आजकल डिप्रेशन एक गंभीर और तेजी से बढ़ती मानसिक समस्या है. अक्सर लोग इसे सिर्फ उदासी या कमजोरी समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार डिप्रेशन का प्रभाव सिर्फ मन पर नहीं, बल्कि सीधे दिमाग की कार्यप्रणाली पर पड़ता है. अगर समय रहते इसका इलाज न किया जाए, तो यह ब्रेन हेल्थ को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है. आकाश हेल्थ केयर की मनोरोग विशेषज्ञ (एसोसिएट कंसल्टेंट- साइकियाट्री) डॉ. पवित्रा शंकर बताती हैं, “डिप्रेशन केवल एक भावनात्मक स्थिति नहीं है, बल्कि यह दिमाग के केमिकल बैलेंस में बदलाव का परिणाम होता है. इससे सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है.”

दिमाग के केमिकल्स पर असर-
डिप्रेशन के दौरान दिमाग में सेरोटोनिन, डोपामिन और नॉरएपिनेफ्रिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का संतुलन बिगड़ जाता है. ये केमिकल्स हमारे मूड, ऊर्जा और व्यवहार को नियंत्रित करते हैं. डॉ. पवित्रा कहती हैं, “जब इन केमिकल्स का स्तर असंतुलित होता है, तो व्यक्ति लगातार उदासी, थकान और निराशा महसूस करता है.”
मेमोरी और फोकस पर असर-
डिप्रेशन का एक बड़ा प्रभाव मेमोरी और फोकस पर पड़ता है. व्यक्ति को चीजें याद रखने में दिक्कत होती है और ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक डिप्रेशन रहने से ‘कॉग्निटिव फंक्शन' कमजोर हो सकता है, जिससे रोजमर्रा के काम भी प्रभावित होते हैं.
ब्रेन स्ट्रक्चर में बदलाव-
रिसर्च यह भी बताती है कि लंबे समय तक डिप्रेशन रहने से दिमाग के कुछ हिस्सों की संरचना पर असर पड़ सकता है. खासकर हिप्पोकैम्पस, जो मेमोरी और लर्निंग से जुड़ा होता है, उसका आकार कम हो सकता है.
डॉ. मेहता बताते हैं, “क्रॉनिक डिप्रेशन दिमाग की संरचना में बदलाव ला सकता है, जिससे सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ता है.”
निर्णय लेने की क्षमता होती है कमजोर
डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों को अक्सर छोटे-छोटे फैसले लेने में भी कठिनाई होती है. उनका आत्मविश्वास कम हो जाता है और वे हर चीज को लेकर नकारात्मक सोचने लगते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, यह दिमाग के ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' के प्रभावित होने के कारण होता है, जो निर्णय लेने और योजना बनाने के लिए जिम्मेदार होता है.
नींद और ऊर्जा पर असर-
डिप्रेशन का असर नींद पर भी पड़ता है. कुछ लोगों को अनिद्रा की समस्या होती है, तो कुछ को जरूरत से ज्यादा नींद आती है. दोनों ही स्थितियां ब्रेन फंक्शन को प्रभावित करती हैं. डॉ. पवित्रा कहती हैं, “नींद और दिमाग का गहरा संबंध है. जब नींद खराब होती है, तो ब्रेन की रिकवरी प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे लक्षण और गंभीर हो सकते हैं.”

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क्या डिप्रेशन से उबरना संभव है?
विशेषज्ञों का कहना है कि डिप्रेशन एक इलाज योग्य बीमारी है. सही समय पर पहचान और उपचार से इसे नियंत्रित किया जा सकता है. डॉ. पवित्रा कहती हैं, “काउंसलिंग, दवाइयों और लाइफस्टाइल में बदलाव के जरिए डिप्रेशन से बाहर निकला जा सकता है. सबसे जरूरी है कि व्यक्ति मदद लेने में हिचकिचाए नहीं.”
कब लें डॉक्टर की मदद?
- लगातार उदासी या खालीपन महसूस होना
- किसी काम में रुचि न रहना
- नींद और भूख में बदलाव
- थकान और ऊर्जा की कमी
- नकारात्मक या आत्मघाती विचार
- अगर ये लक्षण दो हफ्तों से ज्यादा समय तक बने रहें, तो तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए.
- कैसे रखें दिमाग को स्वस्थ?
- नियमित एक्सरसाइज करें
- पर्याप्त नींद लें
- सोशल कनेक्शन बनाए रखें
- मेडिटेशन और योग अपनाएं
- जरूरत पड़ने पर प्रोफेशनल मदद लें
डिप्रेशन को हल्के में लेना एक बड़ी गलती हो सकती है, क्योंकि इसका असर सीधे दिमाग की कार्यप्रणाली पर पड़ता है.
डॉ. पवित्रा का कहना है, “मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शारीरिक स्वास्थ्य. अगर हम समय रहते डिप्रेशन को पहचान लें और इलाज शुरू कर दें, तो हम दिमाग को गंभीर नुकसान से बचा सकते हैं.” इसलिए, अगर आप या आपके आसपास कोई डिप्रेशन के लक्षण महसूस कर रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें. समय पर मदद लेना ही सबसे बड़ा कदम है.
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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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