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7 दिन, 500 नए केस... पश्चिम बंगाल में डेंगू ने बढ़ाई टेंशन, मुर्शिदाबाद सबसे अधिक प्रभावित, बचाव के तरीके

पश्चिम बंगाल में डेंगू के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. जानें डेंगू के शुरुआती लक्षण, कब बढ़ जाता है खतरा, प्लेटलेट्स को लेकर सबसे बड़ा मिथक और बचाव के आसान उपाय.

डेंगू में सिर्फ प्लेटलेट्स कम होना नहीं है सबसे बड़ा खतरा, डॉक्टर ने बताई जरूरी बात
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मानसून का मौसम जहां गर्मी से राहत देता है, वहीं अपने साथ बीमारियों का पूरा पिटारा भी लेकर आता है. इस वक्त देश के कई हिस्सों में डेंगू बहुत तेजी से अपने पैर पसार रहा है. पश्चिम बंगाल से आ रहे आंकड़े सचमुच चिंता बढ़ाने वाले हैं. स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले सिर्फ सात दिनों के अंदर डेंगू के 500 से अधिक नए मरीज सामने आए हैं. इसके साथ ही इस पूरे सीजन में वहां कुल केस 4,500 के पार चले गए हैं. मुर्शिदाबाद और कोलकाता जैसे इलाकों में तो हालात काफी खराब दिख रहे हैं.

अक्सर लोग सोचते हैं कि डेंगू तो बस एक आम बुखार है जो कुछ दिन में ठीक हो जाएगा, या फिर लोग सीधे प्लेटलेट्स देखकर घबरा जाते हैं. पर हकीकत क्या है? क्या वाकई सिर्फ प्लेटलेट्स गिरना ही सबसे बड़ा खतरा है? आइए, इस बारे में यथार्थ हॉस्पिटल नॉएडा एक्सटेंशन की सीनियर कंसलटेंट इंटरनल मेडिसिन, डॉ. रेशु अग्रवाल से सीधी और आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर हमें क्या करना चाहिए और किन गलतियों से बचना चाहिए.

बंगाल में हालात इतने क्यों बिगड़े?

आंकड़ों पर नजर डालें तो 30 अप्रैल तक राज्य में सिर्फ 770 केस थे. जुलाई के अंत तक यह संख्या 1,946 हुई, फिर अगस्त के खत्म होते-होते करीब 4,000 हो गई और सितंबर के पहले हफ्ते में ही आंकड़ा 4,500 के पार निकल गया. मुर्शिदाबाद जिले में अकेले 870 से ज्यादा मामले आ चुके हैं, जिनमें से 96 तो हाल ही के कुछ दिनों में मिले हैं.

इस तेजी को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने घर-घर जाकर सर्वे शुरू किया है और टेस्टिंग तेज कर दी है. पर सवाल यह है कि क्या यह समस्या सिर्फ एक राज्य की है? बिल्कुल नहीं. डेंगू का मच्छर कहीं भी पनप सकता है, आपके और हमारे घर के अंदर भी.

शुरुआती लक्षण: सिर्फ वायरल बुखार समझने की भूल न करें

डॉ. रेशु अग्रवाल बताती हैं कि डेंगू की शुरुआत अक्सर अचानक बहुत तेज बुखार से होती है. इसमें शरीर का तापमान 102 से 104 डिग्री तक पहुंच सकता है. इसके साथ कुछ खास परेशानियां भी महसूस होती हैं:

  1. आंखों के ठीक पीछे तेज दर्द होना, जो आंखें हिलाने पर और बढ़ जाए.
  2. हड्डियों और जोड़ों में इतना तेज दर्द कि इसे लोग 'हड्डी तोड़ बुखार' भी कहते हैं.
  3. सिर में लगातार भारीपन और तेज दर्द रहना.
  4. बहुत ज्यादा कमजोरी, चक्कर आना और भूख बिल्कुल खत्म हो जाना.
  5. जी मिचलाना, उल्टी का अहसास और त्वचा पर हल्के लाल चकत्ते दिखना.

डॉ. रेशु कहती हैं कि अगर आपको या घर में किसी को भी ऐसा तेज बुखार आ रहा है, तो मेडिकल स्टोर से खुद जाकर कोई भी एंटीबायोटिक या पेनकिलर गोली बिल्कुल मत खाइए. खासकर बिना डाक्टर की सलाह के ब्रूफेन या डिस्प्रिन जैसी दवाएं कतई न लें, क्योंकि इनसे अंदरूनी ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है. अगर बुखार है तो सिर्फ सादा पैरासिटामोल लें और फौरन डाक्टर से मिलकर जांच करवाएं.

सबसे बड़ा भ्रम: क्या सिर्फ प्लेटलेट्स कम होना ही खतरे की बात है?

हमारे समाज में डेंगू का मतलब प्लेटलेट्स का गिरना मान लिया गया है. रिपोर्ट में प्लेटलेट्स 80,000 या 60,000 देखते ही पूरे परिवार में अफरा-तफरी मच जाती है. लोग तुरंत अस्पताल में भर्ती कराने और प्लेटलेट्स चढ़ाने की जिद करने लगते हैं.

