नीम करौली बाबा यानी महाराजजी से जुड़ी कई ऐसी भक्त-कथाएं हैं, जिन्हें सुनकर श्रद्धालु आज भी हैरान रह जाते हैं. ऐसी ही एक कथा में अरहर की दाल और रोटी का जिक्र आता है. बता दें कि एक अनजान व्यक्ति बांसुरी लेकर एक घर पहुंचा और उसने भूख लगने की बात कहते हुए अरहर की दाल मांगी. हैरानी की बात यह रही कि उसी समय पुरी में मौजूद महाराजजी ने भी अचानक अरहर की दाल और रोटी खाने की इच्छा जताई. भक्तों ने इस घटना को बाबा की आध्यात्मिक लीला और दर्शन से जोड़कर देखा.
अचानक घर पहुंचा बांसुरी वाला शख्स
दादा मुकर्जी ने अपनी पुस्तक By His Grace: A Devotee's Story में इस बात का जिक्र करते हुए लिखा कि एक दिन महाराजजी जगन्नाथ पुरी गए हुए थे और वह इलाहाबाद स्थित अपने घर पर थे. करीब शाम चार बजे घर के पीछे से बच्चों के शोर की आवाज आई. बच्चे एक लंबे बालों वाले व्यक्ति के आसपास जमा थे. उसके हाथ में पीतल की बांसुरी थी. उस व्यक्ति ने भूख लगने की बात कही. घर से उसे रोटी और दाल दी गई, लेकिन उसने खास तौर पर अरहर की दाल का नाम लिया और कहा कि उसने काफी समय से अरहर की दाल नहीं खाई है.
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प्रसाद खाने के बाद कही रहस्यमयी बात
घरवालों ने उसे खाना और वृंदावन से आया प्रसाद भी दिया. खाना खत्म करने के बाद जब उसे मुंह धोने के लिए कहा गया तो उसने मुंह धोने के बजाय अपनी बांसुरी ही धो दी. जाते समय उस व्यक्ति ने कहा कि वह काफी समय से ऐसे घर की तलाश में था, जहां भक्ति और लक्ष्मी का वास हो. इस बात ने घरवालों को और भी हैरान कर दिया.
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बिहारी जी ने दिए दर्शन- बाबा
दादा मुकर्जी के अनुसार, इस घटना के दो दिन बाद महाराजजी घर लौटे. तब उन्होंने कहा कि बिहारी जी ने तुम्हें दर्शन दिए. यहां बिहारी जी से भगवान कृष्ण का संदर्भ माना गया है. परिवार की एक सदस्य अशोका ने यह भी बताया कि उसने दिल्ली में महाराजजी के सााथ एक व्यक्ति को देखा था, जो इसी तरह का दिखाई देताा था. हालांकि उस समय उसके हाथ में बांसुरी की जगह एक बड़ी छड़ी थी.
उसी समय पुरी में बाबा ने मांगी अरहर की दाल
जानकारी के अनुसार, इस कथा का सबसे हैरान करने वाला हिस्सा इसके बाद सामने आया. जब इस घटना की चर्चा हुई तो जीवंतिमा ने दादा मुकर्जी से पूछा कि बांसुरी वाला व्यक्ति किस दिन घर आया था. जवाब मिला- गुरुवार. जीवंतिमा ने बताया कि उसी दिन जगन्नाथ पुरी में करीब शाम चार बजे महाराजजी ने अचानक कहा कि उन्हें रोटी और अरहर की दाल खानी है. जबकि वह सामान्य तौर पर मूंग की दाल खाते थे और उस दिन भोजन भी कर चुके थे. भक्तों ने उन्हें समझाया कि उन्होंने खानाा खा लिया है, लेकिन महाराजजी बार-बार कहते रहे कि उन्हें भूख लगी है और अरहर की दाल चाहिए. आखिरकार उनके लिए अरहर की दाल बनाई गई.
भक्तों ने इसे बाबा की लीला माना
इलाहाबाद में बांसुरी वाले व्यक्ति का अरहर की दाल मांगना और लगभग उसी समय पुरी में महाराजजी का अरहर की दाल खाने की इच्छा जताना भक्तों के लिए बेहद खास अनुभव बन गया. दादा मुकर्जी ने इसे अपनी पुस्तक में भक्त-अनुभव के रूप में दर्ज किया है. नीम करौली बाबा के भक्त इस घटना को उनकी आध्यात्मिक शक्ति और लीला से जोड़कर देखते हैं. हालांकि ऐसी घटनाओं को आस्थाा और भक्तों के अनुभव के नजरिए से समझना उचित है.
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