दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) देश के लाखों गरीब मरीजों के लिए अंतिम उम्मीद माना जाता है. लेकिन इस उम्मीद तक पहुंचने की कीमत कई परिवारों को महीनों की प्रतीक्षा, आर्थिक तंगी और अमानवीय परिस्थितियों में रहकर चुकानी पड़ रही है. देश के अलग-अलग राज्यों से आए मरीज और उनके परिजन एम्स के आसपास बने अंडरपास, फुटपाथ, बरामदों और रैन बसेरों में दिन-रात गुजार रहे हैं. कोई ब्रेन ट्यूमर के ऑपरेशन का इंतजार कर रहा है तो कोई कैंसर या हृदय रोग के इलाज के लिए अपनी बारी आने की राह देख रहा है. इलाज की उम्मीद ही इन परिवारों को तमाम मुश्किलों के बीच टिकाए हुए है.
15 वर्षीय तन्वी की मौत ने उठाए सवाल
राजस्थान के कोटा की 15 वर्षीय तन्वी जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित थी. मंगलवार को एम्स में उसकी मौत हो गई. उसके पिता मुकेश परियानी का आरोप है कि परिवार कई वर्षों से सर्जरी का इंतजार कर रहा था. उनका कहना है कि कई बार ऑपरेशन की तारीखें तय हुईं और बाद में बदली गईं, लेकिन सर्जरी नहीं हो सकी. हालांकि एम्स प्रशासन ने अलग पक्ष रखा है. संस्थान के अनुसार तन्वी को वर्ष 2012 में वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (VSD) और पल्मोनरी एट्रेशिया का निदान हुआ था. वर्ष 2018 में विशेषज्ञों ने उसकी जटिल हृदय संरचना के कारण सर्जरी को संभव नहीं माना था और उसका इलाज दवाओं के जरिए किया जा रहा था. एम्स के मुताबिक 24 अगस्त को उसे संभावित हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट की जांच के लिए भर्ती किया गया था, लेकिन एंडोस्कोपी के बाद उसे गंभीर समस्या हुई और कार्डियक अरेस्ट के कारण उसकी मौत हो गई.
डेढ़ साल बाद मिला ऑपरेशन का नंबर
उत्तर प्रदेश के बलिया निवासी नौशाद खान के लिए यह इंतजार डेढ़ साल लंबा रहा. उनके बेटे को ब्रेन ट्यूमर है और उसका ऑपरेशन आखिरकार एक महीने पहले हो सका. नौशाद खान कहते हैं, 'पिछले दो साल से हम यहां इलाज करा रहे हैं. सबसे बड़ी समस्या ऑपरेशन के लिए नंबर आने की है. हमें डेढ़ साल इंतजार करना पड़ा. मेरे बेटे को ब्रेन ट्यूमर है. निजी अस्पताल में इलाज कराने के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे, इसलिए इंतजार ही एकमात्र रास्ता था. हालांकि यहां इलाज बहुत अच्छा मिलता है.' वहीं उनका पांच वर्षीय बच्चा यूसुफ सराय स्थित रैन बसेरे में समय बिताने की कोशिश करता है, जहां पूरा परिवार रह रहा है.

तारीख पर तारीख, फिर भी भरोसा कायम
बिहार की संगीता देवी के लिए भी इलाज की तारीख मिलना आसान नहीं रहा. वह कहती हैं, 'हम पिछले साल अगस्त में आए थे. तारीख मिली, लेकिन इलाज नहीं हो सका. फिर तीन महीने बाद दूसरी तारीख मिली. इलाज के लिए हमें यहीं रहना पड़ता है. मेरे बड़े बेटे का ब्रेन ट्यूमर का इलाज भी यहीं हुआ था. तारीख मिलना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन इलाज अच्छा है.' हाल ही में उनके बेटे की जटिल ऑर्थोपेडिक सर्जरी हुई है और परिवार अब भी अस्पताल के आसपास रहकर डॉक्टरों की निगरानी का इंतजार कर रहा है.

इलाज से ज्यादा बड़ी चुनौती है रहने की व्यवस्था
कुछ परिवारों के लिए सबसे बड़ी समस्या बार-बार अपने गांव और अस्पताल के बीच सफर करना है, क्योंकि दिल्ली में ठहरने की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है. बिहार की रजा खातून कई सप्ताह से एम्स के पास बने अंडरपास में रह रही हैं. वह महीने में सिर्फ 5,000 रुपये कमाती हैं और कहती हैं कि निजी अस्पताल में इलाज कराना उनके लिए संभव नहीं है. रजा खातून कहती हैं, 'हम यहां एक महीने रहे थे, फिर गांव लौट गए. अब 22 दिनों से फिर यहां हैं. गर्भपात के बाद मुझे भर्ती किया गया था. मैं हेपेटाइटिस के इलाज के लिए आई हूं. हमारे पास निजी इलाज के पैसे नहीं हैं. मेरी मासिक आय सिर्फ 5,000 रुपये है.' रात में अंडरपास की टिमटिमाती रोशनी के नीचे बैठे रजा के बच्चे लंगर का भोजन खाते हैं, जबकि परिवार अगली मेडिकल प्रक्रिया की प्रतीक्षा करता रहता है.

