Breastfeeding Rate India : कांग्रेस सांसस शशि थरूर ने NFHS-6 के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में काम करने वाली करोड़ों महिलाओं को आर्थिक मजबूरियों के चलते डिलीवरी के कुछ ही सप्ताह बाद काम पर लौटना पड़ता है, जिसकी वजह से एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग प्रभावित हो रही है. हमारे देश में घट रही एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की दर, इसी को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस नेता है सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की है.
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने देश में 6 महीने से कम उम्र के शिशुओं को सिर्फ मां का दूध पिलाने की घटती दरों पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि ये स्थिति मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है और इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं.
सोशल मीडिया पर आंकड़ों का दिया हवाला
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी को टैग करते हुए थरूर ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के आंकड़ों का हवाला दिया. उन्होंने बताया कि जहां देश में इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी बढ़कर 90.6 प्रतिशत तक पहुंच गए हैं. वहीं, छह महीने तक सिर्फ स्तनपान कराने की दर 63.7 प्रतिशत से घटकर 55.8 प्रतिशत रह गई है.
A curious data point, and what it might mean : According to the latest NFHS-6 data, while institutional deliveries in our country have soared to an impressive 90.6%, exclusive breastfeeding (EBF) rates for infants under six months have sharply declined from 63.7% to 55.8%. This…
— Shashi Tharoor (@ShashiTharoor) September 5, 2026
ग्रामीण इलाकों में ज्यादा दिख रहा असर
थरूर के अनुसार, एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग में गिरावट का सबसे ज्यादा असर ग्रामीण क्षेत्रों मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे बड़े राज्यों में देखने को मिला है. उन्होंने कहा कि ये आंकड़े सरकारी नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद अंतर को उजागर करते हैं.
अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर की महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती
कांग्रेस नेता ने कहा कि देश में 16 करोड़ से अधिक महिलाएं अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में काम करती हैं. इनमें से बड़ी संख्या में महिलाओं को डिलीवरी के कुछ ही सप्ताह बाद रोजगार पर लौटना पड़ता है, क्योंकि परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करती हैं.
उन्होंने कहा, 'जब महिलाओं को पेड मैटरनिटी लीव और नौकरी की सुरक्षा नहीं मिलती, तो 6 महीने तक सिर्फ ब्रेस्टफीड कराने की हेल्थ एक्सपर्ट्स की सलाह आर्थिक रूप से लगभग असंभव हो जाती है.'
क्या हैं ब्रेस्टफीड में गिरावट के दूसरे कारण?
थरूर ने इस समस्या के पीछे कुछ अन्य कारण भी गिनाए. उन्होंने कहा कि देश में सीजेरियन डिलीवरी के मामलों में वृद्धि और शिशु फार्मूला प्रोडक्ट के बढ़ते प्रचार ने भी ब्रेस्टफीड की दरों को प्रभावित किया है. उनका मानना है कि मां का दूध बच्चों को कुपोषण और शिशु मृत्यु दर जैसी समस्याओं से बचाने में सबसे प्रभावी प्राकृतिक सुरक्षा कवच है.
सरकार से क्या की मांग?
शशि थरूर ने केंद्र सरकार और नियोक्ताओं से अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं के लिए मजबूत वित्तीय मातृत्व लाभ सुनिश्चित करने की मांग की. इसके साथ ही उन्होंने इंफैंट मिल्क सब्स्टीट्यूट्स (IMS) एक्ट के सख्त पालन और सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसव के बाद स्तनपान संबंधी परामर्श सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने की योजना बना रही है.
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