- I-PAC भारत की सबसे प्रभावशाली चुनावी कंसल्टेंसी है, जिसकी शुरुआत 2013 में हुई
- इसने कई राज्यों में चुनावी रणनीति बनाकर सरकारें बनवाईं
- अब विवाद, जांच और राजनीतिक अविश्वास के चलते इसके मॉडल पर सवाल उठ रहे हैं
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हार के बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने चुनाव कंसल्टेंसी फर्म I-PAC से नाता तोड़ लिया है. बताया गया है कि सपा प्रमुख ने I-PAC को इलेक्शन मैनेजमेंट और सोशल मीडिया से जुड़ा काम I-PAC और शोटाइम कंसल्टिंग को दिया था. लेकिन एनडीटीवी को मिली जानकारी के अनुसार अब समाजवादी पार्टी आईपैक से काम नहीं लेगी.
I-PAC का नाम आते ही वो चुनाव प्रबंधन कंपनी जेहन में आती है जिसने भारत की चुनावी राजनीति को बदल दिया. I-PAC ने डेटा, माइक्रो-मैनेजमेंट और नैरेटिव के मिश्रण से चुनाव जीतने का फार्मूला बनाया और विभिन्न पार्टियों को कई चुनाव जिताए. लेकिन करीब दो दशकों तक सफलता के झंडे गाड़ने वाली यह चुनाव कंसल्टेंसी फर्म बनी कैसे, चलती कैसे है, पैसा कहां से आता है, और अब पार्टियां इससे दूरी क्यों बनाने लगी हैं? चलिए विस्तार से जानते हैं...

I-PAC: जिसने राजनीति बदल दी
इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमिटी यानी I-PAC की शुरुआत 2013 में Citizens for Accountable Governance यानी 'जनता के लिए जवाबदेह शासन' के रूप में हुई थी.
I-PAC आईपैक की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक इसकी शुरुआत 2013 में सिटिजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) के नाम से हुई थी. आईपैक की वेबसाइट ने लिखा है कि संस्था दूरदर्शी नेताओं के साथ काम करती है जिनका प्रूवन ट्रैक रिकॉर्ड है. कंपनी नेताओं को जनता आधारित एजेंडा बनाने में मदद करती है और उनके साथ मिलकर इसे प्रभावी तरीके से लागू करती है, ताकि उस एजेंडा को जनता तक पहुंचाया जाए और बड़े समर्थन को जुटाया जा सके.
इसे प्रशांत किशोर और उनकी टीम ने बनाया जिसका मकसद युवाओं को राजनीति से जोड़ना और चुनावी कैंपेन को प्रोफेशनल बनाना था. इसका पहला बड़ा प्रयोग 2014 लोकसभा चुनाव में हुआ.
यह वही दौर था जब भारतीय राजनीति में पहली बार डेटा आधारित कैंपेनिंग, थ्री डी रैली, चाय पे चर्चा जैसे प्रयोग बड़े पैमाने पर हुए. I-PAC ने चुनाव कैंपेनिंग का नया नैरेटिक सेट किया कि अगर रणनीति बनाई जाए तो नतीजे भी उसी के अनुरूप दिखते हैं.
प्रशांत किशोर पहले संयुक्त राष्ट्र संघ में पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट थे, फिर राजनीति में आए और कुछ ही सालों में भारत के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकार बन गए.
आईपैक ने सबसे पहले साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए काम किया था. इसके बाद इसने कई राज्यों में अलग-अलग दलों के लिए चुनावी रणनीति बनाती रही है, इनमें से अधिकतर चुनावों में उन पार्टियों ने जीत दर्ज की, जिनके साथ आईपैक ने काम किया.
2014: बीजेपी के लिए शुरुआती रणनीति
2015: बिहार में नीतीश कुमार की जीत
2017: पंजाब में कांग्रेस की जीत
2019: आंध्र में वाईएसआर कांग्रेस की भारी जीत
2021: बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडु में डीएमके
2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव तक प्रशांत किशोर ही आईपैक का चेहरा हुआ करते थे. राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की जबरदस्त जीत में इसकी निर्णायक भूमिका थी. लेकिन फिर प्रशांत किशोर को लगा कि उन्हें सक्रिय राजनीति में उतरना चाहिए. इसके बाद प्रशांत किशोर ने जन सुराज पार्टी का गठन किया और कंसल्टेंसी छोड़कर सक्रिय राजनीति में आ गए.