कैंसर मरीजों के परिवारों का सबसे कठिन संघर्ष
कैंसर से जूझ रहे परिवारों के लिए यह अनिश्चितता और भी कठिन है. झारखंड के अविनाश अपने 16 वर्षीय भाई के इलाज के लिए रांची से एम्स आए हैं. उनके भाई को ब्लड कैंसर है. अविनाश कहते हैं, 'हमें लगता है कि रिपोर्ट आने में करीब 15 दिन लगेंगे. यहां रहने और खाने की व्यवस्था सबसे बड़ी समस्या है.' यह परिवार पिछले 20 दिनों से एम्स के इमरजेंसी विभाग के पास बने बरामदों में रह रहा है. जांच के बाद उनका भाई कैनुला लगे हाथों के साथ सो जाता है, जबकि उनकी मां बीच-बीच में उसके माथे पर हाथ फेरती रहती हैं.

पास ही एक और परिवार बैठा है, जिसकी कहानी भी लगभग ऐसी ही है. अलीगढ़ के एक किशोर को भी ब्लड कैंसर है. उसके भाई अनिल कहते हैं, 'हमारे पास निजी अस्पताल में इलाज कराने के पैसे नहीं हैं. कैंसर का इलाज बहुत महंगा है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि जांच में बहुत समय लगता है. रहने की कोई जगह नहीं है. हम यहीं पड़े रहते हैं. कपड़ों से बदबू आने लगती है और ठीक से नहा-धो भी नहीं सकते. आने-जाने का खर्च बहुत ज्यादा है, हालांकि इलाज मुफ्त है. हम रात एक बजे पहुंचे थे. अभी तक नहीं पता कि नंबर कब आएगा.'
महीनेभर तक मेट्रो स्टेशन और सबवे में गुजारा
जौनपुर के सुनील पटेल के लिए भी मेट्रो स्टेशन और सबवे अस्थायी घर बन चुके हैं. स्पॉन्डिलाइटिस से पीड़ित सुनील पिछले डेढ़ साल से एम्स आ रहे हैं. वह कहते हैं, 'हम मेट्रो और सबवे में रहते हैं. हम गरीब हैं, निजी इलाज बहुत महंगा है. यहां इलाज मिल जाता है. समय जरूर लगता है, लेकिन कोई बात नहीं. जब भी आते हैं, एक महीने से ज्यादा रुकना पड़ता है.' उनकी 15 वर्षीय बेटी घुटनों में दर्द और सूजन से परेशान है. सितंबर की उमस भरी गर्मी में भी वह खुद को कंबल में लपेटे रहती है. उसका कहना है कि खुली जगह में रहने के दौरान अनचाही निगाहों से बचने का यही तरीका है.

उम्मीद ही सबसे बड़ी ताकत
गरीब परिवारों के लिए एम्स ही उम्मीद की आखिरी किरण है, क्योंकि निजी अस्पतालों का खर्च उनकी पहुंच से बाहर है. लेकिन इस उम्मीद की कीमत भी कम नहीं है. घर से दूर रहना, लंबी कतारें झेलना, महीनों तक इंतजार करना और अंडरपास, रैन बसेरों या फुटपाथों पर जिंदगी गुजारना उनकी मजबूरी बन चुकी है. इन परिवारों के लिए भोजन और नींद से भी ज्यादा महत्वपूर्ण दो चीजें हैं, उनकी मेडिकल फाइलें और अस्पताल की अगली अपॉइंटमेंट. उनकी पूरी दिनचर्या इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है. कई लोगों के लिए एम्स के डॉक्टर किसी भगवान से कम नहीं हैं और यह संस्थान किसी मंदिर की तरह है. एक मरीज के सफल इलाज की कहानी दूसरे मरीज तक पहुंचती है और उसी से उम्मीद जिंदा रहती है. यही वजह है कि लंबा इंतजार और कठिन परिस्थितियों के बावजूद ये परिवार डटे रहते हैं, क्योंकि एम्स उन्हें वह सबसे जरूरी चीज देता है जो वे कहीं और नहीं खरीद सकते, किफायती इलाज.
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