- मणिपुर में ED ने सलाइ ग्रुप और स्मार्ट सोसाइटी की करीब पचास करोड़ की संपत्तियां अस्थायी रूप से अटैच की हैं
- जांच में आरोपियों पर पोंजी स्कीम चलाकर लोगों को भारी रिटर्न का लालच देकर अवैध रकम जुटाने का आरोप लगाया गया है
- आरोपियों ने भारत से मणिपुर को अलग घोषित करने और नफरत फैलाने जैसी अलगाववादी गतिविधियों में भी हिस्सा लिया था
मणिपुर में अवैध पोंजी स्कीम और अलगाववादी गतिविधियों से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने बड़ी कार्रवाई की है. ED के इम्फाल सब-जोनल कार्यालय ने सलाइ ग्रुप ऑफ कंपनियों, स्मार्ट सोसाइटी और उनसे जुड़ी संस्थाओं की करीब 50 करोड़ 80 लाख रुपये की संपत्तियां अस्थायी रूप से अटैच कर दी हैं. ED के मुताबिक यह तीसरा प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर है, जिसके तहत सलाइ ग्रुप से जुड़ी कई कंपनियों के बैंक खातों में जमा रकम, जमीन, इमारतें और कई चल-अचल संपत्तियों को जब्त किया गया है.
सलाइ ग्रुप और स्मार्ट सोसाइटी पर तीसरा अटैचमेंट ऑर्डर
अटैच की गई संपत्तियों में औद्योगिक और व्यावसायिक इकाइयां भी शामिल हैं, जिनमें राइस मिल, फ्लोर मिल, खाद्य तेल रिफाइनरी, मशरूम प्लांट, इमू फार्म, फिश फार्म और जिम उपकरण जैसी संपत्तियां शामिल हैं. ED की यह जांच मणिपुर पुलिस द्वारा दर्ज एक एफआईआर के आधार पर शुरू की गई थी. यह एफआईआर इम्फाल वेस्ट जिले के लांफेल पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई थी. इसमें यामबेम बीरेन और नरेंगबाम समरजीत को आरोपी बनाया गया था। दोनों ने खुद को मणिपुर स्टेट काउंसिल का मुख्यमंत्री और विदेश एवं रक्षा मंत्री घोषित कर रखा था.
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अलगाववादी गतिविधियों और पोंजी स्कीम का आरोप
जांच एजेंसियों के मुताबिक आरोपियों ने भारत संघ से मणिपुर को अलग घोषित करने की कोशिश की और लोगों के बीच नफरत और वैमनस्य फैलाने जैसी गतिविधियों में भी शामिल रहे। इस मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA ने भी आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है. NIA की जांच में सामने आया कि आरोपियों ने सलाइ ग्रुप और उससे जुड़ी स्मार्ट सोसाइटी के जरिए लोगों से भारी रकम जुटाई. निवेशकों को हर साल 36 प्रतिशत रिटर्न देने का लालच दिया गया, जबकि इसके लिए उनके पास कोई कानूनी अनुमति या लाइसेंस नहीं था.
NIA की चार्जशीट, 36% रिटर्न का लालच देकर ठगी
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने करीब 19 कंपनियों के नेटवर्क के जरिए लोगों से जुटाई गई रकम को इधर-उधर घुमाया और उसका इस्तेमाल अवैध गतिविधियों के लिए किया, इनमें अलगाववादी गतिविधियों को फंडिंग देने के आरोप भी शामिल हैं. सलाइ फाइनेंशियल सर्विसेज को बॉम्बे मनी लेंडर्स एक्ट के तहत सिर्फ कर्ज देने की अनुमति थी, लेकिन आरोप है कि इस कंपनी ने इसका दुरुपयोग करते हुए लोगों से डिपॉजिट लेना शुरू कर दिया और बिना RBI की अनुमति के बैंक या एनबीएफसी की तरह काम करने लगी. बाद में इस मामले में CBI ने भी साल 2023 में एफआईआर दर्ज की.
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19 कंपनियों के नेटवर्क से फंड डायवर्जन का खुलासा
जांच एजेंसी के मुताबिक यह पूरी स्कीम एक अवैध पोंजी और मनी सर्कुलेशन स्कीम की तरह चलाई जा रही थी. CBI की चार्जशीट के अनुसार आरोपियों ने करीब 46 करोड़ 43 लाख रुपये की ठगी कर यह रकम अपने और संबंधित कंपनियों के बैंक खातों में जमा कराई. ED की जांच के दौरान सलाइ मार्ट प्राइवेट लिमिटेड के बैंक खाते में मौजूद करीब 11 लाख 26 हजार रुपये और सलाइ एग्री कंसोर्टियम प्राइवेट लिमिटेड के खाते में मौजूद करीब 2 करोड़ 32 लाख रुपये पहले ही अटैच किए जा चुके हैं. इन अटैचमेंट को बाद में न्यायिक प्राधिकरण ने भी पुष्टि दी.
CBI जांच में ₹46 करोड़ से ज्यादा की ठगी की पुष्टि
ED की जांच में यह भी सामने आया कि अवैध तरीके से जुटाई गई रकम का इस्तेमाल व्यापारिक खर्च, संपत्तियां खरीदने, विदेश से मशीनरी खरीदने, कस्टम ड्यूटी और इनकम टैक्स चुकाने, निदेशकों के विदेशी दौरे, क्रेडिट कार्ड भुगतान और कर्मचारियों के जरिए नकद निकासी के लिए किया गया, कुछ संपत्तियां नकद में भी खरीदी गईं. आगे की जांच में सलाइ ग्रुप और उससे जुड़ी संस्थाओं के नाम पर 28 अचल और 5 चल संपत्तियों की पहचान की गई है, जिन्हें अपराध की आय यानी प्रोसीड्स ऑफ क्राइम से खरीदा गया माना गया है.
अब तक ₹53 करोड़ से अधिक की संपत्तियां जब्त, जांच जारी
इन्हीं संपत्तियों को मिलाकर करीब 50 करोड़ 80 लाख रुपये की संपत्तियां अब अटैच की गई हैं. ED के मुताबिक अब तक सलाइ ग्रुप और उससे जुड़ी संस्थाओं की कुल 53 करोड़ 22 लाख रुपये से ज्यादा की चल-अचल संपत्तियां अटैच की जा चुकी हैं. प्रवर्तन निदेशालय का कहना है कि इस पूरे मामले में आगे की जांच अभी जारी है और आने वाले समय में और भी खुलासे हो सकते हैं.
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