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दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता ने सुसाइड क्‍यों किया?

क्या सफलता, पैसा और बड़ा पद मानसिक शांति की गारंटी हैं? जानिए विशेषज्ञों से रिटायरमेंट के बाद डिप्रेशन, अकेलेपन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जरूरी तथ्य.

दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता ने सुसाइड क्‍यों किया?
Retirement Depression: बड़े पद और सफलता के बाद भी क्यों बढ़ सकता है डिप्रेशन और अकेलापन
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हाल ही में दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता के अचानक उठाए गए इस कदम ने पूरे देश को सन्न कर दिया है. एक ऐसा इंसान जो भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के सबसे ऊंचे ओहदों पर रहा, जिसने दिल्ली के प्रशासन को इतने बरसों तक दिशा दी, जिसके पास समाज में रुतबा, मान-सम्मान, पैसे और सुरक्षा की कोई कमी नहीं थी. इस दुखद मामले के पीछे राकेश मेहता की मानसिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को लेकर काफी विस्तृत जानकारी मिलने की बात सामने आई है.

पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता की आत्‍महत्‍या ने कई सवाल मेरे जहन में खड़े कर द‍िए. ख्‍याल आया कि जब ऐसे मुकाम पर पहुंचा इंसान अपनी ही जान ले लेता है, तो हर आम इंसान के दिल में एक बड़ा सवाल उठता है. आखिर क्यों? जिस जिंदगी, जिस पावर और जिस शोहरत का सपना लाखों लोग रात-दिन देखते हैं, वो सब कुछ हासिल करने के बाद भी कोई इंसान अंदर से इतना खाली और बेबस कैसे हो सकता है?

यह घटना सिर्फ एक प्रशासनिक अधिकारी के चले जाने की नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस अंधेरे कोने की तरफ इशारा करती है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. और तो और यह अपनी तरह का पहला मामला नहीं है. इससे पहले इसी साल हॉलीवुड अभिनेता रॉबिन विलियम्स पूरी तरह रिटायर नहीं हुए थे, लेकिन जीवन के उत्तरार्ध में मानसिक स्वास्थ्य संघर्ष, अवसाद और गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे. सफलता, प्रसिद्धि और आर्थिक सुरक्षा मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पूरी तरह बचा नहीं पाती.

व्यक्तिगत मामलों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कई शोधों में पाया गया है कि रिटायरमेंट से जुड़ा तनाव, पहचान का संकट, शारीरिक बीमारियां और सामाजिक अलगाव कुछ लोगों में आत्महत्या के जोखिम को बढ़ा सकते हैं. एक हालिया अध्ययन में रिटायरमेंट से जुड़े आत्महत्या मामलों और मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर विशेष ध्यान दिया गया है.

तो क्या रिटायरमेंट आत्महत्या का कारण बन सकता है?

विशेषज्ञों के मुताबिक नहीं, आत्महत्या किसी एक वजह से नहीं होती. हालांकि रिटायरमेंट के बाद अकेलापन, सामाजिक दायरा सीमित होना, स्वास्थ्य समस्याएं, पहचान का संकट और अवसाद जैसे कारक कुछ लोगों में मानसिक स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकते हैं.

उपलब्धियां सब कुछ नहीं, मानसिक सुकून भी जरूरी: क्यों बढ़ रहा है आत्महत्या का खतरा? 

इसी बात को गहराई से समझने के लिए एनडीटीवी ने बात में दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में क्लिनिकल एवं रिहैबिलिटेशन न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट और कंसल्टेंट नीलम मिश्रा से. उनके  मुताबिक आत्महत्या को किसी एक घटना, परेशानी या व्यक्ति से जोड़कर देखना सही नहीं है. कई बार इसके पीछे लंबे समय से चल रहा अवसाद, अकेलापन, गंभीर बीमारी, लगातार बना तनाव, जीवन के उद्देश्य का खत्म हो जाना, सामाजिक अलगाव या अपनी परेशानियों को किसी के साथ साझा न कर पाना जैसे कई कारक एक साथ काम कर सकते हैं.

‘सफल' दिखने वाला व्यक्ति भी अंदर से परेशान हो सकता है

नीलम मिश्रा के मुताबिक समाज अक्सर व्यक्ति की सफलता को उसकी मानसिक स्थिति का पैमाना मान लेता है. बड़ा पद, पैसा, सम्मान, परिवार या सामाजिक प्रतिष्ठा यह सुनिश्चित नहीं करते कि व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ और संतुष्ट भी हो. कई सफल लोग अपनी परेशानियों को छिपाते रहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनसे कमजोर पड़ने की उम्मीद नहीं की जाती.

