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ईरान vs इजरायल-अमेरिका युद्ध: तेल से लेकर लोगों की थाली तक महंगाई की आंधी कैसे पहुंचेगी भारत, समझिए पूरा गणित

ईरान vs इजरायल-अमेरिका युद्ध का असर आपकी जेब तक पहुंच सकता है. फिलहाल भारत तक इसकी सीधी आंच नहीं पहुंची है पर अगर तेल की कीमतें नहीं घटीं तो आपकी जेब और थाली तक इसका असर पहुंचना तय है. समझिए कैसे ये जंग आपकी जिंदगी पर असर डालने को तैयार है.

ईरान vs इजरायल-अमेरिका युद्ध: तेल से लेकर लोगों की थाली तक महंगाई की आंधी कैसे पहुंचेगी भारत, समझिए पूरा गणित
  • तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, खेती और उत्पादन सब महंगा होता है, जिससे हर चीज की कीमत बढ़ती है.
  • तेल की कीमत बढ़ने का भारत पर असर इसलिए होगा क्योंकि वह तेल और गैस के लिए आयात पर निर्भर है.
  • तो इस जंग का सीधा असर भारत के आम आदमी की थाली, जेब और जिंदगी पर पड़ सकता है.
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28 फरवरी से शुरू हुआ ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध अब अपने आर्थिक असर दिखाने लगा है. जंग शुरू होने के बाद तेल की कीमतें करीब 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ कर 110 डॉलर पर पहुंच गई हैं. इससे दुनिया भर के एक तिहाई से अधिक देशों में डीजल-पेट्रोल और पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स की कीमतें बढ़ने लगी हैं, कई मुल्क ऊर्जा संकट की तपिश झेल रहे हैं. अगर यह युद्ध और लंबा चला तो पूरी दुनिया 70 के दशक की तरह तेल संकट के दौर से गुजर सकती है. फर्क केवल इतना है कि, तब की तुलना में आज दुनिया अधिक जुड़ी हुई है इसलिए इसका असर कहीं जल्दी देखने को मिल सकता है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोमवार को संसद को संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया में कठिन हालत पैदा हो रहे हैं और इसके लिए हमें तैयार रहना होगा. तो चलिए समझते हैं कि तेल के महंगा होने का असर आपकी थाली तक कैसे पहुंच सकता है. ईरान vs इजरायल-अमेरिका युद्ध से आर्थिक मोर्चे पर भारत को कितना खतरा है?

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तेल में कितना उछाल आया

जंग शुरू होने के बाद तेल की कीमतें करीब 70 डॉलर से बढ़कर 100–112 प्रति बैरल पहुंच गई हैं. यानी इसकी कीमतों में 40% से 50% तक उछाल आ गया है. वहीं एलएनजी की कीमतें 60 फीसद तक बढ़ चुकी हैं. वहीं LNG यानी गैस की कीमतें 60% तक बढ़ीं. इसका मतलब है कि केवल तेल नहीं बल्कि पूरी ऊर्जा प्रणाली महंगी हो चुकी है.

दरअसल, दुनिया के कुल तेल सप्लाई का 20 फीसद हिस्सा हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है. एशिया के विभिन्न देशों तक पहुंचने वाले तेल का करीब 80 फीसद हिस्सा इसी रूट से होकर आता है. इस रूट पर आई किसी भी तरह की रुकावट का असर भारत और एशिया के अन्य देशों पर देखने को मिलता है. एक तरफ गैस की कीमतें दोगुनी हो रही हैं तो वहीं कुछ देशों में ब्लैकआउट की नौबत तक आ गई. तेल गैस की कीमतों के बढ़ने का मतलब होगा कि बिजली और उद्योगों पर स्थानीय सरकारों की लागत बढ़ेगी.

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कहां क्या असर?

अंकटाड (यूएन ट्रेड ऐंड डेवलपमेंट) के मुताबिक करीब एक तिहाई (30-35%) नाइट्रोजन उर्वरक यानी यूरिया और 40-45% से अधिक सल्फर भी इसी हॉर्मुज से होकर गुजरता है. यानी आज के हॉर्मुज का तेल सप्लाई संकट कल के लिए फूड सिक्योरिटी पर बड़ा खतरा बन सकता है. कुल मिलाकर करीब 40 फीसद यूरिया और सल्फर सप्लाई पर इसका असर पड़ सकता है, नतीजतन फर्टिलाइजर महंगा हो सकता है. इससे खेती करना महंगा होगा जिसका सीधा असर आपकी थाली में परोसे जाने वाले खाने पर पड़ना तय है.

संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि ग्लोबल फूड प्राइस में तेज उछाल आ सकता है. 

इससे ट्रांसपोर्ट और एविएशन की जेट फ्यूल की कीमतें दोगुना तक बढ़ी, एयरलाइंस फ्लाइट घटा रही हैं. जल्द ही हवाई टिकट और लॉजिस्टिक महंगे हो सकते हैं. वहीं भारतीय स्टॉक मार्केट भी करीब दो साल पुराने स्तर पर आ गया. ग्लोबल बाजार 5 फीसद से अधिक नीचे आया. आर्थिक गतिविधियों के धीमे होने की पूरी संभावनाएं जताई जा रही हैं.

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तेल का गणित

भारत 85-88% तेल आयात करता है. इसका अधिकांश तेल इसी हॉर्मुज के रूट से आता है. एलपीजी का 80–90% आयात इसी रूट से होता है. यानी भारत सबसे अधिक एक्सपोज्ड है. बता दें कि तेल में हर 10% बढ़ोतरी का मतलब महंगाई में +0.3% का इजाफा होना है. अगर तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा, तब भी महंगाई 4.1% तक जा सकती है. वहीं ग्रोथ 6.6% तक गिर सकता है. इससे एक बड़ा मैक्रो-इकोनॉमिक झटका लगेगा. अगर तेल की कीमतें 10 फीसद तक बढ़ती हैं तो सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 20-25 बेसिस पॉइंट तक घट सकता है. 

इसे ऐसे समझें...

जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इससे पूरी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है.  जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो सबसे पहले पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती हैं. इसके बाद इसका असर धीरे-धीरे हर सेक्टर में फैलता है. इसे ऐसे समझते हैं.

पहला असरः पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं.
दूसरा असरः ट्रक, बस, ट्रेन और जहाज का किराया बढ़ता है.
तीसरा असरः फैक्ट्री में उत्पादन की लागत बढ़ती है.
चौथा असरः खेती में डीजल और खाद महंगी होती है.
पांचवां असरः दुकानों तक सामान पहुंचाने की लागत बढ़ती है.
छठा असरः आखिर में आम आदमी को महंगे दाम पर सामान मिलता है.

इसी को इकोनॉमिक्स में कॉस्ट पुश इन्फ्लेशन कहा जाता है.

ऐसे में यह जंग लंबी खिंची तो भारत का ग्रोथ सीधे प्रभावित होगा. दूसरी तरफ रुपया भी लगातार गिर रहा है. अब यह 93.71  रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर आ लुढ़का है. तीन बिलियन डॉलर विदेशी निवेश बाहर गया.

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भारत पर संभावित असर

एलपीजी की कीमतें भारत में बढ़ा दी गई हैं. घरेलू गैस 60 रुपये महंगा हो गया है तो कमर्शियल 100 रुपये प्रति सिलेंडर. सप्लाई में भी पहले की तुलना में देरी हो रही है. इसका असर घर के साथ-साथ होटल और उद्योगों पर भी पड़ रहा है. सबसे अहम ये समझना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चा तेल महंगा होने का चेन रिएक्शन क्या होगा.

तो चलिए बताते हैं कि इसका सबसे पहले असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ेगा, ये महंगे हो सकते हैं. हालांकि पीएम मोदी ने कहा है कि भारत के पास पर्याप्त तेल भंडारण मौजूद है.

लेकिन अगर भविष्य में तेल की कीमतें बढ़ीं तो ट्रांसपोर्ट की लागत भी बढ़ेगी. इससे उत्पादन भी महंगा होगा तो ऐसे में आपके थाली में आने वाला अनाज भी महंगा होगा. एफएमसीजी भी महंगा होगा. यही कारण है कि तेल की कीमत के बढ़ने का पूरी अर्थव्यवस्था पर मल्टीप्लायर असर पड़ता है.

