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दम दम दवाई, चौराम-चौराम: बंगाल में चुनाव के बाद हिंसा का लंबा है इतिहास

कांग्रेस के दौर से पश्चिम बंगाल में शुरू हुआ चुनाव के बाद हिंसा का चलन वामदलों और ममता दीदी की जीत के बाद भी होता रहा. इस बार भी हिंसा दिखी है लेकिन फर्क बस इतना है कि यह पहली बार है जब बंगाल में चुनाव जीतने वाली टीम हिंसा झेल रही है.

दम दम दवाई, चौराम-चौराम: बंगाल में चुनाव के बाद हिंसा का लंबा है इतिहास
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  • 1960-70 में नक्सलबाड़ी आंदोलन और स्थानीय राजनीतिक अस्थिरता के दौर में वैचारिक वर्चस्व के लिए हिंसा हुई थी.
  • 1977-2011 के बीच वामपंथी शासन के दौरान हिंसा को कैडर का रूप मिला. सिंगूर और नंदीग्राम जैसे हिंसक संघर्ष हुए.
  • 2011 से 2026 तक तृणमूल कांग्रेस का दौर में भी चुनावी के बाद का हिंसा का पुराना पैटर्न जारी रहा.
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दम दम दवाई, सायेस्ता कोरा , चौराम-चौराम जैसे शब्दों का पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद खूब इस्तेमाल होता रहा है. ये वहां दबा कर पिटाई करने से लेकर बदला लेने तक कुछ भी हो सकता है. ये शब्द बोलचाल की भाषा में इस्तेमाल किए जाते हैं. कांग्रेस के दौर से शुरू हुआ चुनाव के बाद बंगाल में हिंसा का चलन वामदलों और ममता दीदी के दौर में बदस्तूर जारी रहा. इस बार भी हिंसा दिखी है, फर्क बस इतना है कि पहली बार चुनाव जीतने वाली पार्टी अधिक हिंसा झेल रही है.

6 मई को बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी के निजी सहायक (पीए) चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई. जानकार इसकी वजह टीएमसी की हार की हताशा को बताते हैं. हालांकि कुछ हिंसा की खबरों में बीजेपी के कार्यकर्ताओं पर भी आरोप लगाए गए हैं लेकिन बीजेपी की राज्य नेतृत्व ने कहा है कि पार्टी किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं करती है.

दमदम दवाई का मतलब 'सीधी कार्रवाई' से रहा है. वहां चुनाव जीतते ही स्थानीय गुट सत्ता पक्ष की ओर मुड़ जाते थे तो स्थानीय कामों में भी सीधे सत्ताधारी दल का दखल हो जाया करता था. पार्टी कार्यकर्ताओं के माध्यम से इलाकों पर कब्जा जमाना, राजनीति से प्रभावित स्थानीय प्रशासन और अपराधियों को बिचौलिए के तौर पर इस्तेमाल करना आम था.

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दबंगों के दबदबे पर कट की राजनीति

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि वहां चुनाव के बाद हिंसा होती है और खुद का एक वाकया भी सुनाया था. उन्होंने बताया कि कैसे वो मौत के मुंह से बचे और चुनाव के बाद कोलकाता में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के घर पर पनाह लिया करते थे.

जानकार कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस के दौर में दबंगों के दबदबे पर कट (अवैध कमीशन) की राजनीति का बोलबाला हो गया.

2011 में जब तृणमूल सत्ता में आई थी तो लोगों को यह राहत मिलने की उम्मीद थी कि जोर-जबरदस्ती करने वाले संगठन का खात्मा हो गया है पर ममता की पार्टी ने अपने शासनकाल में यह अनुभव कराया कि मशीनरी बदली नहीं बस हाथ बदल गए हैं.

जब तृणमूल ने 2011 में अपने शासन की शुरुआत की तब वामपंथी दलों ने बड़े पैमाने पर हिंसा का आरोप लगाया. तृणमूल के शासन में रंगदारी और कटमनी वसूलने के आरोप बार-बार लगते रहे.

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बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास

बंगाल में राजनीतिक हिंसा की जड़ें बहुत गहरी हैं. इसे तीन अलग अलग चरणों में देखा जाता है. 

पहला, 1960-70 के दशक में कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच होने वाले संघर्ष- तब नक्सलबाड़ी आंदोलन और स्थानीय राजनीतिक अस्थिरता के दौर में वैचारिक वर्चस्व के लिए हिंसक झड़पे शुरू हुई थीं.

दूसरा, 1977-2011 के बीच 34 साल के वामपंथी शासन के दौरान होने वाली हिंसा- उस दौरान हिंसा का कैडर का रूप मिला. सीपीआईएम ने ग्रामीण इलाकों तक अपना नियंत्रण बनाया. राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए सिंगूर और नंदीग्राम जैसे हिंसक संघर्ष हुए. 

सुंदरबन के मरीचझापी की हिंसा- बांग्लादेश से आए हजारों दलित हिंदू शरणार्थी (खास कर मतुआ समुदाय) सुंदरबन के मरीचझापी द्वीप में बसाए गए थे. ज्योति बसु सरकार ने इन शरणार्थियों को 'अवैध अतिक्रमणकारी' घोषित किया और पूरे द्वीप की नाकेबंदी की गई. रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने द्वीप पर खाने-पीने की आपूर्ति काट दी, पानी में जहर मिला दिया और गोलियां चलाईं, जिससे कथित तौर पर सैकड़ों से लेकर हजारों लोग मारे गए.  तब इस घटना की रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध था. जिसकी वजह से वर्षों तक इस खूनी संघर्ष की मुख्यधारा को जानकारी नहीं थी.  

