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दिल्ली नगर निगम की लगातार लापरवाही से गिर रही बिल्डिंग, मर रहे लोग; सुप्रीम कोर्ट में पेश हुई रिपोर्ट से कई खुलासे

रिपोर्ट के मुताबिक, नगर निगम के रिकॉर्ड बताते हैं कि साइट पर अवैध कंस्ट्रक्शन तीन स्टेज में हुआ था. बिल्डिंग पर पहली बार 2012 में बेसमेंट, ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल पर बिना इजाज़त निर्माण का केस दर्ज किया गया था. 2015 में, निगम ने फिर से दूसरी और तीसरी मंजिल पर बिना इजाज़त निर्माण का केस दर्ज किया.

दिल्ली नगर निगम की लगातार लापरवाही से गिर रही बिल्डिंग, मर रहे लोग; सुप्रीम कोर्ट में पेश हुई रिपोर्ट से कई खुलासे
बीते दिनों दिल्ली में 5 मंजिल वाली बिल्डिंग गिरने से 6 लोगों की मौत हुई थी.
PTI
नई दिल्ली:

दिल्ली में अवैध निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी ने रिपोर्ट दाखिल की है. जिसमें दिल्ली नगर निगम पर लगातार अनदेखी लापरवाही का आरोप लगाया गया है. दिल्ली में बिल्डिंग कानूनों के उल्लंघन पर सख्त एक्शन की मांग की गई है. रिपोर्ट में दुर्घटना की जवाबदेही तय करने, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने के साथ-साथ मृतकों के परिजनों को मुआवज़ा दिलाने की मांग भी की गई है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस का कहना है कि MCD की लापरवाही की वजह से दिल्ली के साकेत इलाके में  बिल्डिंग गिरी, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई. 

सैदुलाजाब में 5 मंजिल वाली बिल्डिंग गिरी, 6 लोगों की मौत

अवैध निर्माण से जुड़े एक देशव्यापी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी वरिष्ठ वकील अजीत कुमार सिन्हा ने आरोप लगाया है कि नगर निगम अधिकारियों की लंबे समय तक लापरवाही और बिल्डिंग कानूनों के लगातार उल्लंघन की वजह से दिल्ली के सैदुलाजाब इलाके में अवैध रूप से बनी पांच मंजिला बिल्डिंग गिर गई, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई और कम से कम 14 अन्य घायल हो गए.

बिना इजाज़त कंस्ट्रक्शन से गिर रही इमारतें 

सुप्रीम कोर्ट में दायर एक स्टेटस रिपोर्ट में, एमिकस क्यूरी के तौर पर काम कर रहे सीनियर एडवोकेट अजीत कुमार सिन्हा ने AOR गोविंद जी के माध्यम से कहा कि 30 मई को प्रॉपर्टी नंबर 261, वेस्टर्न मार्ग, सैदुलाजाब में हुई यह दुखद घटना सालों से बिना इजाज़त कंस्ट्रक्शन और दिल्ली नगर निगम (MCD) द्वारा कानून लागू करने में बार-बार नाकाम रहने का नतीजा थी.

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2012 में ही बिना इजाजत निर्माण का हुआ था केस

रिपोर्ट के मुताबिक, नगर निगम के रिकॉर्ड बताते हैं कि साइट पर अवैध कंस्ट्रक्शन तीन स्टेज में हुआ था. बिल्डिंग पर पहली बार 2012 में बेसमेंट, ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल पर बिना इजाज़त निर्माण का केस दर्ज किया गया था. 2015 में, निगम ने फिर से दूसरी और तीसरी मंजिल पर बिना इजाज़त निर्माण का केस दर्ज किया.

केस के बाद भी चौथी और पांचवीं मंजिल पर चल रहा था काम

इसके बाद, हाल के महीनों में कथित तौर पर चौथी और पांचवीं मंजिल को गैर-कानूनी तरीके से जोड़ा गया, जिसके बाद आखिरकार ढांचा गिर गया. एमिकस ने कहा कि 2015 में उल्लंघन का केस दर्ज करने के बावजूद, निगम प्रॉपर्टी के खिलाफ कोई असरदार कार्रवाई करने में नाकाम रहा.
आरोप लगाया कि अधिकारियों ने न तो जगह को सील किया और न ही जब और मंजिलें बनाई जा रही थीं, तो कोई ज़रूरी कदम उठाए.

2020 में हाईकोर्ट पहुंचे थे बिल्डिंग मालिक

रिपोर्ट में कहा गया कि कंस्ट्रक्शन ने दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन एक्ट और यूनिफाइड बिल्डिंग बायलॉज के नियमों का उल्लंघन किया. रिपोर्ट में आगे कहा गया कि यह मामला कई बार दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा था. दिसंबर 2020 में, बिल्डिंग के मालिक ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि बिना नोटिस के बिल्डिंग गिराने पर विचार किया जा रहा है.

कोर्ट ने साउथ दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को कोई भी कार्रवाई करने से पहले मालिक का पक्ष सुनने का निर्देश दिया. उसी महीने बाद में, हाई कोर्ट में एक और याचिका दायर की गई जिसमें प्रॉपर्टी पर कथित गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन को हाईलाइट किया गया और निगम अधिकारियों पर कोई कार्रवाई न करने का आरोप लगाया गया.

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अधिकारियों ने आंखें मूंद ली थी

निगम ने हाई कोर्ट को बताया कि अगर कोई बिना इजाज़त निर्मांण पाया गया तो सही एक्शन लिया जाएगा. एमिकस क्यूरी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कानूनी जांच के बावजूद, गैर-कानूनी ढांचा खड़ा रहा और बढ़ता रहा. रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 से बिना इजाज़त कंस्ट्रक्शन जारी नहीं रह सकता था, अगर बिल्डिंग रेगुलेशन लागू करने वाले अधिकारियों ने नियमों के उल्लंघन पर "आंखें नहीं मूंद लीं". 

