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छोटे शहरों और गांवों में Eye Care की बड़ी उम्मीद बना AI, जानिए कैसे करेगा मदद

AI आधारित Eye Care तकनीक आंखों की बीमारियों जैसे डायबिटिक रेटिनोपैथी और ग्लूकोमा की पहचान जल्दी कर सकती है. जानिए गांवों और छोटे शहरों के मरीजों को कैसे होगा फायदा.

छोटे शहरों और गांवों में Eye Care की बड़ी उम्मीद बना AI, जानिए कैसे करेगा मदद
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क्या भविष्य में आपकी आंखों की जांच कुछ ही सेकंड में हो सकेगी? AI आधारित तकनीक अब डायबिटिक रेटिनोपैथी और ग्लूकोमा जैसी गंभीर आंखों की बीमारियों के जोखिम की पहचान करने में मदद कर रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे गांवों और छोटे शहरों तक बेहतर Eye Care पहुंचाने में मदद मिल सकती है.

भारत जैसे बड़े देश में आंखों की बीमारी को लेकर दो बहुत बड़ी समस्याएं देखने को मिलती हैं. पहली, यह कि बड़े शहरों को छोड़ दें तो छोटे कस्बों और गांवों में आंखों के बड़े डॉक्टर बहुत कम हैं. दूसरी, सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे यहां लोग डॉक्टर के पास तभी जाते हैं जब आंखों से धुंधला दिखने लगता है या समस्या बहुत बढ़ जाती है.

मैक्सिविजन सुपर स्पेशलिटी आई हॉस्पिटल्स के ग्रुप सीईओ, श्री बद्रीनारायण श्रीकांत का कहना है कि AI इस पूरी तस्वीर को बदल सकता है. लेकिन क्या यह वाकई इतना आसान है? आइए इसे सीधी और बोलचाल की भाषा में समझते हैं.

आंखों की जांच के लिए AI इतना सटीक क्यों है?

दरअसल हमारी आंखें एक तरह से कैमरे जैसी होती हैं. जब भी हम जांच कराने जाते हैं तो डॉक्टर रेटिना की फोटो लेते हैं या फिर खास किस्म के स्कैन (जैसे OCT) करते हैं.

  • रेटिना की तस्वीर देखकर ही शुगर की वजह से होने वाली खराबी (डायबिटिक रेटिनोपैथी) का पता चलता है.
  • काला मोतिया यानी ग्लूकोमा और पर्दे की दूसरी दिक्कतों के बारीक निशान भी इन्हीं तस्वीरों में कैद होते हैं.
  • AI सिस्टम इन लाखों तस्वीरों को कुछ ही सेकंड में स्कैन करके यह बता सकता है कि आंख में कोई खराबी पनप रही है या नहीं.

इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जब एक साथ सैकड़ों लोगों की जांच करनी हो, तो यह तकनीक तुरंत छांट कर बता देगी कि किस मरीज को फौरन डॉक्टर के पास भेजने की जरूरत है.

AI का उद्देश्य डॉक्टरों की जगह लेना नहीं, बल्कि आंखों की बीमारियों की पहचान को तेज और अधिक सुलभ बनाना है.

— बद्रीनारायण श्रीकांत, ग्रुप CEO, Maxivision Super Speciality Eye Hospitals

गांव और छोटे शहरों के मरीजों को क्या फायदा होगा?

आज भी गांवों और छोटे कस्बों में किसी को आंख दिखाने जाना हो तो पूरा दिन खराब करके बड़े शहर के अस्पताल जाना पड़ता है. अक्सर लोग इस झंझट से बचने के लिए तब तक टालते रहते हैं जब तक दिखना काफी कम न हो जाए.

लोकल क्लीनिक और मोबाइल वैन: अगर गांव के छोटे क्लीनिक या मोबाइल हेल्थ वैन में AI वाली स्क्रीनिंग मशीन लगा दी जाए, तो कोई भी बेसिक हेल्थ वर्कर मरीज की आंख का फोटो ले सकेगा.
समय पर अलर्ट: मशीन फौरन बता देगी कि मामला सामान्य है या किसी बड़े आई स्पेशलिस्ट को दिखाने की जरूरत है.
फॉलो-अप में आसानी: जो मरीज पहले से इलाज करा रहे हैं, उनके सुधार पर भी दूर बैठे नजर रखी जा सकेगी.

इससे उन लाखों लोगों तक सही समय पर मदद पहुंच सकेगी जो सिर्फ दूरी और जानकारी के अभाव में अपनी दृष्टि खो बैठते हैं.

तकनीक अच्छी है, पर भरोसा सबसे जरूरी है

सिर्फ कंप्यूटर का कोई सॉफ्टवेयर ले आने से स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर नहीं हो जातीं. भारत में हर इलाके के लोगों की जीवनशैली, बीमारियां और खानपान अलग है. इसलिए AI टूल्स को पहले हमारे अपने देश के मरीजों के डेटा पर ठीक से परखा जाना चाहिए.

  • यह तकनीक इतनी आसान होनी चाहिए कि आम अस्पताल इसे बिना ज्यादा खर्च के अपना सकें.
  • मरीज की निजी जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रहनी चाहिए.
  • जांच से लेकर सही डॉक्टर तक मरीज को पहुंचाने का रास्ता एकदम साफ होना चाहिए.

डॉक्टर की जगह कोई मशीन नहीं ले सकती

बहुत से लोगों को यह डर लगता है कि कहीं कंप्यूटर ही डॉक्टर की जगह न ले ले. पर सच यह है कि AI का काम डॉक्टर को हटाना नहीं, बल्कि उनके काम को आसान बनाना है.

आखिरी फैसला हमेशा डॉक्टर का होगा: मशीन सिर्फ एक इशारा कर सकती है, लेकिन बीमारी की गंभीरता को समझना और सही दवा या सर्जरी तय करना डॉक्टर के अनुभव पर ही निर्भर करेगा.
मेडिकल स्टाफ की ट्रेनिंग: नर्सों और तकनीशियनों को यह सिखाना होगा कि वे मशीन के नतीजों को सही ढंग से समझें और मरीज को आसान भाषा में समझा सकें.

भारत के पास हुनरमंद डाक्टर भी हैं और बेहतरीन इंजीनियर भी. अगर इन दोनों ताकतों को सही दिशा में जोड़ दिया जाए, तो हम हर नागरिक तक सस्ती और बेहतरीन नेत्र सेवा पहुंचा सकते हैं.

आखिरकार, मकसद सिर्फ नई तकनीक का दिखावा करना नहीं है, बल्कि यह पक्का करना है कि किसी भी इंसान की रोशनी सिर्फ इस वजह से न जाए कि उसे समय पर सही सलाह नहीं मिल पाई. समय रहते जांच हो जाए और सही इलाज मिल सके, यही सबसे बड़ा लक्ष्य होना चहिए. हमारे देश मे अगर इसका सही इस्तमाल हुआ तो लाखो लोगो की जिंदगी रोशन रह सकती है.

लेखक के बारे में : श्री बद्रीनारायण श्रीकांत मैक्सिविजन सुपर स्पेशलिटी आई हॉस्पिटल्स के ग्रुप सीईओ हैं.

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