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Explained- रास लाफान के अजूबे GTL प्लांट का नुकसान सुन कर चौंक जाएंगे, समझिए क्यों लगेंगे ठीक करने में 5 साल

ईरान के हमले में रास लाफान LNG प्लांट को कितना बड़ा नुकसान हुआ कि इसकी मरम्मत और उत्पादन पूरी तरह बहाल करने में ही 3 से 5 साल लग सकता है? झारखंड, नेपाल, भूटान, मालदीव, मॉरिशस जैसे देशों के कहीं अधिक है इसके पर्ल गैस-टू-लिक्विड प्लांट का बजट.

Explained- रास लाफान के अजूबे GTL प्लांट का नुकसान सुन कर चौंक जाएंगे, समझिए क्यों लगेंगे ठीक करने में 5 साल
रास लाफान LNG प्लांट
AFP
  • झारखंड-नेपाल के बजट से भी महंगी है रास लाफान प्लांट की मशीनरी. गैस साफ करके ठंडा, कंप्रेस, स्टोर किया जाता है.
  • फिर यहां एक पूरा लोडिंग सिस्टम होता है. इसके बाद सेफ्टी चेक्स का लंबा प्रोसेस होता है. जिसमें महीनों लगते हैं.
  • LNG प्लांट रिफाइनरी+पावर प्लांट+केमिकल फैक्ट्री के समान होते हैं. इनकी मरम्मत में 3-5 साल का लगना वास्तविक है.
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ईरान के हमले में कतर के रास लाफान के LNG प्लांट के पर्ल गैस-टू-लिक्विड (GTL) यूनिट को भारी नुकसान हुआ है उसका खामियाजा आने वाले तीन से पांच सालों तक पूरी दुनिया भुगतने वाली है. तेल कंपनी शेल पीएलसी ने इसकी पुष्टि कर दी है कि कतर के रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी पर ईरान के हमले में उसके पर्ल गैस-टू-लिक्विड प्लांट को नुकसान पहुंचा है. पर्ल गैस-टू-लिक्विड प्लांट में नुकसान हुए एलएनजी सुविधाओं में एक्सॉनमोबिल की हिस्सेदारी भी है, जो कि टेक्सास स्थित एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय ऊर्जा कंपनी है. कंपनी ने बताया है कि इस नुकसान से एलपीजी, हीलियम और नैफ्था के निर्यात पर भारी असर पड़ेगा.

कतर पेट्रोलियम के प्रेसिडेंट और सीईओ साद अल-काबी ने बताया कि एलएनजी कॉन्ट्रैक्ट्स पर पांच साल तक के लिए फोर्स मेज्योर घोषित करना होगा. फोर्स मेज्योर एक फ्रेंच शब्द है, जिसका मतलब होता है- ऐसी अनहोनी या मजबूरी जो इंसान के कंट्रोल से बाहर हो. यानी विभिन्न देशों से सप्लाई का जो वादा किया गया था, उसे कतर अगले पांच साल के दौरान पूरा नहीं कर पाएगा. चीन, यूरोप और एशिया के कई देश जो कतर की गैस पर निर्भर थे, अब अचानक सप्लाई क्राइसिस का सामना कर रहे हैं.

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कितना भारी नुकसान?

रास लाफान में हुए इस नुकसान से हर साल करीब 12.8 मिलियन टन एलएनजी का उत्पादन बंद रहेगा. इससे उसे सालाना करीब 20 बिलियन डॉलर (यानी करीब 1,87,400 करोड़ रुपये) का नुकसान होगा. पर्ल गैस-टू-लिक्विड प्लांट की दो मुख्य प्रोडक्शन लाइनें 2012 में शुरू हुई थीं. तब इसकी लागत 19 बिलियन डॉलर बताई गई थी. यानी करीब 1.78 लाख करोड़ रुपये. आज इससे होने वाले नुकसान का आकलन ही करीब 20 बिलियन डॉलर (1.87 लाख करोड़ रुपये) बताया गया है.

पर्ल गैस-टू-लिक्विड प्लांट में एक्सॉनमोबिल की हिस्सेदारी भी है, जो एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय ऊर्जा कंपनी है

पर्ल गैस-टू-लिक्विड प्लांट में एक्सॉनमोबिल की हिस्सेदारी भी है, जो एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय ऊर्जा कंपनी है
Photo Credit: AFP

झारखंड-नेपाल-भूटान से भी  यह कितनी बड़ी रकम है?

