देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल AIIMS दिल्ली की पहचान गंभीर से गंभीर बीमारियों के इलाज और देशभर से आने वाले मरीजों की आखिरी उम्मीद के रूप में है. लेकिन अस्पताल की ऊंची इमारतों और अत्याधुनिक सुविधाओं के बाहर एक ऐसी दुनिया भी बसती है, जहां हजारों मरीज और उनके परिजन इलाज की उम्मीद में लंबे इंतजार, आर्थिक तंगी और अनिश्चितता से जूझ रहे हैं. सबवे, फुटपाथ, अंडरपास और रेलवे स्टेशनों के आसपास कई परिवार दिनों नहीं बल्कि महीनों तक गुजारते हैं, क्योंकि उनके लिए इलाज का मतलब सिर्फ दवा नहीं बल्कि तारीख, नंबर और बारी का इंतजार भी है.
ऐसे ही माहौल के बीच राजस्थान की 15 वर्षीय तन्वी की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. परिजनों का आरोप है कि वे वर्षों से बच्ची के इलाज और सर्जरी के लिए प्रयास कर रहे थे और बार-बार तारीख मिलने के बावजूद ऑपरेशन नहीं हो सका. हालांकि AIIMS ने इस मामले में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि तन्वी जन्मजात जटिल हृदय रोग से पीड़ित थी और उसकी चिकित्सा स्थिति के आधार पर विशेषज्ञों ने समय-समय पर उसका मूल्यांकन किया था.
AIIMS ने क्या कहा?
AIIMS के कार्डियोथोरेसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी (CTVS) विभागाध्यक्ष प्रो. वी. देवगौरू द्वारा जारी नोट के अनुसार, तन्वी को पहली बार 10 अक्टूबर 2012 को कार्डियोलॉजी ओपीडी में दिखाया गया था. जांच में उसे VSD with Pulmonary Atresia नामक गंभीर जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित पाया गया था और उसे कार्डियक सर्जरी विभाग भेजा गया था.
AIIMS के मुताबिक, वर्ष 2013 में सर्जिकल मूल्यांकन किया गया था और बाद में 2018 में यह निष्कर्ष निकला कि उस समय सर्जरी संभव नहीं है. इसके बाद बच्ची को दवाओं के जरिए उपचार और नियमित फॉलो-अप पर रखा गया. अस्पताल का कहना है कि पिछले वर्ष परिवार ने दूसरे विशेषज्ञ से भी राय ली थी, जहां भी मेडिकल मैनेजमेंट जारी रखने की सलाह दी गई थी.
AIIMS के अनुसार, अगस्त 2026 में बच्ची की तबीयत बिगड़ने पर उसे फिर भर्ती किया गया और हार्ट तथा फेफड़े के संभावित ट्रांसप्लांट के लिए मूल्यांकन शुरू किया गया. 1 सितंबर की सुबह बच्ची को गंभीर हाइपॉक्सिक अटैक आया, जिसके बाद कार्डियक अरेस्ट हुआ. अस्पताल का कहना है कि सभी प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका और सुबह 5:06 बजे मृत घोषित किया गया.

15 साल की तन्वी की मौत और परिवार के आरोप
मंगलवार सुबह AIIMS परिसर में उस समय माहौल गमगीन हो गया जब राजस्थान से आई 15 वर्षीय तन्वी की मौत की खबर सामने आई. परिजनों का दावा है कि वे वर्षों से बच्ची के इलाज के लिए अस्पताल के चक्कर लगा रहे थे और कई बार सर्जरी की उम्मीद बंधी, लेकिन ऑपरेशन नहीं हो सका. परिवार का कहना है कि लगातार इंतजार ने उनकी उम्मीदें तोड़ दीं.
हालांकि AIIMS का कहना है कि बच्ची की बीमारी बेहद जटिल थी और इलाज से जुड़े फैसले उसकी मेडिकल स्थिति के आधार पर लिए गए थे.
बेटे के ब्रेन ट्यूमर के आगे लाचार नौशाद
बलिया से आए नौशाद खान अपने बेटे का इलाज कराने पिछले दो साल से AIIMS आ रहे हैं. उनका बेटा ब्रेन ट्यूमर से जूझ रहा है. नौशाद कहते हैं कि सबसे मुश्किल बीमारी नहीं, बल्कि इलाज की बारी आने का इंतजार है. निजी अस्पतालों का खर्च उनकी पहुंच से बाहर है, इसलिए तमाम परेशानियों के बावजूद वे AIIMS का सहारा नहीं छोड़ सकते.
रजा खातून: बीमारी, गरीबी और एक अधूरा सपना
बिहार की रजा खातून हेपेटाइटिस से पीड़ित हैं. परिवार की आय बेहद सीमित है. इलाज के लिए बार-बार दिल्ली आना पड़ता है. इसी तनाव और अनिश्चितता के बीच उनका गर्भपात हो गया. रजा कहती हैं कि बीमारी से लड़ाई अभी भी जारी है, लेकिन हर सफर आर्थिक और मानसिक रूप से भारी पड़ता है.
सबवे की सीढ़ियों पर गुजरती रातें
जौनपुर के सुनील पटेल स्पॉन्डिलाइटिस का इलाज कराने पिछले डेढ़ साल से AIIMS के चक्कर लगा रहे हैं. वे बताते हैं कि गांव से आने के बाद कई बार पूरा महीना दिल्ली में रुकना पड़ता है. पैसे बचाने के लिए रातें सबवे या मेट्रो स्टेशन के आसपास गुजरती हैं जबकि भोजन अक्सर लंगर से मिलता है.
जांच रिपोर्ट, लंबा इंतजार और कैंसर से जंग
झारखंड से आए अनिल और अविनाश अपने भाई का इलाज कराने दिल्ली पहुंचे हैं, जिसे ब्लड कैंसर है. उनका कहना है कि सिर्फ जांच रिपोर्ट आने में कई दिन लग जाते हैं. रहने, नहाने और खाने की व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती है. उनका दर्द यह है कि बीमारी से पहले उन्हें रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों की लड़ाई लड़नी पड़ती है.
भरोसा भी है, शिकायत भी
बिहार की संगीता देवी बताती हैं कि उन्हें सर्जरी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद उनका भरोसा AIIMS पर कायम है. उनके बड़े बेटे का ब्रेन ट्यूमर भी इसी अस्पताल में सफलतापूर्वक इलाज हुआ था. उनके मुताबिक, तारीख मिलने में मुश्किलें हैं, लेकिन डॉक्टरों की विशेषज्ञता पर उन्हें भरोसा है.
भीड़, उम्मीद और व्यवस्था पर सवाल
AIIMS के बाहर का दृश्य देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक जटिल तस्वीर पेश करता है. एक तरफ ऐसे हजारों मरीज हैं जिन्हें यहां इलाज की उम्मीद दिखती है, दूसरी तरफ भारी भीड़ और सीमित संसाधनों के कारण लंबा इंतजार भी उनकी मजबूरी बन जाता है. तन्वी की मौत ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे गरीब मरीजों को समय पर उपचार और बेहतर सहायक सुविधाएं कैसे उपलब्ध कराई जाएं.
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