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सरकार गई, विधायक गए, अब सांसद भी बागी... क्या पार्टी बचा पाएंगी ममता बनर्जी? समझिए

ममता बनर्जी ने 2011 में जितने शानदार तरीके से अपनी शुरुआत की थी, 2026 में उतना ही खराब अंत होता दिख रहा है. विधायकों के बाद सांसदों ने भी बगावत कर दी है. अब ममता बनर्जी के पास अपनी पार्टी और सिबंल बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है.

सरकार गई, विधायक गए, अब सांसद भी बागी... क्या पार्टी बचा पाएंगी ममता बनर्जी? समझिए
काकोली घोष, ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी. (फाइल फोटो)
IANS
नई दिल्ली:

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के 'अच्छे दिन' नहीं चल रहे हैं. ममता बनर्जी इस वक्त जिस राजनीतिक संकट से जूझ रही है, वैसे संकट का उन्होंने पहले शायद ही कभी सामना किया हो. ममता बनर्जी वह शख्सियत हैं, जिन्होंने अपने दम तृणमूल कांग्रेस बनाई और बंगाल में 15 साल सरकार चलाई. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद ममता बनर्जी अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक संकट में फंस गई हैं. 

कल तक जो नेता उनके साथ थे, अब उन्होंने बगावत कर दी है. पहले ममता बनर्जी के हाथ से सरकार गई. उसके बाद विधायक गए. और अब सांसद भी बागी हो गए हैं. 40 दिन पहले तक ममता बनर्जी के पास जो कुछ था, वह सब अब बिखर गया है. 

अब ममता बनर्जी के पास दर्जनभर विधायक और कुछ सांसद ही बचे हैं. इतना ही नहीं, अब तो उनके पार्टी तृणमूल और उसके सिंबल पर भी संकट खड़ा हो गया है.

40 दिन में कैसे बिखरा सब कुछ?

  • 4 मई: विधानसभा चुनाव के नतीजे आए. बीजेपी ने 207 सीटें जीतीं. तृणमूल 80 सीटों पर सिमट गई. खुद ममता बनर्जी भवानीपुर सीट से हार गईं. इस सीट से ममता 2011 से जीत रही थीं. इसके साथ ही 15 साल बाद तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई.
  • 3 जून: महीनेभर के भीतर 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुना. यह ममता बनर्जी के खिलाफ पहली बगावत थी. उसी दिन विधानसभा स्पीकर ने भी ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी. जबकि, तृणमूल ने शोभनदेब भट्टाचार्य का नाम बढ़ाया था.
  • 8 जून: तृणमूल सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने राज्यसभा के साथ-साथ पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दिया. कुछ देर बाद टीएमसी के 11 सांसदों की बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव के साथ बैठक हुई, जिसमें सीएम शुभेंदु अधिकारी थे. बाद में टीएमसी के बागी गुट ने दावा किया कि उनके साथ 20 सांसद हैं. सांसदों के बागी गुट ने काकोली घोष को अपना नेता चुना. बागी सांसदों ने एनडीए को समर्थन देने का ऐलान किया.
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लेकिन ममता से इतनी नाराजगी क्यों?

तृणमूल के बागी विधायकों का कहना है कि उनकी नाराजगी ममता बनर्जी से नहीं है. बल्कि वह अभिषेक बनर्जी से नाराज हैं.

टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने NDTV को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वह चाहते हैं कि ममता बनर्जी उनकी पार्टी को गाइड करे और वह एडवाइजर के तौर पर उनके साथ जुड़े हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा था कि उनकी पार्टी में अभिषेक बनर्जी की कोई जगह नहीं है. उन्होंने यह भी कहा था कि टीएमसी अभिषेक बनर्जी के 'अक्खड़पन' की कीमत चुका रही है.

पार्टी के ज्यादातर नेता अभिषेक बनर्जी और उनके काम करने के तौर-तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं. ऋतब्रत बनर्जी ने कहा था कि ये बगावत 'बॉस कल्चर' के खिलाफ है.

बागियों का दावा है कि टीएमसी सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ गया था. कई नेता आरजी कर मामले में सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए नाराजगी जताई है.

बागी हुए सुखेंदु रॉय ने मीडिया से कहा, 'मैं आरजी कर मामले पर खुले तौर पर आवाज उठाई थी. इसके बाद से पार्टी में मुझे अलग-थलग किया जाने लगा. मेरी बस इतनी सी गलती थी कि मैंने कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग की थी, क्योंकि मेरा मानना था कि सबूत मिटाने में उनकी बड़ी भूमिका थी.'

