Malai Kofta: रेस्टोरेंट में खाना खाने जाएं और मेन्यू में मलाई कोफ्ता दिख जाए, तो कई लोग बिना ज्यादा सोचे वही ऑर्डर कर देते हैं. इसकी मलाईदार ग्रेवी, नरम कोफ्ते और हल्का मीठा स्वाद इसे बाकी सब्जियों से अलग बनाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस मशहूर डिश का नाम आखिर “मलाई कोफ्ता” क्यों पड़ा? “कोफ्ता” शब्द कहां से आया और इस डिश का भारतीय खाने में इतना खास स्थान कैसे बना? इसके पीछे मुगल दौर, फारसी रसोई और भारतीय स्वाद का दिलचस्प मेल छिपा हुआ है.
“कोफ्ता” शब्द की कहानी क्या है?
“कोफ्ता” शब्द फारसी भाषा से आया माना जाता है. फारसी में “कोफ्तन” का मतलब होता है किसी चीज को पीसना या कूटना. पुराने समय में मीट को बारीक पीसकर गोल बॉल्स बनाई जाती थीं और फिर उन्हें मसालों के साथ पकाया जाता था. इन्हीं बॉल्स को “कोफ्ता” कहा जाने लगा.
मध्य एशिया और फारस से यह डिश मुगल काल में भारत पहुंची. शुरुआत में कोफ्ते ज्यादातर नॉन-वेज हुआ करते थे. लेकिन भारत में शाकाहारी खाने की लोकप्रियता को देखते हुए धीरे-धीरे आलू, पनीर और सब्जियों से बनने वाले वेज कोफ्ते तैयार होने लगे.

मलाई कैसे बनी इस डिश की पहचान?
इस डिश की सबसे बड़ी खासियत इसकी क्रीमी ग्रेवी है. इसे बनाने में मलाई, क्रीम, दूध, काजू और कभी-कभी दही का इस्तेमाल किया जाता है. इसी वजह से इसके नाम में “मलाई” शब्द जुड़ गया.
मुगल रसोई में मलाई, मेवे और घी का खूब इस्तेमाल होता था. शाही खानपान में ऐसी डिश को खास माना जाता था, जिनका स्वाद रिच और टेक्सचर मुलायम हो. मलाई कोफ्ता भी उसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है.
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भारत में बदलता गया स्वाद
समय के साथ मलाई कोफ्ता का स्वाद और तरीका दोनों बदलते गए. उत्तर भारत में पनीर और आलू वाले कोफ्ते सबसे ज्यादा पसंद किए जाने लगे. कई जगहों पर इसमें किशमिश और काजू की स्टफिंग भी डाली जाती है.
कुछ लोग इसे लाल टमाटर वाली ग्रेवी में बनाते हैं, जबकि कई रेस्टोरेंट सफेद और हल्की मीठी ग्रेवी वाला मलाई कोफ्ता सर्व करते हैं. घरों में भी अब इसके कई आसान वर्जन बनने लगे हैं.
क्यों आज भी है लोगों की फेवरेट डिश?
मलाई कोफ्ता को आज भी शाही डिश माना जाता है. इसका स्वाद हल्का, क्रीमी और मसालेदार होता है, जो बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को पसंद आता है. यही वजह है कि शादी, पार्टी और रेस्टोरेंट के मेन्यू में यह डिश हमेशा खास जगह बनाए रखती है.
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