खाने-पीने की चीजों पर सीधा असर: मिडिल ईस्ट गैस और फर्टिलाइजर का बड़ा सप्लायर है. अगर गैस महंगी होती है, तो यूरिया और दूसरे उर्वरकों की कीमत बढ़ जाती है. इससे खेती महंगी हो जाती है. दूसरी तरफ डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती है. जिसका असर सब्जियों, दालों, गेहूं, चावल, दूध, डेयरी उत्पादों की कीमतों पर पड़ेगा. यानी आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी सबसे अधिक प्रभावित होगी. 

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव: देशभर के कल-कारखानों को चलाने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है. अगर बिजली और ईंधन महंगा होगा, तो उत्पादन की लागत बढ़ेगी. इसका असर स्टील और सीमेंट, ऑटोमोबाइल, केमिकल इंडस्ट्री, प्लास्टिक और पैकेजिंग की इंडस्ट्री की लागत पर पड़ेगा. जब इन फैक्ट्री में उत्पादन महंगा होगा, तो कंपनियां कीमतें बढ़ाएंगी. इससे बाजार में इनसे जुड़ी हर चीज महंगी होगी.

इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी पर असर: यह असर थोड़ा छिपा हुआ होता है लेकिन काफी महत्वपूर्ण है. जंग के कारण सप्लाई चेन बाधित होती है. इसमें चिप बनाने के लिए जो जरूरी गैसें और संसाधन चाहिए होते हैं उनकी सप्लाई प्रभावित होंगी. इसका प्रतिकूल असर मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कीमतों पर होगा.

ट्रांसपोर्ट और यात्रा महंगी: क्रूड ऑयल का महंगा होना एविएशन फ्यूल को महंगा करेगा जिससे हवाई टिकट महंगे हो जाएंगे. समुद्री शिपिंग में बीमा और सुरक्षा लागत बढ़ती है. इसका मतलब है कि विदेश से आने वाला हर सामान महंगा होगा.

इसका तुरंत असर पेट्रोल, डीजल, एलपीटी, एयर टिकट पर दिखेगा. 1–2 महीने में सब्जियों, दूध, राशन पर. 3 से 6 महीने में सीमेंट, स्टील के दाम बढ़ने से घर बनाने की लागत बढ़ सकती है. कार, बाइक, इलेक्ट्रॉनिक्स सबके दाम बढ़ सकते हैं.

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सबसे बड़ा खतरा- स्टैगफ्लेशन

अगर यह लड़ाई नहीं रुकी तो दुनिया 1970 की तरह स्टैगफ्लेशन की चपेट में आ सकती है. स्टैगनेशन और इनफ्लेशन को मिलाकर कर बना शब्द है- स्टैगफ्लेशन. यानी एक तरफ मंदी तो दूसरी ओर महंगाई, दोनों साथ-साथ चलेंगी. ऐसी स्थिति में लोगों की क्रय क्षमता बहुत कम हो जाती है. नौकरियां कम हो जाती हैं और बिजनेस तरक्की करना बंद करते हैं यानी व्यवसायों में ठहराव आ जाता है. 1970 के दशक में तेल के संकट के कारण अमेरिका सहित कई विकसित देशों ने स्टैगफ्लेशन का सामना किया था. यानी स्टैगफ्लेशन में मंदी और महंगाई दोनों मिलकर देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर देती है.

ईरान यह भली-भांति जानता है कि वह सीधे अमेरिका से नहीं लड़ सकता इसलिए उसने सप्लाई चेन को तोड़कर ट्रंप पर दबाव बनाने की रणनीति बनाई, हॉर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने की धमकी दी और दक्षिण कोरिया के एक जहाज पर हमला भी कर दिया. हॉर्मुज में मालवाहक जहाज जहां थे वहीं रुक गए, इससे पूरी दुनिया आर्थिक दबाव में आ गई है. कई देशों में तेल की कीमतें 60 फीसद तक बढ़ गईं. ईरान की रणनीति साफ दिख रही है जिसकी वजह से ट्रंप ने उसके बिजली के संयंत्रों पर हमले को अगले पांच दिन के लिए रोकने का एलान किया. 

भारत में फिलहाल इस जंग का सीधा आर्थिक असर नहीं दिख रहा है पर अगर अगले कुछ हफ्ते यह चलता रहा तो महंगाई यहां भी बढ़ेगी. ग्रोथ की गति थमेगी और यह नीचे की ओर बढ़ेगी. जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब और उसकी थाली पर पड़ सकता है.

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