रिपोर्ट में सैदुलाजाब में बिना इजाज़त कंस्ट्रक्शन के बारे में अप्रैल 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट में फाइल की गई एक पिटीशन का भी ज़िक्र किया गया. एमिकस ने आरोप लगाया कि MCD की तरफ से पेश वकील ने कोर्ट के सामने साफ-साफ कहा कि उस प्रॉपर्टी पर कोई कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी नहीं हो रही थी.

रिपोर्ट ने इसे झूठा बयान बताया, और कहा कि इसकी वजह से उस पिटीशन को खारिज कर दिया गया, जिसमें चल रहे गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन के खिलाफ दखल देने की मांग की गई थी. 

बिल्डिंग गिरने के बाद, MCD ने एक असिस्टेंट इंजीनियर और एक जूनियर इंजीनियर को सस्पेंड कर दिया गया. हालांकि, एमिकस ने इस एक्शन को "बाद में की गई और दिखावटी एक्सरसाइज" बताया, और कहा कि जवाबदेही रूटीन सस्पेंशन से आगे बढ़नी चाहिए.

दिल्ली में हो रहे लापरवाही भरे निर्माण पर एमिक्स ने सुप्रीम कोर्ट से कई मांगे की. 

  1. दिल्ली नगर निगम (MCD) को एक हलफनामा करने का निर्देश दिया जाए, जिसमें यह बताया जाए कि दिल्ली नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में स्थित सभी संपत्तियों के संबंध में अवैध एवं अनधिकृत निर्माण तथा आवासीय परिसरों के अनधिकृत उपयोग के मामलों पर क्या सर्वेक्षण किया गया है और क्या कार्रवाई की गई है. 
  2. दिल्ली नगर निगम को अपने अधिकार क्षेत्र में स्थित सभी परिसरों का संरचनात्मक ऑडिट कराने तथा अवैध संरचनाओं को निर्धारित समय-सीमा के भीतर सील करने एवं ध्वस्त  करने का निर्देश दिया जाए. 
  3. दिल्ली नगर निगम को एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया जाए, जिसमें यह बताया जाए कि सैदुलाजाब स्थित अवैध रूप से निर्मित पाँच-मंज़िला भवन का निर्माण जारी रहने की अनुमति कैसे दी गई तथा इस संबंध में दोषी अधिकारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई.
  4. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (GNCTD) तथा दिल्ली पुलिस को हाल ही में हुई उस घटना के संबंध में एक्शन टेकन रिपोर्ट  प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए, रिपोर्ट में नगर निगम के अधिकारियों की कथित संलिप्तता के संबंध में भी विवरण दिया जाए. 
  5. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया जाए, जिसमें यह बताया जाए कि मृतकों के परिवारों को किस प्रकार मुआवज़ा प्रदान किया जा सकता है. 
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गौरतलब है कि मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में हो रहे अवैध निर्माण और भवन निर्माण नियमों के उल्लंघन पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि यह समस्या अब राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी की मांग करती है. अदालत ने 25 मार्च 2026 को पारित एक आदेश में कहा कि उसके सामने आए मामले में न केवल अवैध निर्माण और भवन उपनियमों  का स्पष्ट उल्लंघन पाया गया, बल्कि संबंधित सरकारी अधिकारियों की निष्क्रियता भी सामने आई. 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश के विभिन्न हिस्सों में भवन निर्माण नियमों और भूमि उपयोग संबंधी कानूनों का व्यापक और खुलेआम उल्लंघन हो रहा है. अदालत ने विशेष रूप से चिंता जताई कि कई निर्माण कार्य लागू नियमों और मानकों की अनदेखी करके किए जाते हैं.  

  • प्रतिबंधित क्षेत्रों में भी अवैध निर्माण जारी हैं. निर्माण पूरा होने के बाद भवनों और जमीनों का उपयोग उस उद्देश्य से अलग कार्यों के लिए किया जाता है, जिसके लिए मूल रूप से अनुमति दी गई थी. 
  • संबंधित प्राधिकरण अक्सर ऐसे मामलों में समय पर कार्रवाई नहीं करते. अदालत ने माना था  कि यह कोई एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि पूरे देश में फैली हुई है.
  • इसी कारण पीठ ने कहा कि इस मुद्दे की पैन-इंडिया आधार पर निगरानी आवश्यक है. सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया था कि यदि स्थानीय निकाय, विकास प्राधिकरण और अन्य सक्षम अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का सही ढंग से निर्वहन करें, तो अवैध निर्माणों पर प्रभावी नियंत्रण संभव है.
  • अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानूनों का उल्लंघन कर बनाए गए निर्माणों को बाद में नियमित करने की प्रवृत्ति कानून के शासन को कमजोर करती है.
  • यह टिप्पणी तमिलनाडु के उस मामले की सुनवाई के दौरान की गई थी जिसमें अवैध निर्माण, भवन उपनियमों के उल्लंघन और प्रशासनिक निष्क्रियता के आरोपों की जांच की जा रही थी.
  • अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आवश्यक निर्देश जारी किए और कहा कि ऐसे मामलों पर लगातार निगरानी रखी जानी चाहिए.
  • इस टिप्पणी को अवैध निर्माण, भूमि उपयोग के दुरुपयोग और शहरी नियोजन नियमों के उल्लंघन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के रूप में देखा जा रहा है. 

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