डॉक्टर कहते हैं कि रिटायरमेंट या उम्र के बढ़ने के साथ यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है. वर्षों तक जिस व्यक्ति की पहचान उसके काम और जिम्मेदारियों से बनी हो, उसके सामने रिटायरमेंट के बाद अचानक समय, भूमिका और सामाजिक संपर्क में बदलाव आ सकता है. स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां और प्रियजनों से दूरी इस स्थिति को और कठिन बना सकती है.

बुजुर्गों और कामयाब लोगों में बढ़ता अकेलापन: एक खामोश महामारी

अक्सर हम सोचते हैं कि मानसिक तनाव या डिप्रेशन सिर्फ युवाओं, पढ़ाई के दबाव से जूझ रहे बच्चों या नौकरी ढूंढ रहे लोगों को होता है. लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. पिछले कुछ सालों में वरिष्ठ नागरिकों और रिटायर्ड लोगों में आत्महत्या के मामले बहुत तेजी से बढ़े हैं.

मनोचिकित्सक बताते हैं कि इस उम्र में आकर डिप्रेशन की वजहें बिल्कुल अलग होती हैं:

खालीपन का अहसास: जो इंसान 35-40 साल तक सुबह से शाम तक सैकड़ों फाइलों, फैसलों और लोगों के बीच घिरा रहता था, रिटायरमेंट के बाद अचानक उसका फोन बजना बंद हो जाता है. कल तक जो लोग आगे-पीछे घूमते थे, वो नजर नहीं आते. यह खालीपन कई बार बर्दाश्त से बाहर हो जाता है.
पहचान का खो जाना: बहुत से लोग अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ अपने पद और काम से जोड़ लेते हैं. जब कुर्सी जाती है, तो उन्हें लगता है कि उनका अपना कोई वजूद ही नहीं बचा.
सामाजिक और पारिवारिक दूरी: बच्चे अपनी जिंदगी और करियर में मसरूफ हो जाते हैं या विदेश चले जाते हैं. घर के बड़े-बुजुर्ग एक ही छत के नीचे या बड़े बंगलों में रहते हुए भी अंदर से पूरी तरह तन्हा हो जाते हैं.
शारीरिक बीमारियां और लाचारी: उम्र के साथ आने वाली बीमारियां, दर्द और किसी दूसरे पर निर्भर होने का डर इंसान के आत्मसम्मान पर चोट पहुंचाता है.

सब कुछ पाकर भी डिप्रेशन क्यों?

हम आम लोग अक्सर सोचते हैं कि अगर हमारे पास ढेर सारा पैसा, बड़ा बंगला और ऊंची पोस्ट हो तो जिंदगी की सारी तकलीफें खत्म हो जाएंगी. लेकिन डॉक्टर बताते हैं कि डिप्रेशन कोई पैसे या गरीबी की बीमारी नहीं है, यह दिमाग के केमिकल्स और अंदरूनी खालीपन से जुड़ी समस्या है.

दिमाग में सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन किसी भी अमीर या गरीब इंसान को हो सकता है. इंसान बाहर से जितना कामयाब दिखता है, कई बार अंदर से उतना ही ज्यादा दबाव में होता है. उसे लगता है कि अगर वह अपनी उदासी किसी को बताएगा तो लोग उसे कमजोर समझेंगे.

जब व्यक्ति अपनी तकलीफ किसी से कह नहीं पाता, तो अंदर ही अंदर घुटने लगता है.

जीवन में कौन सी गलतियां कभी न करें?

जिंदगी में किसी भी मोड़ पर ऐसी नौबत न आए, इसके लिए हमें अपनी सोच और आदतों में कुछ जरूरी बदलाव करने होंगे:

सिर्फ काम को अपनी पहचान न बनाएं: नौकरी, बिजनेस या ओहदा सिर्फ जिंदगी का एक हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं. अपने काम से अलग अपनी एक निजी पहचान बनाएं; कोई शौक, कला या आदत जो पद जाने के बाद भी आपके साथ रहे.
अपनी खुशियों को टालें मत: बहुत से लोग कहते हैं कि रिटायर होकर आराम करेंगे, रिटायर होकर घूमेंगे. जिंदगी को आज में जीना सीखें.
अपनी तकलीफ छुपाने की गलती न करें: अगर मन भारी लग रहा है, रोने का मन करता है या जीने की इच्छा खत्म हो रही है, तो इसे स्टेटस या इज्जत का मुद्दा न बनाएं. खुलकर अपने करीबी या डॉक्टर से कहें.

मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान कैसे रखें?