किन-किन पार्टियों के साथ रहा I-PAC
कहा जाता है कि उन्होंने 6 साल में 6 मुख्यमंत्री बनवाए. I-PAC का सबसे बड़ा असर इसके क्लाइंट नेटवर्क से समझ आता है. इस सूची में भारतीय जनता पार्टी से शुरू करने वाली I-PAC ने बाद के वर्षों में जनता दल (यूनाइटेड), कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियों को जोड़ा. कई मामलों में I-PAC ने हारती और मैदान में कमजोर दिख रही पार्टियों के अच्छे प्रदर्शन में अहम भूमिका निभाई. हालांकि ऐसा नहीं है कि I-PAC ने केवल चुनावी सफलता ही दिलाई. 2017 में कांग्रेस और सपा की उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हार हो या 2022 में टीएमस का गोवा में खाता भी नहीं खोल पाने वाला प्रदर्शन हो, या फिर दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को अर्श से फर्श पर लाने वाला 2025 के विधानसभा चुनाव का प्रदर्शन हो. अब I-PAC की नई असफलताओं में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 भी जुड़ गया है जहां उनके जिम्मे क्रमश टीएमसी और डीएमके के लिए काम किया.

चुनावी रणनीति का बिजनेस मॉडल
I-PAC खुद कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है, बल्कि यह एक पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म है. तो इसके पास पैसा कहां से आता है. इसके कमाई का तरीका क्या है?
यह पार्टियों और उम्मीदवारों से फीस वसूलती है. अक्सर यह पार्टियों से पूरे चुनावी कैंपेन का कॉन्ट्रैक्ट लेती है. डेटा जुटाना, पीआर करना, डिजिटल कैंपेन और जमीनी सर्वे के लिए यह मोटी रकम वसूलती है.
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस ऐंड असेसमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ऐसी कंपनियां प्रति सीट लाखों से करोड़ों रुपये तक चार्ज कर सकती हैं.

Photo Credit: X @IPAC
चुनाव जीतने का फॉर्मूला
I-PAC का काम सिर्फ पोस्टर बनाना नहीं होता, बल्कि पूरा इकोसिस्टम चलाना होता है. यह मौजूद डेटा का एनालिसिस करती है. वोटर की प्रोफाइलिंग. स्थानीय मुद्दे और (खासकर उत्तर भारत के राज्यों में) जाति समीकरणों पर फोकस करती है.
इसके बाद वह नैरेटिव बिल्डिंग का काम करती है जिसमें स्लोगन बनाना, मुद्दे आधारित वास्तविक अभियान और सोशल मीडिया कैंपेनिंग के साथ पॉलिटिकल मैसेजिंग को मजबूत बनाती है.
फिर आता है बूथ लेवल पर नेटवर्किंग का काम जिसे इसके वॉलंटियर मजबूती से मैनेज करते हैं. एक बार जब पार्टी के लिए यह सब हो गया तब स्थानीय स्तर पर वहां से चुनाव में उतारे जा रहे नेता की यह इमेज बिल्डिंग का काम करती है. नेता की ब्रांडिंग की जाती है. उसके पब्लिक इवेंट्स आयोजित किए जाते हैं, जिसे साथ-साथ सोशल मीडिया पर जोर-शोर से प्रचारित किया जाता है. इस प्रकार केवल I-PAC ही नहीं, अमूमन एक पॉलिटिकल कंसल्टेंसी काम किया करती है.
कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर उन प्रचार अभियानों की जानकारी भी दी जो संस्था ने डिजाइन किए थे. इनमें पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए बनाया गया अभियान 'कैप्टन दे नौ नुक्ते', नीतीश कुमार के लिए 'नीतीश के 7 निश्चय', ममता बनर्जी के लिए 'दीदी की शपथ' और आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के लिए 'केजरीवाल की 10 गारंटियां' सहित कई कैंपेन शामिल हैं.

