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45 मिनट तक चलता रहा CPR, फिर भी नहीं बच सके नाना पाटेकर, जानिए कब और कैसे दिया जाता है CPR

नाना पाटेकर को कार्डियक अरेस्ट के बाद 45 मिनट तक CPR दिया गया. जानिए CPR क्या है, कब दिया जाता है और यह किसी की जान बचाने में कैसे मदद करता है.

45 मिनट तक चलता रहा CPR, फिर भी नहीं बच सके नाना पाटेकर, जानिए कब और कैसे दिया जाता है CPR
CPR कितनी देर तक देना चाहिए? कार्डियोलॉजिस्ट ने बताया जरूरी नियम
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दिग्गज अभिनेता और फिल्म निर्माता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में कार्डियक अरेस्ट के कारण निधन हो गया है. वे गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर पर अचेत पाए गए थे. पाटेकर को तुरंत मणिपाल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित करने से पहले लगभग 45 मिनट तक सीपीआर (CPR) देकर उनकी जान बचाने की कोशिश की. नाना को  सुबह 5:20 पर मृत घोषित कर दिया गया.

मणिपाल अस्पताल के ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. शेखर साल्कर ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, "लगातार 45 मिनट तक सीपीआर देने के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. एमएलसी (मेडिको-लीगल केस) दर्ज कर लिया गया है और पोस्टमार्टम कराया जाएगा."

नाना पाटेकर को 45 मिनट तक दिया गया सीपीआर: क्या होता है सीपीआर?

कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन, जिसे आमतौर पर सीपीआर के नाम से जाना जाता है, एक आपातकालीन प्रक्रिया है जो किसी व्यक्ति की सांस या दिल की धड़कन रुक जाने पर जान बचाने के लिए की जाती है. इसमें छाती को दबाने (चेस्ट कंप्रेशन) और कृत्रिम सांस देने का काम किया जाता है.

इससे मस्तिष्क और शरीर के अन्य अहम अंगों तक खून का दौरा और ऑक्सीजन का प्रवाह बना रहता है, जिससे मरीज के बचने की संभावना दो से तीन गुना तक बढ़ जाती है.

'सीपीआर' शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है- "कार्डियो" यानी दिल, "पल्मोनरी" यानी फेफड़े, और "रिससिटेशन" यानी पुनर्जीवित करना या दोबारा होश में लाना.

कार्डियक अरेस्ट के दौरान सीपीआर

दिल्ली के सीके बिड़ला अस्पताल में कार्डियोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. अंशुल कुमार जैन कहते हैं, "जब कोई अचानक गिर पड़ता है, तो ज्यादातर लोग घबरा जाते हैं. लेकिन कार्डियक अरेस्ट के मामलों में शुरुआती कुछ मिनट बेहद अहम होते हैं, और सही समय पर सीपीआर शुरू करने से बहुत बड़ा फर्क पड़ सकता है. एक हृदय रोग विशेषज्ञ के नजरिए से देखें तो सीपीआर कोई ऐसा इलाज नहीं है जिसे केवल डॉक्टर ही कर सकते हैं. आपात स्थिति में आसपास मौजूद किसी भी व्यक्ति की तुरंत की गई मदद तब तक मरीज को जिंदा रख सकती है, जब तक कि एंबुलेंस या डॉक्टरी मदद न पहुंच जाए."

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दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में कार्डियक अरेस्ट के कारण निधन हो गया. 

सीपीआर की जरूरत कब पड़ती है?

डॉ. जैन के अनुसार, "सीपीआर की जरूरत मुख्य रूप से तब होती है जब व्यक्ति को कार्डियक अरेस्ट हुआ हो. यानी वह कोई प्रतिक्रिया न दे रहा हो और सामान्य रूप से सांस न ले पा रहा हो. अगर कोई बेहोश व्यक्ति केवल हांफ रहा है या रुक-रुक कर सांस खींच रहा है, तो उसे सामान्य सांस लेना नहीं माना जाना चाहिए; कार्डियक अरेस्ट के दौरान ऐसा हो सकता है और इसके चलते सीपीआर में देरी नहीं करनी चाहिए."

डॉ. जैन आगे कहते हैं, "ऐसे में सही तरीका बिल्कुल सीधा है: स्थानीय आपातकालीन नंबर पर कॉल करें, आसपास अगर ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफाइब्रिलेटर (AED) उपलब्ध हो तो किसी से तुरंत मंगवाएं, और छाती को दबाना (कंप्रेशन) शुरू कर दें."

डॉ. जैन यह भी बताते हैं कि वयस्कों के लिए 'हैंड्स-ओनली सीपीआर' में छाती के बीचों-बीच जोर-जोर से और तेजी से दबाव डालना होता है. अगर किसी ने ट्रेनिंग ली है और वह कृत्रिम सांस देने में सहज है, तो वह अपनी ट्रेनिंग के अनुसार पारंपरिक सीपीआर दे सकता है.

अचानक कार्डियक अरेस्ट होने के आम कारणों में हार्ट अटैक, डूबना, बिजली का तेज झटका, दम घुटना या कोई गंभीर शारीरिक चोट शामिल हैं.

सीपीआर कैसे काम करता है?