नुकसान कितना बड़ा है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह पिछले महीने झारखंड सरकार के पेश किए गए वित्त वर्ष 2027 के बजट से भी बड़ी रकम है. झारखंड सरकार ने 1.58 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया है. वहीं वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 2024–2025 के दरम्यान नेपाल, भूटान, मालदीव, मॉरिशस, फिजी, बहरीन, जॉर्जिया, आर्मेनिया जैसे कई देशों का बजट इससे कहीं कम था.

जब केवल पर्ल गैस-टू-लिक्विड प्लांट का बजट ही इतना अधिक है तो पूरे LNG प्लांट का बजट इससे कहीं अधिक होगा, यानी रास लाफान कोई साधारण फैक्ट्री नहीं है. बल्कि यहां दुनिया की सबसे जटिल इंडस्ट्रियल मशीनों में से एक का इस्तेमाल होता है. ऐसे में ईरान के हमले से हुआ यह डैमेज केवल पाइप बदलने भर से ठीक नहीं होगा.

जानकार बताते हैं कि इसमें पूरी यूनिट फिर से बनानी पड़ेगी. ऐसे में जहां लागत तो होगा ही, समय भी भरपूर लगेगा. इसकी वजह यह है कि LNG ट्रेन में इस्तेमाल करने के लिए खास मशीनें आसानी से नहीं मिलतीं. 

LNG ट्रेन क्या है? 

जिसे हम LNG प्लांट कहते हैं, उसमें कई ट्रेन होती हैं. इसका मतलब यहां रेलगाड़ी नहीं, बल्कि पूरा गैस प्रोसेसिंग सिस्टम होता है.

एक LNG ट्रेन में गैस को साफ करने का सिस्टम, उसे -162°C तक ठंडा करने वाली मशीनें, बड़े-बड़े कंप्रेसर और टरबाइन, स्टोरेज और लोडिंग सिस्टम होते हैं. यानी एक ट्रेन खुद में एक मिनी फैक्ट्री होती है.

LNG बनाने के लिए गैस को -162 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा करना पड़ता है. इसके लिए हाई-टेक क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी लगती है. स्पेशल मेटल और पाइपिंग चाहिए. बिल्कुल सटीक इंजीनियरिंग की मदद से पूरा सिस्टम तैयार होता है. 

ये भी पढ़ें: रास लफान पर ईरान का हमला- भारत के लिए कितना अहम LNG का ये हब, दुनिया की गैस राजधानी की क्या है कहानी?

LNG प्लांट में कौन-कौन सी मशीनें इस्तेमाल की जाती हैं?

चलिए सबसे पहले बताते हैं कि LNG प्लांट में कौन कौन सी मशीनरी इस्तेमाल की जाती हैं और उनका क्या काम होता है. 

सेंट्रीफ्यूगल कंप्रेसर: इसका इस्तेमाल खास तौर पर रेफ्रिजरेंट गैस और प्राकृतिक गैस को उच्च दबाव के साथ कम आयतन में लाने के लिए किया जाता है. 
रेसिप्रोकेटिंग कंप्रेसर: ये पिस्टन की मदद से गैस का दबाव बढ़ाते हैं और मुख्य रूप से कम फ्लो वाली गैसों के लिए उपयोग किए जाते हैं.
गैस और स्टीम टर्बाइन: ये बड़ी मशीनों (जैसे कंप्रेसर) को चलाने के लिए मुख्य इंजन के रूप में काम करते हैं.
टर्बोएक्सपेंडर: यह मशीन गैस के दबाव और तापमान को अचानक कम करके उसे ठंडा करने में मदद करती है.
क्रायोजेनिक और हीट एक्सचेंज इक्विप्मेंट: ये प्राकृतिक गैस को -162°C  तक ठंडा करके तरल बनाने का कार्य करते हैं.
मेन क्रायोजेनिक हीट एक्सचेंजर: यह एलएनजी ट्रेन का हृदय है, जहां रेफ्रिजरेंट की मदद से गैस को तरल अवस्था में बदला जाता है.
कोल्ड बॉक्स: यह एक अत्यधिक इंसुलेटेड संरचना होती है जिसके अंदर क्रायोजेनिक पाइपिंग और हीट एक्सचेंजर्स सुरक्षित रहते हैं.
एयर-कूल्ड हीट एक्सचेंजर: इनका उपयोग वातावरण की हवा का उपयोग करके गैस को शुरुआती स्तर पर ठंडा करने के लिए किया जाता है.
क्रायोजेनिक पंप: ये विशेष पंप होते हैं जो -162 डिग्री सेल्सियस जैसे अत्यधिक कम तापमान पर तरल एलएनजी को पंप कर सकते हैं.
एलएनजी स्टोरेज टैंक: ये दोहरी दीवार वाले इंसुलेटेड टैंक होते हैं जो तरल गैस को सुरक्षित रखते हैं.
वेपोराइजर: जब एलएनजी को वापस गैस में बदलना होता है, तो वेपोराइज़र का उपयोग उसे गर्म करने के लिए किया जाता है.
एसिड गैस रिमूवल यूनिट: यह मशीन गैस से कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी अशुद्धियों को हटाती है.
नाइट्रोजन रिजेक्शन यूनिट: यह गैस मिश्रण से नाइट्रोजन को अलग करने का कार्य करती है.
फ्रैक्शनेशन कॉलम: इनका उपयोग प्राकृतिक गैस से ईथेन, प्रोपेन और ब्यूटेन जैसे अन्य घटकों को अलग करने के लिए किया जाता है.