लेकिन डॉ. रेशु अग्रवाल इस सोच को गलत बताती हैं. उनके मुताबिक, डेंगू में केवल प्लेटलेट्स की गिनती देखकर मरीज की हालत का अंदाजा नहीं लगाया जाता. असल में डेंगू वायरस खून की नलियों को कमजोर करता है, जिससे शरीर का पानी नसों से बाहर रिसने लगता है और ब्लड प्रेशर गिरने लगता है. इसलिए प्लेटलेट्स से ज्यादा जरूरी यह देखना होता है कि मरीज का बीपी कैसा है, वह कितना पेशाब कर रहा है और उसके शरीर में पानी की कमी तो नहीं हो रही.

अगर प्लेटलेट्स 40-50 हजार भी हैं, पर मरीज आराम से खाना-पीना खा पा रहा है, पेशाब खुलकर आ रहा है और शरीर से कोई खून नहीं बह रहा, तो घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं होती. ऐसे में घर पर भी डॉक्टर की देखरेख में रिकवरी मुमकिन है.

असली खतरा कब शुरू होता है?

ज्यादातर लोग सोचते हैं कि बुखार उतर गया तो मरीज ठीक हो गया. पर हकीकत में डेंगू का सबसे नाजुक दौर वही होता है जब बुखार उतर रहा होता है, यानी बीमारी के तीसरे से पांचवे दिन के बीच.

डॉक्टर के अनुसार, अगर बुखार उतरने के बाद नीचे दिए गए लक्षण दिखें, तो तुरंत इमरजेंसी में भागना चाहिए:

  • पेट में असहनीय या लगातार तेज दर्द होना.
  • दिन में तीन-चार बार से ज्यादा उल्टियां होना और पानी भी पेट में न रुकना.
  • मसूड़ों, नाक से खून आना या शौच का रंग काला होना.
  • मरीज का बहुत सुस्त, चिड़चिड़ा या बेहोशी जैसी हालत में जाना.
  • सांस लेने में तकलीफ होना या हाथ-पैर एकदम ठंडे पड़ जाना.
  • दिनभर में पेशाब की मात्रा बहुत कम हो जाना.

डेंगू से बचाव के पक्के और आसान तरीके

डेंगू का इलाज कोई जादुई गोली नहीं है, बल्कि इसका सबसे बड़ा इलाज है सावधानी. एडिस मच्छर दिन के वक्त ज्यादा काटता है, खासकर सुबह और शाम ढलने से पहले. इससे बचने के लिए कुछ सीधी बातें गांठ बांध लें:

पानी ठहरने न दें: डेंगू का मच्छर साफ और ठहरे हुए पानी में अंडे देता है. कूलर का पानी हर दो दिन में बदलें. गमलों की प्लेट, पुराने टायर, छत पर पड़े कबाड़ या प्लास्टिक के डिब्बों में पानी बिल्कुल जमा न होने दें.
पानी की टंकियां ढकें: छत पर रखी पानी की टंकी का ढक्कन हमेशा कसकर बंद रखें ताकि मच्छर अंदर न जा सके.
पूरी आस्तीन के कपड़े: जब भी बाहर निकलें, खासकर बच्चे जब पार्क में खेलने जाएं, तो उन्हें पूरी बांह की शर्ट और पूरी पैंट पहनाएं.
मॉस्किटो रिपेलेंट का इस्तेमाल: शरीर के खुले हिस्सों पर मच्छर भगाने वाली क्रीम लगाएं और घर के अंदर लिक्विड या जाली का उपयोग करें. सोते वक्त मच्छरदानी सबसे सुरक्षित उपाय है.
शरीर को हाइड्रेटेड रखें: अगर बुखार आ गया है तो ओआरएस, नारियल पानी, नींबू पानी, दाल का पानी और ताजे फलों का जूस खूब पिएं. शरीर में पानी की कमी न होना ही डेंगू की सबसे बड़ी दवा है.

यह केवल सरकार का काम नहीं, साझी जिम्मेदारी है

पश्चिम बंगाल के ताजा आंकड़े यह चेतावनी हैं कि जरा सी लापरवाही पूरे परिवार को अस्पताल पहुंचा सकती है. स्वास्थ्य विभाग जांच और छिड़काव जरूर कर रहा है, पर जब तक हम अपने आंगन, छत और बालकनी को साफ नहीं रखेंगे, तब तक मच्छरों की ब्रीडिंग रोकना नामुमकिन है.

डेंगू से डरने की जरूरत नहीं है, बल्कि सही जानकारी और समय पर इलाज से इसे बहुत आसानी से हराया जा सकता है. तेज बुखार को नजरअंदाज न करें, खूब तरल चीजें पिएं और बिना डॉक्टर से पूछे दवाएं न खाएं. थोड़ी सी सतर्कता आपको और आपके अपनों को इस गंभीर बीमारी से महफूज रख सकती है.

(यह लेख डॉ. रेशु अग्रवाल, सीनियर कंसलटेंट इंटरनल मेडिसिन यथार्थ हॉस्पिटल नॉएडा एक्सटेंशन, से बातचीत पर आधा‍र‍ित है.) 

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