यह महज एक चुनाव से कहीं ज्यादा है. यह 'अपनेपन' के व्याकरण को लेकर एक विवाद है कि "हम" कौन हो सकते हैं, और जब सत्ता दांव पर हो, तो "हम" का मतलब क्या हो सकता है? पश्चिम बंगाल में, आने वाली वोटों की गिनती सिर्फ विधानसभा की सीटें ही तय नहीं करती, बल्कि यह पहचान की दो विरोधी कल्पनाओं की भी परीक्षा लेती है. दोनों ही आत्मविश्वास से भरी हैं, दोनों ही लोगों को लामबंद कर रही हैं, और दोनों ही नैतिक रूप से सही होने की भाषा में बात कर रही हैं. एक कल्पना इस क्षेत्र को एक 'बंगाली घर' के रूप में देखती है. दूसरी कल्पना राष्ट्र के आध्यात्मिक केंद्र को एक 'हिंदू घर' के रूप में देखती है. इन दोनों के बीच रोजमर्रा की जिंदगी की नाज़ुक धुरी टिकी है- नौकरियां, सुरक्षा, गरिमा, और एक पूर्ण नागरिक के तौर पर गिने जाने का अधिकार.
जरा सोचिए कि इतिहास कैसे छोटी-छोटी बातों में छिपा होता है. कैसे एक नारा एक 'मिजाज' बन सकता है, कैसे भीड़ का एहसास मौसम जैसा हो सकता है. यहां भी, वह "मिजाज" बन चुका है. इस चुनाव के मुख्य टकराव को लगभग एक 'थीसिस स्टेटमेंट' की तरह संक्षेप में कहा जा सकता है- बंगाली पहचान बनाम हिंदुत्व पहचान. और फिर भी, यह कभी भी सिर्फ विचारधारा तक सीमित नहीं होता. इसमें यादें भी शामिल होती हैं, शिकायतें भी, और इस बात का एक सोच-समझकर गढ़ा गया एहसास भी कि 'कमरे के अंदर' कौन है और किसे बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है?
TMC ने बंगाली पहचान को मुद्दा बनाया
तृणमूल कांग्रेस ने बंगाली पहचान को महज एक अमूर्त सांस्कृतिक प्रतीक के तौर पर नहीं, बल्कि नागरिकता के मायने तय करने के अधिकार के तौर पर पेश किया. उनका बंगाली नारा- "जितना चाहो हमला करो, इस बार बांग्ला ही जीतेगा" सुनने में तो चुनौती जैसा लगता है, लेकिन यह इससे कहीं ज्यादा बारीक काम करता है. यह राजनीति को एक प्रतिरोध में बदल देता है. यह इस बात का संकेत देता है कि पहचान पर हमला हो रहा है, और बचने का एकमात्र तरीका यह है कि वोट ऐसे दिया जाए, मानो 'बंगालीपन' कोई त्योहार नहीं, बल्कि जीवनरेखा हो.
इसी सोच के साथ, TMC ने अपने चुनाव प्रचार को कुछ सोचे-समझे आधारों पर केंद्रित किया- "दो M" और प्रक्रियाओं को शिकायतों में बदलने की एक कोशिश. ये दो M हैं- महिला और मुस्लिम. ये महज आबादी से जुड़े आंकड़े नहीं थे. इन्हें नैतिक जिम्मेदारियों और गारंटियों के तौर पर पेश किया गया. और फिर आया SIR, जिसे मुख्य एजेंडे के तौर पर आगे बढ़ाया गया. न सिर्फ एक प्रशासनिक मसले के तौर पर, बल्कि एक आरोप के तौर पर भी. ममता बनर्जी ने तो सुप्रीम कोर्ट में भी SIR की प्रक्रिया की नाइंसाफी के खिलाफ दलील दी. TMC ने यह तर्क दिया कि "तार्किक विसंगतियों" (logical discrepancies) की वह श्रेणी, जिससे 27 लाख वोटर प्रभावित हो रहे थे, नाइंसाफ और असंवैधानिक थी और उन्होंने इस शिकायत को एक बड़ी कहानी से जोड़ दिया कि यह पूरी प्रक्रिया असल में केंद्र सरकार और बाहरी लोगों की ओर से थोपी गई थी, जिससे बंगाली वोटरों के अधिकार छीने जा रहे थे.

इस तरह, चुनावी राजनीति में पहचान ही एक अदालत का रूप ले लेती है. एक तकनीकी वर्गीकरण, धोखे की एक कहानी में बदल जाता है. वोटरों की सूची, सम्मान का प्रतीक बन जाती है. दावा महज यह नहीं होता कि "हम सही हैं," बल्कि यह होता है कि "आपके अधिकार छीने जा रहे हैं" और अगर आपके अधिकार छीने जा रहे हैं, तो गुस्सा ही आपका फर्ज बन जाता है.
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TMC का महिला कल्याण
महिलाओं का सशक्तिकरण इस अभियान के भावनात्मक इंजनों में से एक था. TMC ने अपनी संदेश-नीति के केंद्र में कई कल्याणकारी योजनाओं को रखा, जिनमें लक्ष्मी भंडार, ज्योतिर आलो, कन्याश्री प्रकल्प, रूपाश्री प्रकल्प, स्वास्थ्य साथी, और अन्य कई ऐसे कार्यक्रम थे जिन्हें गरीब महिला मतदाताओं तक सीधे पैसे और सहायता पहुंचाने वाले कार्यक्रमों के रूप में बताया गया. राजनीतिक दृष्टि से, संदेश यह था कि सरकार उन तरीकों से आप तक पहुंचती है जो वास्तव में मायने रखते हैं; और जब हिंसा या उपेक्षा विपक्ष का मुख्य मुद्दा होता है, तो TMC उसकी जगह देखभाल, नकद सहायता और ठोस लाभों के नाम गिनाकर जवाब दे सकती है.
TMC का दावा है कि BJP एक 'बाहरी' (बहिरोगतो) पार्टी है
इसके साथ ही, उन्होंने 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं को सुरक्षा देने का वादा भी किया और यह वादा केवल एक नीति के तौर पर नहीं, बल्कि एक भरोसे के तौर पर किया गया. लेकिन शायद TMC की पहचान की राजनीति (identity politics) की सबसे खास बात यह थी कि उसने इस बात पर जोर दिया कि बंगाली पहचान केवल जातीय नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक, सामाजिक और स्थानीय भी है. उनके नजरिए से, विपक्षी पार्टी बंगाली परंपरा में इतनी गहराई से रची-बसी नहीं थी कि वह बंगाल के भविष्य पर कोई नैतिक अधिकार जता सके. इसीलिए उन पर बार-बार यह आरोप लगाया गया कि BJP एक "बाहरी" (बहिरोगतो) पार्टी है. एक ऐसी ताकत जो शायद नारे तो लगा सकती है, लेकिन उसमें बंगाल की कोई सच्ची समझ नहीं है.

