सभी वर्गों की महिलाओं के लिए खुले हैं, सिवाय एक विशेष मंदिर के जो एक अपवाद है. दिल्ली में भगवान अय्यप्पन के तीन मंदिर हैं जो सभी के लिए खुले हैं. उन्होंने कहा कि हमें हर धर्म की प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए, हर चीज का संबंध गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से नहीं है. अगर मैं मजार या गुरुद्वारे जाता हूं तो अपना सिर ढकता हूं, तो मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी गरिमा, अधिकार या पसंद छीन ली गई है.
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों पर सुनवाई
9 जजों की संविधान पीठ धार्मिक परंपरा और लोगों के मौलिक अधिकार में टकराव से जुड़े कई अहम सवालों को तय करेगी, जिनके आलोक में विभिन्न धर्म से जुड़े कई अहम मुद्दे तय होंगे. केवल सबरीमाला नहीं, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना (FGM) से संबंधित धार्मिक मामलों की भी समीक्षा की जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट ने दी थी महिलाओं की एंट्री की इजाजत
2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में एंट्री की इजाज़त दे दी थी. जबकि मंदिर की परंपरा के मुताबिक 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं की एंट्री पर रोक थी. इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई पुर्नविचार याचिकाएं दायर की गई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है कि इस मामले में पुनर्विचार करते वक़्त मामला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं रहेगा. कोर्ट ने विचार के लिए ऐसे कई सवैंधानिक सवाल तय किए है, जिनका असर विभिन्न धर्म की परंपराओं पर पड़ेगा.
CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?
सबरीमला मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने केंद्र की दलीलों पर कहा कि हम सूची में देख रहे हैं, उसके अनुसार आप समय का पालन नहीं कर रहे हैं, हम अतिरिक्त समय नहीं देंगे.यहां 33 में से 9 जज उपस्थित हैं. अन्य जरूरी मामले इंतजार में हैं. हर लिखित दलील को हम ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे, लेकिन कृपया समयसीमा का पालन करें.
वहीं केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जो आप तय कर रहे हैं उसका असर देश के संचालन पर कम से कम 30-40 साल तक रहेगा. हम अदालत की चिंता को समझते हैं, लेकिन इसके परिणामों पर भी विचार करना आवश्यक है. हमने यह भी चर्चा की है कि जो कुछ भी अब तर्कित होगा, अगला वकील वही नहीं दोहराएगा.
केंद्र की तरफ से तुषार मेहता की दलील
- 2018 को फैसले में तीन महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज किया गया.
- संविधान सभा की बहसें जो अनुच्छेद 25 और 26 के समावेश का आधार बनीं
- भारत में धर्मों की व्यापकता और बहुलता; यह केवल एक धर्म का मामला नहीं है
- धर्मों के भीतर आंतरिक बहुलता, जिसे पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं दी गई
- भारत में धर्मों की गौरवशाली बहुलता है, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और अन्य
- महत्वपूर्ण यह है कि हर धर्म के भीतर भी आंतरिक बहुलता मौजूद है
- शिरुर मठ मामले और सबरीमला के फैसले में अनुच्छेद 25 और 26 के पूर्ण संवैधानिक दृष्टिकोण की इस तरह से जांच नहीं हुई है
वेदों से लेकर महाभारत तक का जिक्र
तुषार मेहता ने अदालत में वेदों से लेकर महाभारत तक प्राचीन हिंदू और धार्मिक ग्रंथों का हवाला दिया. उन्होंने तर्क दिया कि हिंदू धर्म की सुंदरता यह है कि आप अज्ञेयवादी होते हुए भी हिंदू हो सकते हैं, जिसे व्यापक रूप से सनातन या हिंदू धर्म कहा जाता है, उसकी संरचना विशाल और बहुआयामी है. उन्होंने कहा कि हमारे पास चार वेद हैं - ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद - जो जीवन और आचरण के कई पहलुओं को निर्धारित करते हैं.
फिर हमारे पास उपवेद हैं, जिनमें धनुर्वेद, गंधर्ववेद, आयुर्वेद और अर्थशास्त्र शामिल हैं, जिनमें से अर्थशास्त्र संभवतः आर्थिक पहलुओं पर अधिक केंद्रित है.वेदों के संरक्षण और समझ को सुगम बनाने के लिए छह वेदांग हैं, जिनके नाम हैं शिक्षा, व्याकरण, छंद, निरुक्त, ज्योतिष और कल्प. हमारे पास उपांग ग्रंथ भी हैं, इनमें से एक धर्मशास्त्र है. याज्ञवल्क्य और पराशर द्वारा रचित ग्रंथ तुरंत ध्यान में आते हैं. मेरी समझ के अनुसार, पतंजलि भी इसी श्रेणी में आते हैं.
इसके अलावा पुराण हैं, जिनमें 18 महापुराण और 18 उपपुराण शामिल हैं, साथ ही रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य भी हैं. हमारे पास मीमांसा और न्याय शास्त्र भी हैं. ये सभी वेदों से उत्पन्न हुए हैं और छह मान्यता प्राप्त प्रणालियों में संरचित हैं: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा.
9 जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई
बता दें कि सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस संविधान पीठ मे जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह , जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्नता बी वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं.
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