- ममता की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि वे राजनीतिक हार या दबाव को भी मोरल विक्ट्री में बदल देती हैं.
- चुनाव हो या धरना-प्रदर्शन. ममता ने हर बार 'मैं नहीं झुकूंगी' वाला संदेश दिया.
- पीछे नहीं हटना, आखिरी तक डटे रहना और टकराव को ही ताकत में बदल देने की कला की माहिर हैं ममता बनर्जी.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में ममता बनर्जी की टीएमसी 214 सीटों से 80 सीटों पर आ सिटी. लेकिन बुरी तरह हारने के ठीक अगले दिन (05 मई 2026) ममता बनर्जी ने एलान किया कि, “मैं गवर्नर को इस्तीफा नहीं दूंगी.” इसे मजह एक बयान नहीं, बल्कि सोची-समझी सियासी चाल माना जा रहा है. ममता चाहती हैं कि वो खुद इस्तीफा न दें बल्कि उन्हें हटाया जाए, ताकि इसे उनकी हार नहीं, बल्कि शहादत और राजनीतिक अन्याय के नैरेटिव के रूप में बदला जा सके.
ममता के ‘इस्तीफा न देने' की पॉलिटिक्स क्या है?
ममता आक्रामक रुख भी अपना सकती हैं और धरना, प्रदर्शन या सीधा सड़क पर उतरने की राजनीति देखने को मिल सकती है. ममता बनर्जी की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि यह उनका नया तरीका नहीं है. उनका पूरा करियर इसी रणनीति पर टिका रहा है. पीछे नहीं हटना, आखिरी तक डटे रहना और टकराव को ही ताकत में बदल देने की कला की माहिर हैं ममता बनर्जी.
इससे जुड़ी 7 जनवरी 1993 की वो घटना है जब केंद्र सरकार में मंत्री के ओहदे पर बैठीं ममता, नादिया जिले के एक गांव से उस गूंगी-बहरी लड़की को लेकर रॉयटर्स बिल्डिंग पहुंची थीं जिसके साथ रेप की खबर तब कुछ दिनों से सुर्खियों में थी. बलात्कार करने का आरोप सीपीएम के कार्यकर्ता पर था और बंगाल में इसी पार्टी के मुखिया के रूप में ज्योति बसु मुख्यमंत्री थे.

33 साल पहले रॉयटर्स बिल्डिंग में क्या हुआ था?
ममता उस रेप पीड़िता को ज्योति बसु से न्याय दिलाने की मांग को लेकर रॉयटर्स बिल्डिंग की ओर बढ़ीं, लेकिन ज्योति बसु न ममता से न ही उस रेप पीड़ता से मिले. पुलिसकर्मियों ने ममता को रॉयटर्स बिल्डिंग छोड़ने को कहा. ममता रॉयटर्स बिल्डिंग के बाहर ही धरने पर बैठ गईं. पुलिसकर्मियों ने उन्हें हटाने की बहुत कोशिश की फिर उनकी झड़प हो गई. उस दौरान पुलिसकर्मियों ने बालों से उन्हें खींच कर ममता को बिल्डिंग से बाहर निकाला. उन्हें लाल बाजार पुलिस मुख्यालय ले जाया गया. जमानत देने से इनकार किया गया.
इतना ही नहीं, अगले दिन मीडिया में इस खबर को बेबाकी से छापने वालों को भी वामदलों की सरकार की गाज झेलनी पड़ी. मुख्यमंत्री कार्यालय रॉयटर्स बिल्डिंग में प्रेस कॉर्नर को तोड़ दिया गया, ताकि मीडिया वाले मुख्यमंत्री तक आसानी से नहीं पहुंच सकें.
उस घटना के बाद ममता बनर्जी ने प्रण लिया कि वो रॉयटर्स बिल्डिंग में तब ही जाएंगी जब सिर ऊंचा कर अंदर जा सकें और अगले 18 साल वो इस बिल्डिंग में नहीं गईं. आखिर 20 मई 2011 को बतौर मुख्यमंत्री ही ममता रॉयटर्स बिल्डिंग दोबारा पहुंचीं.
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"मैं नहीं झुकूंगी"
तो 1993 में रायटर्स बिल्डिंग की उस घटना को ममता ने हार नहीं, बल्कि अपने संघर्ष की पहचान में तब्दील कर दिया. ममता ने तब पीछे हटने के बजाय 'हटाए जाने' की राजनीति को चुना.