ये मशीनें कस्टम-मेड होती हैं, जिसे बहुत कम कंपनियां बनाती हैं और ऑर्डर देने के बाद बनने में ही 12–24 महीने लग सकते हैं. बड़े गैस टरबाइन, क्रायोजेनिक हीट एक्सचेंजर, हाई-प्रेशर कंप्रेसर जैसी मशीनरी को रिपेयर करना नया प्लांट बनाने जैसा हो जाता है.  

जब कोई प्लांट डैमेज होता है, तो सिर्फ मशीन नहीं पूरी सप्लाई चेन टूट जाती है. इसे रिपेयर करने में इंजीनियर और एक्सपर्ट्स को बुलाना, अलग-अलग देशों से पार्ट्स मंगाना, समुद्र के रास्ते भारी मशीनें लाना पड़ता है. इस समय युद्ध चल रहा है, ऐसे में यह और मुश्किल हो जाएगा.

सेफ्टी चेक्स एक लंबा प्रोसेस

इसके बाद आएगा सेफ्टी चेक्स का काम. यह एक लंबा प्रोसेस होता है. अगर ठीक से हैंडल न किया जाए तो LNG बहुत खतरनाक गैस हो सकती है. लिहाजा प्लांट के रिपेयर करने के बाद हर पाइप, हर वाल्ट का टेस्ट किया जाता है. प्रेशर टेस्ट किया जाता है. कहीं से कोई लीकेज न हो इसकी गहन जांच की जाती है. इसके लिए अंतराष्ट्रीय सेफ्टी स्टैंडर्ड्स फॉलो किए जाते हैं. ये प्रक्रिया कुछ हफ्ते या महीनों में नहीं बल्कि कई बार सालों तक चलती है.

जैसा कि कतर के रास लाफान LNG प्लांट के बारे में बताया गया है कि वहां का गैस-टू-लिक्विड प्लांट भी क्षतिग्रस्त हुआ है. यह गैस को डीजल और पेट्रोल जैसे लिक्विड फ्यूल में बदलता है. यानी नुकसान सिर्फ गैस का नहीं, बल्कि फ्यूल सप्लाई का भी है. जीटीएल प्लांट तो और भी जटिल होता है, जिसे ठीक करने में और अधिक समय लगता है. दुनिया में ऐसे प्लांट गिने-चुने हैं.

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आसान नहीं है बैकअप पाना

अमेरिका और कतर में बड़े पैमाने पर LNG का उत्पादन होता है. ये बिलियन डॉलर प्रोजेक्ट्स यानी बेहद महंगे होते हैं. ऐसे में इन्हें बदलना बहुत आसान भी नहीं होता है. इसलिए अगर एक बड़ा प्लांट बंद होता है, तो उसका बैकअप तुरंत नहीं मिलता.

इसे ऐसे समझे कि अगर एक छोटी फैक्ट्री में आग लग जाए तो उसे 2–3 महीने में ठीक किया जा सकता है. लेकिन एलएनजी प्लांट कहीं बड़े स्तर पर होता है, जिसमें एक पूरी रिफाइनरी, पावर प्लांट और केमिकल फैक्ट्री के साथ होती हैं. इसलिए इसकी मरम्मत के काम में तीन से पांच साल का लगना वास्तविक है. मशीने बेहद एडवांस और कस्टम्ड होती है लिहाजा साद अल-काबी ने जो 3 से 5 साल का समय बताया है वो ग्राउंड रियलिटी है.

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