- SC ने डॉ. एस. सुब्बैया हत्या मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल करते हुए सभी आरोपियों को दोषी ठहराया.
- अदालत ने 9 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई और राज्य सरकार की मृत्युदंड मांग को खारिज कर दिया.
- SC ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को साक्ष्य के गलत मूल्यांकन और साजिश की अनदेखी के कारण गंभीर त्रुटि बताया.
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चेन्नई के न्यूरोसर्जन डॉ. एस. सुब्बैया की 2013 में हुई हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल करते हुए सभी आरोपियों को दोषी ठहराया और उनकी सजा फिर से लागू कर दी. अदालत ने 9 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, जबकि राज्य सरकार ने मृत्युदंड की मांग पर जोर नहीं दिया. यह मामला लंबे समय से चल रहे संपत्ति विवाद से जुड़ा था, जिसमें 14 सितंबर 2013 को बिलरॉथ अस्पताल के बाहर डॉ. सुब्बैया पर धारदार हथियारों से हमला किया गया था और बाद में 23 सितंबर को उनकी मौत हो गई थी.
जस्टिस एम.एम. सुन्दरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि मद्रास हाईकोर्ट द्वारा ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को पलटते हुए आरोपियों को बरी करना “गंभीर त्रुटि” है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और हत्या की साजिश को दर्शाने वाली परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला को नजरअंदाज कर दिया. अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को विधिसम्मत बताते हुए उन्हें पुनः बहाल कर दिया.
दिलचस्प बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में रवीन्द्रनाथ टैगोर की पंक्तियों का भी उल्लेख करते हुए लालच पर टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि 'लालच की कोई सीमा नहीं होती और यह इंसान को हर सीमा पार करने के लिए प्रेरित कर सकता है'. कोर्ट ने इस मामले को इस बात का उदाहरण बताया कि संपत्ति के लालच में लोग किस तरह मानवीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ देते हैं.
सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार की उस अपील को स्वीकार किया, जिसमें जून 2024 के मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी. गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने साक्ष्यों में कथित कमी और विरोधाभासों का हवाला देते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया था. इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.
मामले में दोषी ठहराए गए लोगों में दो सगे भाई शामिल हैं, जिन्हें हत्या की साजिश का मुख्य सूत्रधार बताया गया. उनके माता-पिता- पोनुस्वामी और मैरी पुष्पम को भी दोषी पाया गया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने वृद्ध दंपत्ति को सीमित राहत देते हुए उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल के समक्ष क्षमादान याचिका दायर करने की अनुमति दी और इसके लिए 8 सप्ताह का समय भी दिया. साथ ही निर्देश दिया गया कि इस अवधि में उन्हें गिरफ्तार न किया जाए.
पीठ ने माना कि माता-पिता का आचरण उनके कर्तव्यबोध और भावनात्मक लगाव से प्रभावित प्रतीत होता है. हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी उनके कृत्यों को सही ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उनके व्यवहार के मानवीय पक्ष को समझने के लिए है. वहीं, अन्य सभी दोषियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है.
यह पूरा मामला कन्याकुमारी जिले में दो एकड़ भूमि को लेकर डॉ. सुब्बैया और पोनुस्वामी परिवार के बीच लंबे समय से जारी विवाद से जुड़ा था, जिसने अंततः इस हत्याकांड का रूप ले लिया.
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