ज्यादातर लोगों को लगता है कि अगर वो डॉक्टर के क्लिनिक में लगे चार्ट की सबसे निचली लाइन आराम से पढ़ पा रहे हैं, तो इसका मतलब उनकी नजर 20/20 है और आंखें पूरी तरह फिट हैं. लेकिन सच यह है कि इससे आपकी नजर का सिर्फ एक ही हिस्सा सामने आता है.
साफ दिखाई देने का मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि आंख अंदर से भी सेहतमंद है. विजुअल एक्यूटी यानी नजर की तेजी बस यह बताती है कि आप कितनी दूर का पढ़ पाते हैं. यह आंखों की कुल सेहत मापने का सही तरीका नहीं है. जब तक हम इस फर्क को नहीं समझेंगे, तब तक आंखों की सही देखभाल नहीं हो सकती.
20/20 विजन का असल में क्या मतलब होता है?
सीधी भाषा में समझें तो 20/20 का मतलब सिर्फ इतना है कि जो चीज एक आम इंसान 20 फीट की दूरी से साफ देख सकता है, उसे आप भी 20 फीट की दूरी से आसानी से देख पा रहे हैं.
यह टेस्ट सिर्फ यह देखता है कि चीजें कितनी साफ दिख रही हैं. यह टेस्ट यह नहीं बताता कि:
- आपकी आंख के अंदर का प्रेशर कितना है.
- पर्दे यानी रेटिना की हालत कैसी है.
- आंखों में आंसू सही मात्रा में बन रहे हैं या नहीं.
- अंदरूनी नसों में कोई सूजन या खराबी तो नहीं आ रही.
आंखों की कई गंभीर बीमारियां बहुत खामोशी से दस्तक देती हैं. मरीज को सब कुछ साफ दिखता रहता है और जब तक परेशानी पकड़ में आती है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है.
साफ नजर के पीछे छिपे बड़े खतरे
अगर आपकी नजर बिल्कुल 6/6 या 20/20 है, तब भी ये परेशानियां चुपके से पनप सकती हैं:
- ड्राई आई की समस्या: लोग इसे हल्की जलन या थकान मानकर टाल देते हैं. लेकिन वक्त पर ध्यान न दिया जाए तो यह कोर्निया की ऊपरी परत को घिस सकती है.
- काला मोतिया (ग्लूकोमा): इसे नजर का 'साइलेंट थीफ' यानी चुपचाप रोशनी चुराने वाला चोर कहा जाता है. इसमें न कोई दर्द होता है, न नजर तुरंत धुंधली होती है. यह धीरे-धीरे साइड की नजर को खत्म करता है और इंसान को भनक तक नहीं लगती.
- रेटिना की बीमारियां: शुगर के मरीजों में डायबिटिक रेटिनोपैथी या पर्दे की कमजोरी शुरू में कोई लक्षण नहीं दिखाती. जब तक धुंधलापन आता है, तब तक बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है.
- बिना लक्षणों वाली बीमारी: आंख की कई बीमारियां सालों तक बिना किसी दर्द या परेशानी के अंदर ही अंदर बढ़ती रहती हैं.
सिर्फ इस भरोसे बैठे रहना कि "मुझे तो सब साफ दिखता है", कभी-कभी बहुत भारी पड़ सकता है.
आंखों का रूटीन चेकअप क्यों है जरूरी?
जब आप किसी आई स्पेशलिस्ट के पास फुल चेकअप के लिए जाते हैं, तो वो सिर्फ चश्मे का नंबर नहीं जांचते. वो मशीन से आंख का प्रेशर नापते हैं, अंदर के पर्दे की फोटो लेते हैं और नसों की बारीक जांच करते हैं. कई बार डायबिटीज और हाई बीपी जैसी बीमारियों का पहला सुराग भी आंखों की जांच से ही मिलता है.
इन जांचों से बीमारी का उस वक्त पता चल जाता है जब उसका इलाज बहुत आसान होता है. लक्षण आने का इंतजार करने का मतलब है नुकसान होने का इंतजार करना.
आंखों की पूरी जांच सिर्फ उन लोगों के लिए नहीं है जो चश्मा लगाते हैं. जैसे हम दांतों की सफाई करवाते हैं या समय-समय पर ब्लड प्रेशर चेक कराते हैं, वैसे ही साल में एक बार आंखों की कम्प्लीट जांच करवाना भी सेहत के लिए बेहद जरूरी है.
नजर साफ होना अच्छी बात है, लेकिन आंखें अंदर से तंदुरुस्त हैं या नहीं, यह जानना उससे भी ज्यादा जरूरी है. इसलिए धुंधला दिखने का इंतजार मत करिये, समय पर जांच करवाएं और अपनी अनमोल आंखों का पूरा धियान रखें.
लेखक के बारे में -
डॉ. रोहन एन. डेढ़या रेटिना, मोतियाबिंद और रिफ्रैक्टिव सर्जरी के विशेषज्ञ नेत्र रोग विशेषज्ञ हैं. उन्होंने MBBS और MS (ऑफ्थैल्मोलॉजी) की डिग्री प्राप्त की है तथा विट्रियोरेटिनल सर्जरी में विशेष फेलोशिप (FVRS) की है. आंखों की जटिल बीमारियों के उपचार और उन्नत सर्जिकल प्रक्रियाओं में उनकी विशेष रुचि है. उन्होंने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के कई वैज्ञानिक सम्मेलनों में शोध पत्र प्रस्तुत किए हैं तथा उन्हें Retina Imaging Congress 2022 में सम्मानित भी किया जा चुका है.
FAQs-
Q. 20/20 विजन का मतलब क्या है?
20/20 विजन का मतलब है कि आप 20 फीट की दूरी से वही चीज उतनी स्पष्टता से देख सकते हैं जितनी एक सामान्य व्यक्ति देखता है.
Q. क्या 20/20 विजन होने पर भी आंखों में बीमारी हो सकती है?
हां, ग्लूकोमा, ड्राई आई और रेटिना से जुड़ी कई समस्याएं शुरुआती चरण में नजर को प्रभावित किए बिना विकसित हो सकती हैं.
Q. ग्लूकोमा को साइलेंट बीमारी क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इसके शुरुआती चरण में अक्सर दर्द या स्पष्ट लक्षण नहीं होते, लेकिन यह धीरे-धीरे दृष्टि को नुकसान पहुंचा सकता है.
Q. आंखों की जांच कितनी बार करवानी चाहिए?
विशेषज्ञ आम तौर पर नियमित नेत्र जांच की सलाह देते हैं, खासकर यदि उम्र बढ़ रही हो या डायबिटीज व हाई बीपी जैसी समस्याएं हों.
Q. क्या डायबिटीज का असर आंखों पर पड़ सकता है?
हाँ. डायबिटिक रेटिनोपैथी जैसी समस्याएं आंखों की रोशनी को प्रभावित कर सकती हैं और शुरुआती चरण में लक्षण भी नहीं दिख सकते.
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