इसी तरह 1975 में जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़कर विरोध करना हो, या 2006-07 में सिंगूर में टाटा मोटर्स के प्रोजेक्ट के खिलाफ हफ्तों धरना देना, ममता ने हर बार यही दिखाया है कि वे टकराव से पीछे नहीं हटतीं. उस घटना ने ममता को राष्ट्रीय स्तर पर एक बागी चेहरे के रूप में पहली बार पहचान दिलाई.
शहादत' की राजनीति, हार को नैरेटिव में बदलने की कला
ममता की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि वे राजनीतिक हार या दबाव को भी मोरल विक्ट्री में बदल देती हैं. वे लोगों के बीच जा कर अपने संघर्षों को जनता के साथ जोड़ती हैं. ये उनकी एक बड़ी राजनीतिक पूंजी है.
उन्होंने रेल मंत्री रहते हुए कई बार नीतियों पर अपनी ही सरकार से टकराव दिखाया. बाद के वर्षों में भी ममता अक्सर केंद्र की नीतियों के खिलाफ खुलकर बोलती रहीं, जिससे उनकी छवि एक स्वतंत्र और दबाव न मानने वाली नेता की बनी.
2011 में जब उन्होंने वाममोर्चा को हराकर बंगाल की सत्ता हासिल की, तो यह उनकी लंबे संघर्ष की जीत थी. लेकिन सत्ता में आने के बाद भी उनका अंदाज नहीं बदला. 2019 में उन्होंने कोलकाता में सीबीआई बनाम राज्य पुलिस विवाद के दौरान धरना दिया, जिसे कई लोगों ने केंद्र सरकार के खिलाफ खुली चुनौती माना.
2021 के विधानसभा चुनाव में उनकी जिद और भी साफ दिखी. नंदीग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान चोट लगने के बावजूद वे व्हीलचेयर पर बैठकर पूरे राज्य में रैलियां करती रहीं. यह तस्वीर पूरे देश में उनकी ‘फाइटर' छवि को और मजबूत कर गई.
2019 में सीबीआई के खिलाफ उनका धरना हो या 2021 में व्हीलचेयर पर चुनाव प्रचार, हर बार उन्होंने 'मैं नहीं झुकूंगी' वाला संदेश दिया.
इसके अलावा भी कई मौके ऐसे आए जब ममता बनर्जी ने अपने जिद्दी स्वभाव का प्रदर्शन किया. 2012 में खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के मुद्दे पर उन्होंने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया. 2018 में पंचायत चुनावों के दौरान विपक्ष के आरोपों के बावजूद उन्होंने अपने फैसलों पर कोई नरमी नहीं दिखाई. 2023-24 के दौरान केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाना.
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जिद, अड़ियलपन या रणनीतिक मजबूती?
आलोचक इसे ममता का अड़ियलपन कहते हैं, लेकिन उनके समर्थक इसे उनकी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं. साल 1997-98 में जब कांग्रेस को छोड़कर तृणमूल पार्टी का गठन किया तो वो भी एक जिद का नतीजा ही था. तब नई पार्टी बनाने का फैसला जोखिम भरा था लेकिन बाद में यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत में बदल गया. उन्हें अक्सर स्ट्रीट फाइटर और जिद्दी नेता कहा जाता है.
04 मई के चुनावी नतीजे के बाद आया ममता ये बयान उनकी उसी पुरानी राजनीति का हिस्सा है, जिसमें वो राजनीति के मैदान में डटे रहती हैं, और यह जिद लिए तब तक कोशिशों में जुटी रहती हैं जब तक हालात उनके पक्ष में न मुड़ जाए. भारतीय राजनीति में ममता की पहचान एक ऐसी नेता की है, जो हार मानना नहीं जानती.
अब नजर इस बात पर है कि आगे क्या होता है. लेकिन अगर इतिहास को देखें, तो यह तो स्पष्ट है कि ममता बनर्जी के लिए यह लड़ाई तब तक चलेगी, जब तक वो खुद चाहेंगी क्योंकि इतिहास गवाह है कि हालात चाहे जैसे भी हों वो इस स्ट्रीट फाइटर को मजबूर नहीं करते.
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