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'बालासाहेब के नाम पर नहीं, अपनी ताकत पर लड़ते', शिवसेना के 'धनुष-बाण' विवाद में SC ने उठाया बड़ा सवाल

शिवसेना के धनुष-बाण चिन्ह विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, चुनाव आयोग दोनों गुटों को अलग-अलग प्रतीकों पर अपनी ताकत से चुनाव लड़ने को कह सकता था.

'बालासाहेब के नाम पर नहीं, अपनी ताकत पर लड़ते', शिवसेना के 'धनुष-बाण' विवाद में SC ने उठाया बड़ा सवाल

शिवसेना और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम टिप्पणी की. सर्वोच्च अदालत ने जो टिप्पणी की है वो इस पूरे मामले का नजरिया ही बदल सकता है. कोर्ट ने पूछा है कि  जब दोनों गुट खुद को असली शिवसेना बता रहे थे, तब चुनाव आयोग ने धनुष-बाण किसी एक को देने के बजाय दोनों से यह क्यों नहीं कहा कि वे नए निशान पर चुनाव लड़ें. अदालत के मुताबिक दोनों पक्षों को जनता के बीच अपनी ताकत साबित करना चाहिए था. 

 "आयोग के पास सिर्फ दो ही रास्ते नहीं थे"

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि चुनाव आयोग के पास सिर्फ दो ही रास्ते नहीं थे कि वह किसी एक गुट को असली शिवसेना मान ले. आयोग चाहती तो दोनों गुटों से कह सकती थी कि वे नया चुनाव चिह्न चुनें और बालासाहेब ठाकरे की विरासत के बजाय अपने दम पर जनता का समर्थन हासिल करें. दूसरे शब्दों में कहें तो अदालत ने पूछा, "जब झगड़ा इतना बड़ा था, तो धनुष-बाण किसी एक को देना जरूरी क्यों था?" बता दें कि सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने ठाकरे गुट की ओर से दलील दी कि यदि धनुष-बाण चिन्ह उन्हें नहीं दिया जा सकता, तो कम से कम उसे 'फ्रीज' कर दिया जाए ताकि किसी भी पक्ष को उसका लाभ न मिले. उनका तर्क था कि सत्ता में आने के बाद शिंदे गुट का समर्थन बढ़ा और चुनाव आयोग ने इस बदले हुए राजनीतिक समीकरण को आधार बना लिया.

इसी फैसले पर टिकी है पूरी लड़ाई

दरअसल, 2023 में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना था और उसे पार्टी का नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह दे दिया था. उद्धव ठाकरे गुट उसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रहा है. ठाकरे गुट का कहना है कि पार्टी सिर्फ विधायकों के आंकड़ों से नहीं चलती. पार्टी के कार्यकर्ता, संगठन और मूल ढांचा भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है. सर्वोच्च अदालत ने साफ किया कि वह चुनाव आयोग का काम अपने हाथ में नहीं ले रहा. लेकिन यह जरूर देख रहा है कि फैसला लेते समय आयोग ने सभी संभावित विकल्पों पर विचार किया था या नहीं. यही वजह है कि जस्टिस बागची ने उस विकल्प का जिक्र किया जिसमें दोनों गुटों को नया चिन्ह देकर चुनाव मैदान में उतारा जा सकता था.

क्यों अहम है सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी?

इस टिप्पणी को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने खुलकर कहा है कि धनुष-बाण को लेकर तीसरा रास्ता भी मौजूद था. अगर आगे चलकर अदालत को लगे कि चुनाव आयोग ने सभी विकल्पों पर ठीक से विचार नहीं किया, तो इससे पूरे विवाद की दिशा प्रभावित हो सकती है. फिलहाल मामले की सुनवाई जारी है और गुरुवार को भी बहस आगे बढ़ेगी.
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