जिस तरह शरीर को फिट रखने के लिए हम जिम जाते हैं या टहलते हैं, उसी तरह दिमाग को तंदुरुस्त रखने के लिए भी मेहनत करनी पड़ती है:

बातचीत बंद न करें: चाहे कितनी भी व्यस्तता हो, दिन में कम से कम दो लोगों से दिल खोलकर बातें करें, जहां कोई दिखावा न हो.
सोशल मीडिया से बाहर निकलें: फेसबुक या फोन स्क्रीन की दुनिया आभासी है. असली लोगों से मिलिए, पार्क में बैठिए, पड़ोसी से हालचाल लीजिए.
मदद मांगने में झिझकें नहीं: अगर उदासी दो हफ्ते से ज्यादा खिंच रही है, नींद नहीं आ रही, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत मनोचिकित्सक (साइकाइट्रिस्ट) या काउंसलर से मिलें. काउंसलिंग और हल्की दवाओं से सब ठीक हो सकता है.

आज और अभी से क्या करें?

अगर आप चाहते हैं कि बुढ़ापे या उम्र के किसी भी पड़ाव पर आप अकेलेपन और डिप्रेशन के शिकार न हों, तो आज ही से ये छोटे कदम उठाइए- 

एक नया शौक रख‍िए: बागवानी, पेंटिंग, संगीत, किताबें पढ़ना या समाज सेवा. ये चीजें बुढ़ापे में सबसे बड़ी साथी बनती हैं.
अपने दोस्तों का दायरा मजबूत रखें: अपने पुराने दोस्तों, रिश्तेदारों के साथ संपर्क कभी पूरी तरह न टूटने दें.
घर के बुजुर्गों को वक्त दें: अगर आपके घर में माता-पिता या दादा-दादी हैं, तो सिर्फ उन्हें पैसे या दवा लाकर मत दीजिए. रोज 15 मिनट उनके पास बैठकर उनकी पुरानी कहानियां सुनिए. आपका थोड़ा सा वक्त उनकी जिंदगी बचा सकता है.

डॉक्टर नीलम मिश्रा सलाह देते हैं कि व्यक्ति अपने सामाजिक संपर्क बनाए रखें, नियमित दिनचर्या रखें, पर्याप्त नींद लें, शारीरिक गतिविधि करें और अपनी भावनाओं को भरोसेमंद व्यक्ति के साथ साझा करें. उम्र बढ़ने के साथ सिर्फ शारीरिक जांच ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की भी नियमित समीक्षा जरूरी है.

परिवार के लोगों को भी बुजुर्ग माता-पिता या अकेले रहने वाले रिश्तेदारों से केवल उनकी दवाओं और पैसों के बारे में नहीं, बल्कि उनके मन की स्थिति के बारे में भी बात करनी चाहिए.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मदद मांगना कमजोरी नहीं है. अगर किसी व्यक्ति को लगे कि वह खुद को नुकसान पहुंचा सकता है या उसके मन में आत्महत्या के विचार आ रहे हैं, तो उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए और तत्काल परिवार, भरोसेमंद व्यक्ति, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या आपातकालीन चिकित्सा सेवा से संपर्क करना चाहिए.

विशेषज्ञों के मुताबिक जीवन में परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, संकट के समय लिया गया फैसला हमेशा स्थायी समाधान नहीं होता. समय पर बातचीत, इलाज और साथ मिलने से व्यक्ति को उस संकट से बाहर निकलने में मदद मिल सकती है.

जिंदगी बहुत अनमोल है. कोई भी पद, कोई भी नुकसान या कोई भी अकेलापन आपकी जान से बड़ा नहीं हो सकता. जब भी लगे कि सब कुछ खत्म हो गया है, तो याद रखिए कि हर अंधेरी रात के बाद एक सवेरा जरूर आता है. बस एक बार हाथ बढ़ाकर किसी अपने को पुकारने की जरूरत होती है. अपने मानसि‍क तनाव को दबाने की गलती कभी न करे. किसी अच्छे डाक्टर से बात करने मे कोई बुराई नहीं है, क्याेंक‍ि समझदारी इसी में है कि वक्त रहते सही कदम उठाया जाए.

जरूरी सूचना: अगर आप या आपका कोई परिचित लंबे समय से उदासी, निराशा या आत्महत्या के विचारों से जूझ रहा है, तो तुरंत किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, काउंसलर या हेल्पलाइन से संपर्क करें. मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण कदम है.

(यह लेख दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में क्लिनिकल एवं रिहैबिलिटेशन न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट और कंसल्टेंट नीलम मिश्रा से बातचीत पर आधार‍ित है.)

हेल्पलाइन
वंद्रेवाला फाउंडेशन फॉर मेंटल हेल्‍थ 9999666555 या help@vandrevalafoundation.com
TISS iCall 022-25521111 (सोमवार से शनिवार तक उपलब्‍ध - सुबह 8:00 बजे से रात 10:00 बजे तक)
(अगर आपको सहारे की ज़रूरत है या आप किसी ऐसे शख्‍स को जानते हैं, जिसे मदद की दरकार है, तो कृपया अपने नज़दीकी मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ के पास जाएं)

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