प्रशांत किशोर के बाद I-PAC की सफलता
आईपैक से जुड़े रहे फलकयार अस्करी ने इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया था कि प्रशांत किशोर I-PAC के साथ केवल एक सलाहकार के तौर पर जुड़े हुए थे. साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उनके जाने से कंपनी पर कोई असर नहीं पड़ा है. पर हाल के घटनाक्रम अस्करी की बातों को खारिज करते हैं.
प्रशांत किशोर के 2021 में आधिकारिक तौर पर I-PAC छोड़ने के बाद कंपनी के नेतृत्व, प्रदर्शन और हालिया स्थिति पर कई तरह के असर पड़े हैं. सबसे पहले तो कंपनी का नेतृत्व अब तीन निदेशकों की एक टीम कर रही है. जिसमें प्रतीक जैन, ऋषि राज सिंह और विनेश चंदेल शामिल हैं.
2021 तक कंपनी की पहचान प्रशांत किशोर से थी पर उनके बाद I-PAC को एक संस्था के रूप में स्थापित करने की कोशिश की गई. 2021 में तृणमूल की जीत तो प्रशांत किशोर की जीत मानी गई, पर 2024 के लोकसभा चुनाव में भी जब जीत मिली तो यह I-PAC के नई टीम की सफलता मानी गई.
कंपनी ने यह साबित करने की कोशिश की कि वो प्रशांत किशोर के बिना भी सफल और प्रभावशाली चुनावी रणनीतियां बना सकती है. यही I-PAC तमिलनाडु में डीएमके की जीत में भी शामिल रही, हालांकि I-PAC के गोवा में वैसी सफलता नहीं मिली.

विनेश चंदेल
Photo Credit: ANI
विवाद और जांच के दायरे में I-PAC, उठते सवाल
हालांकि चुनाव कंसल्टेंसी के अलावा भी यह कंपनी कॉलेजों और अन्य बड़ी संस्थाओं से जुड़ी है. पर हाल के समय में I-PAC कई विवादों के लिए भी चर्चा में रही है.
इस पर प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाया. आरोप ये लगा कि पश्चिम बंगाल में कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग में करीब 20 करोड़ रुपये की हवाला राशि का लेन देन I-PAC के माध्यम से किया गया. इसी साल जनवरी में जब ईडी ने I-PAC के कोलकाता कार्यालय और अधिकारियों के परिसरों पर छापा मारा, तो आरोप लगे कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हस्तक्षेप किया और वहां से डिजिटल डिवाइस और महत्वपूर्ण दस्तावेज हटा दिए गए.
इसके अलावा I-PAC पर एक गैर-मौजूद कंपनी (रामसेतु इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड) से 13.5 करोड़ रुपये का संदिग्ध लोन लेने का आरोप लगा, जो 2018 में ही बंद हो चुकी थी.
ईडी ने कथित वित्तीय अनियमितताओं के चलते I-PAC के प्रमुख प्रतीक जैन के ठिकानों पर छापेमारी की और बाद में I-PAC के निदेशक ऋषिकेश राज को समन जारी कर पेश होने के लिए कहा. मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में I-PAC के सह-संस्थापक विनेश चंदेल 13 अप्रैल को गिरफ्तार किए गए (हालांकि 30 अप्रैल को उन्हें जमानत मिल गई).
Thank you for the acknowledgment didi. Loved being part of Bengal's success once again after 2021. @MamataOfficial @abhishekaitc @AITCofficial pic.twitter.com/spC3NfPlc8
— I-PAC (@IndianPAC) June 4, 2024
विपक्षी दलों ने यह भी आरोप लगाया कि I-PAC सिर्फ एक सलाहकार संस्था नहीं, बल्कि तृणमूल की एक शाखा के रूप में काम कर रही है. बाद में टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने खुद I-PAC के आईटी सेल प्रमुख को अपना आईटी सेल हेड बताकर इसकी अनाधिकारिक पुष्टि भी की.
इस दौरान ही I-PAC लाभ से घाटे की कंपनी बन गई. वित्त वर्ष 2024-25 में I-PAC के राजस्व में 35% की भारी गिरावट देखी गई. पहले कंपनी का लाभ 18 करोड़ रुपये का था, जो 2.42 करोड़ रुपये का घाटे में बदल गया. कानूनी और राजनीतिक चुनौतियां अलग से मुंह बाये खड़ी हैं.
कुछ जानकारों का मानना है कि यह प्रशांत किशोर के कंपनी से हटने के बाद कई अन्य रणनीतिकारों के I-PAC से हटने के कारण हुआ है क्योंकि उनके हटने से एक वैक्युम पैदा हुआ है और बाजार में कंपनी की मांग बहुत हद तक प्रशांत किशोर के नाम और उनकी छवि पर ही टिकी थी.
सपा का फैसला क्या संकेत देता है?
अब जबकि समाजवादी पार्टी ने I-PAC से साथ अपना करार खत्म कर दिया है तो यह कंपनी के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगाएगा और साथ ही यह भी प्रश्न उठाएगा कि क्या अब राजनीतिक पार्टियों के बीच I-PAC पर पहले जैसा भरोसा नहीं रहा?
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