वहीं, लोकसभा सांसद काकोली घोष ने न्यूज एजेंसी ANI से कहा कि 'हालात बद से बदतर हो जा रहे थे. मैं 40 साल से ममता बनर्जी के साथ रही हूं. वह मेरी गाइड, मेरी मेंटॉर और मेरी नेता रही हैं और मैं उनके साथ तब भी रही हूं, जब वह सत्ता में नहीं थीं. इसलिए यह कहना बेकार है कि वह सत्ता में नहीं हैं, मैंने उन्हें छोड़ दिया. मैं उनके साथ तब भी थी जब वह सत्ता में नहीं थीं, लेकिन उस समय की नीतियां बंगाल के गरीब लोगों के भले के लिए थी. मगर पिछले 3-4 सालों में काम उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ.'

उन्होंने कहा, 'बहुत सारी वित्तीय गड़बड़ियां सामने आई हैं, जो आज साबित हो रही हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, फिल्म इंडस्ट्री जैसे सेक्टर पूरी तरह से ठप हो गए हैं. कानून व्यवस्था ठीक नहीं रही. सरकारी अधिकारियों पर कुछ नेताओं की मनमर्जी के हिसाब से काम करने का बहुत ज्यादा दबाव था.' उन्होंने दावा किया कि राज्य के विकास के लिए वह अलग हो गई हैं.

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अब क्या बचा ममता के पास?

ममता बनर्जी के हाथ से पहले तो 15 साल की सत्ता गई. फिर एक महीने के भीतर करीब 60 विधायकों ने साथ छोड़ दिया. अब सांसदों ने भी बगावत कर दी है. ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि आने वाले दिनों में और भी सांसद उनके साथ आएंगे.

अब ममता बनर्जी के हाथ से उनकी बनाई पार्टी भी निकलती दिख रही है. ममता बनर्जी के पास अब बहुत ज्यादा बचा नहीं है. पहले बागी विधायकों और अब बागी सांसदों ने खुद को 'असली टीएमसी' बताया है. 

संविधान के हिसाब से अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई से ज्यादा सदस्य अलग होते हैं तो उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगी. टीएमसी के दो-तिहाई विधायक और दो-तिहाई सांसदों ने ही बगावत की है. ऐसे में इन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा. इसलिए बागी नेताओं ने विधानसभा स्पीकर और लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर खुद को 'असली टीएमसी' बताया है.

अब ममता के पास अपनी पार्टी और सिंबल बचाना सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए ममता बनर्जी की टीएमसी कानूनी लड़ाई लड़ने के मूड में है. टीएमसी ने कलकत्ता हाई कोर्ट में ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुने जाने के फैसले को चुनौती दी है. इस याचिका पर 11 जून को सुनवाई होगी.

ऋतब्रत बनर्जी और काकोली घोष. (Photo Credit: IANS/FB)

ऋतब्रत बनर्जी और काकोली घोष. (Photo Credit: IANS/FB)

वहीं, बागी लोकसभा सांसदों की नेता काकोली घोष के बारे में एक टीएमसी नेता ने PTI को बताया कि उन्हें चीफ व्हिप के पद से हटाने और उनकी जगह कल्याण बनर्जी को नियुक्त करने की जानकारी ममता बनर्जी ने 20 मई को ही लोकसभा सचिवालय को दे दी थी.  

इस बीच, PTI ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि बागी सांसदों ने तुरंत इस्तीफा देने या बीजेपी में शामिल होने की बजाय खुद को एनडीए को समर्थन करने वाले एक 'अलग गुट' के रूप में माना है. ये दल-बदल कानून से बचने की एक रणनीति है. हालांकि, टीएमसी के बागी लोकसभा सांसदों पर दल-बदल कानून लागू भी नहीं होगा, क्योंकि उनके पास दो-तिहाई सांसद हैं.

हालांकि, अब इस बात की आशंका भी बढ़ गई है कि जिस तरह का हलचल हो रही है, उससे लग रहा है कि बागी सांसद और विधायक अब पार्टी और सिंबल पर भी अपना दावा कर सकते हैं. महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी मामले में ऐसा ही हुआ था. कौनसा गुट 'असली टीएमसी' होगा? इसका फैसला विधानसभा और लोकसभा स्पीकर कर सकते हैं. वहीं, पार्टी और सिंबल को लेकर चुनाव आयोग के अपने नियम हैं, जो कहते हैं कि जिसके पास ज्यादा प्रतिनिधि होंगे, वही 'असली पार्टी' होगा.

बहरहाल, अभी जो कुछ हो रहा है, उसने ममता बनर्जी के सियासी कंट्रोल को कमजोर कर दिया है. ममता की अपनी पार्टी और अपने नेताओं पर पकड़ कमजोर होती जा रही है. अब देखना होगा कि अब तक सबसे खराब दौर से ममता बनर्जी कैसे निकल पाती हैं?

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