जब दिल धड़कना बंद कर देता है, तो शरीर में ऑक्सीजन युक्त खून का बहाव रुक जाता है. दिल रुकने के महज 4 मिनट के भीतर दिमाग को नुकसान पहुंचना शुरू हो सकता है और कुछ ही देर में मौत हो सकती है. सीपीआर दो प्रमुख तरीकों से शरीर के प्राकृतिक रक्त संचार तंत्र की तरह काम करता है:

  • चेस्ट कंप्रेशन (रक्त संचार): इसमें एक हाथ की हथेली के पिछले हिस्से को मरीज की छाती के बीच में रखा जाता है, दूसरे हाथ की उंगलियों को उस पर फंसाया जाता है, और पूरे शरीर के वजन का इस्तेमाल करते हुए छाती को जोर और तेजी से नीचे दबाया जाता है. इसका मकसद अहम अंगों तक कृत्रिम तरीके से खून का बहाव बनाए रखना है.
  • रेस्क्यू ब्रीदिंग (ऑक्सीजन देना): मुंह से मुंह में हवा फूंककर मरीज के फेफड़ों तक सीधे ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है, जिसे वह खून सोख लेता है जिसे आप छाती दबाकर शरीर में दौड़ा रहे होते हैं.

सीपीआर कब काम नहीं करता?

डॉ. जैन के अनुसार, सीपीआर हर तरह की बेहोशी का इलाज नहीं है. यह सामान्य रूप से बेहोश हुए व्यक्ति के लिए सही नहीं है और अगर व्यक्ति होश में है व सामान्य सांस ले रहा है, तो सीपीआर बिल्कुल नहीं दिया जाना चाहिए.

"यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ सीपीआर कार्डियक अरेस्ट के हर कारण को ठीक नहीं कर सकता. मरीज को डिफाइब्रिलेशन (शॉक), दवाएं, सांस के लिए मशीनी सपोर्ट, हार्ट अटैक का इलाज या अन्य गहन डॉक्टरी सहायता की जरूरत हो सकती है. सीपीआर महज एक पुल की तरह काम करता है जो तब तक शरीर में रक्त संचार बनाए रखता है जब तक कि पूरा इलाज उपलब्ध न हो जाए."

डॉ. जैन आगे कहते हैं, "एक और गलत धारणा 'कफ सीपीआर' (खांसी वाला सीपीआर) को लेकर है- यह सोचना कि जोर से खांसने से कार्डियक अरेस्ट के दौरान दिल फिर से धड़कने लगेगा. कार्डियक अरेस्ट के इलाज के रूप में इसकी बिल्कुल भी सलाह नहीं दी जाती और इस चक्कर में आपातकालीन मदद बुलाने या सही सीपीआर शुरू करने में देरी नहीं होनी चाहिए."

सीपीआर कितनी देर तक जारी रखना चाहिए?

डॉ. जैन का कहना है-

"ऐसा कोई तय नियम नहीं है कि 'सीपीआर ठीक 10 या 20 मिनट तक ही किया जाना चाहिए'. सामान्य तौर पर मदद कर रहे व्यक्ति को तब तक सीपीआर जारी रखना चाहिए जब तक कि मरीज में जिंदगी के लक्षण न दिखने लगें, प्रशिक्षित मेडिकल टीम कमान न संभाल ले, एईडी मशीन कुछ देर रुकने का निर्देश न दे, मदद करने वाला खुद पूरी तरह थक न जाए, या आसपास का माहौल असुरक्षित न हो जाए."

डॉक्टर यह भी बताते हैं कि अस्पताल या मेडिकल टीम द्वारा दिए जाने वाले सीपीआर का समय अलग-अलग हो सकता है. "स्वास्थ्यकर्मी दिल की धड़कन की स्थिति को बार-बार परखते हैं, ठीक किए जा सकने वाले संभावित कारणों की पहचान करते हैं और परिस्थितियों के आधार पर तय करते हैं कि प्रयास जारी रखना है या नहीं."

सबसे बड़ी गलती है इंतज़ार करना

डॉ. जैन बताते हैं कि कई लोग सीपीआर शुरू करने से इसलिए कतराते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि वे गलत कर देंगे या मरीज को चोट पहुंचा देंगे. हालांकि, कार्डियक अरेस्ट की आशंका होने पर कदम उठाने में देरी करना कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है. "मौजूदा मेडिकल दिशानिर्देश यही कहते हैं कि अगर कोई वयस्क कोई जवाब नहीं दे रहा है और सामान्य रूप से सांस नहीं ले रहा है, तो बिना हिचकिचाए तुरंत सीपीआर शुरू कर देना चाहिए."

वे अंत में कहते हैं, "इसलिए एक हृदय रोग विशेषज्ञ के तौर पर संदेश बेहद सीधा है: कार्डियक अरेस्ट को पहचानें, आपातकालीन मदद बुलाएं, तुरंत सीपीआर शुरू करें और उपलब्ध होते ही एईडी का इस्तेमाल करें. सीपीआर भले ही अपने आप दिल को दोबारा न चला पाए, लेकिन यह वह कीमती समय दिला देता है जो कार्डियक अरेस्ट के मामलों में यह तय कर सकता है कि मरीज जिंदा बचेगा या नहीं और वह कितनी अच्छी तरह ठीक होगा."

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