तीसरा, 2011 से अब तक- तृणमूल कांग्रेस का दौर. 2011 में जब ममता बनर्जी ने सत्ता संभाली तो परिवर्तन के वादों के बावजूद चुनावी हिंसा का पुराना पैटर्न जारी रहा. वामपंथियों की जगह मुख्य मुकाबला धीरे-धीरे टीएमसी और बीजेपी के बीच केंद्रित हो गया.

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तृणमूल के शासन काल में चुनावी हिंसा

2011 विधानसभा चुनाव में जब वाम दलों के हाथ से सत्ता तृणमूल कांग्रेस के हाथों में आई थी, तब नतीजे आने के तुरंत वहां बाद व्यापक हिंसा हुई थी. रिपोर्ट्स के अनुसार, चुनाव के बाद लगभग 50 सीपीआई (एम) कार्यकर्ताओं की कथित तौर पर हत्या कर दी गई थी.

2018 पंचायत चुनाव में जमीनी स्तर पर विपक्षी उम्मीदवारों को रोकने के लिए भारी हिंसा हुई थी. हिंसा के डर से लगभग 34% सीटों पर टीएमसी उम्मीदवार निर्विरोध जीत गए, क्योंकि विपक्ष को नामांकन ही नहीं भरने दिया गया.

2021 विधानसभा चुनाव के परिणाम (2 मई 2021) घोषित होने के बाद राज्यव्यापी भीषण हिंसा भड़क उठी थी. कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश पर सीबीआई (CBI) को हत्या और बलात्कार जैसे मामलों की जांच सौंपनी पड़ी. हजारों विपक्षी समर्थकों को राज्य छोड़ कर पड़ोसी राज्यों में पनाह लेनी पड़ी थी.

इसी तरह 2023 के पंचायत चुनाव प्रशासनिक स्तर पर सबसे खूनी संघर्षों वाले थे. तब नामांकन से लेकर मतगणना तक 45 से 60 लोगों की मौत दर्ज की गई. केंद्रीय बलों की तैनाती के बावजूद बम दागने और मतपेटियां लूटने की घटनाएं हुईं थीं. 

अब 2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के परिणाम जारी होने के तुरंत बाद 5 मई से ही हिंसा की छिटपुट घटनाएं होने लगीं. 6 मई को बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी के निजी सहायक (पीए) चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई. मालदा, मुर्शिदाबाद और दक्षिण 24 परगना में आगजनी और हत्याओं के बाद 400 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया.

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आखिर बंगाल में चुनाव के बाद क्यों होती रही है हिंसा?

पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद की हिंसा एक गहरी और चिंताजनक राजनीतिक परिपाटी बन चुकी है. यहां चुनाव खत्म होने या नतीजे आने के बाद विपक्षी कार्यकर्ताओं, समर्थकों और उनके परिवारों को निशाना बनाया जाता रहा है. यह सिलसिला किसी एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि दशकों से सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक वर्चस्व का एक क्रूर जरिया रहा है. स्थानीय सहकारी समितियों, पंचायतों और पीडीएस सिस्टम पर नियंत्रण. कैडर और बदला लेने का प्रचलन. देसी हथियारों, क्रूड बमों की आसान उपलब्धता इसकी बड़ी वजह है जिसे पुलिस या तो स्वतः या सत्ता के दबाव में मूक बन कर देखती आई है.

बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन पर स्थानीय सरकारी समितियों, पंचायतों और राशन वितरण प्रणालियों का सीधा नियंत्रण होता है. सत्ताधारी पार्टी का इनपर कब्जा होता है. चुनाव के बाद विरोधी गुट को पूरी तरह साफ करने की कोशिश की जाती है ताकि कोई चुनौती न बचे. यानी यह रानजीतिक एकाधिकार जमाने का मसला भी रहा है.

विपक्षी दल अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि हिंसा की ऐसी किसी भी परिस्थिति में राज्य की पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है या सत्ताधारी दल के दबाव में काम करती है. इससे अपराधियों में कानून का डर खत्म हो जाता है. यानी पुलिस और प्रशासन का पूरी तरह राजनीतिकरण कर दिया जाता है.

जो सबसे बड़ा कारण जानकार बताते हैं वो है कैडर संस्कृति का प्रचलन और बदला लेने की भावना का बलवंत होना. दशकों से पार्टियों ने अपने जमीनी कार्यकर्ताओं (कैडर्स) को हिंसक झड़पों के लिए तैयार किया है. चुनाव के दौरान जो भी कड़वाहट या संघर्ष होता है, नतीजे आने के बाद जीतने वाला गुट उसका बदला हारने वाले गुट से लेता है.

हिंसा की इन वारदातों में बंगाल में क्रूड बमों का व्यापक तौर पर इस्तेमाल होते देखा गया है. इसकी एक वजह इन बमों का आसानी से मिलना है. बंगाल के राजनीतिक संघर्षों में अवैध रूप से बनने वाले क्रूड बमों और हथियारों का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है. ये किसी मामूली विवाद को भी बड़ा हिंसक रूप दे देते हैं.

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