BJP का जोर हिंदुत्व की पहचान पर
TMC को जवाब देने के लिए बीजेपी ने 'हिंदुत्व की पहचान' का मुद्दा उठाया. इसे ऐसे विषयों के इर्द-गिर्द बुना गया है जो 'अपनेपन' की सीमाओं को संकरा करके एकता हासिल करने की कोशिश करते हैं. उनके अभियान का सबसे अहम मुद्दा था "घुसपैठ" यानी बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ. इसे केवल शासन-प्रशासन से जुड़ा मुद्दा नहीं माना गया, बल्कि इसे सांस्कृतिक और राजनीतिक दायरे पर एक 'अस्तित्व का संकट' (existential pressure) बताया गया. पहचान की राजनीति में यह एक जाना-पहचाना तरीका है- जब अपनी सीमाओं पर खतरा महसूस होता है, तो 'एकता' को ही सुरक्षा के तौर पर पेश किया जाता है.
इसके बाद, BJP ने TMC के मुस्लिम-संपर्क अभियान को कमजोर करने का लक्ष्य रखा. उनका दावा था कि TMC मुस्लिम मतदाताओं को अनुचित तरीके से खुश करने की कोशिश कर रही है; और इसी आरोप को आधार बनाकर उन्होंने हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की एक बड़ी कोशिश शुरू की. सांस्कृतिक लामबंदी (cultural mobilization) भी इस रणनीति का एक हिस्सा बन गई. जागरण, रामनवमी के जुलूस, और ऐसे नारे जिनके जरिए अलग-अलग समुदायों को एक ही नारे के तले एकजुट करने की कोशिश की गई. जैसे "जय श्री राम," "जय मां दुर्गा," और "जय मां काली." ये नारे भावनात्मक प्रतीकों (emotional tokens) की तरह काम करते हैं. ये आस्था को एक सार्वजनिक संकेत में बदल देते हैं, और राजनीतिक निष्ठा को प्रत्यक्ष भागीदारी का रूप दे देते हैं.
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'पोरीबोरतोन' पर BJP का जोर
BJP ने "पोरीबोरतोन" यानी बदलाव के मुद्दे पर भी जोर दिया. यानी बंगाल का पूरी तरह से कायापलट, अतीत को फिर से ऐसा वर्तमान बनाना जिस पर लोग गर्व कर सकें. इस नजरिए से देखें तो, पश्चिम बंगाल सिर्फ बेहतर नहीं बन रहा है, बल्कि उसे उसकी "असली" छवि में वापस लाया जा रहा है, जिसे अक्सर "सोनार बांग्ला" (सोने का बंगाल) जैसी चाहत भरी कहावत से बयां किया जाता है. महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर भी बात हुई, लेकिन एक अलग ही अंदाज में. BJP ने संसद के जरिए 'महिला आरक्षण बिल' पास करवाने की अपनी कोशिशों को उजागर किया, और फिर इसके नाकाम रहने के लिए TMC और 'INDIA' गठबंधन के दूसरे दलों को जिम्मेदार ठहराया. इसके पीछे का तर्क एक जैसा ही रहा. अगर राज्य सरकार महिलाओं के भविष्य को सुरक्षित नहीं रख सकती, तो फिर राजनीतिक बदलाव बेहद जरूरी हो जाता है.

BJP ने महिलाओं की सुरक्षा में नाकामी को उजागर किया
और आखिर में, BJP ने 2024 के आरजी कर रेप केस और हिंसा की दूसरी रिपोर्ट की गई घटनाओं का हवाला देते हुए महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को सबसे आगे ला खड़ा किया. इस तरह के संदेशों से जो कहानी सामने आती है, वह साफ है- विपक्षी दल ही असल में सुरक्षा का प्रतीक है. महिलाओं की सुरक्षा, कानून की सुरक्षा, और उस सार्वजनिक व्यवस्था की सुरक्षा जो इस समय डांवाडोल सी लग रही है.
TMC पर मोदी का हमला: 'महा जंगल राज' को बढ़ावा देने का आरोप
सबसे बढ़कर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बयानबाजी, जिसमें उन्होंने 'तृणमूल के 15 साल के शासन वाले बंगाल को "महा जंगल राज" करार दिया' का मकसद शासन-प्रशासन को ही नैतिक रूप से कटघरे में खड़ा करना था. जंगल, सभ्यता का ठीक उल्टा होता है. इसका मतलब है कि जfम्मेदारी का पूरी तरह से खत्म हो जाना. अगर TMC 'जंगल' है, तो फिर जनता को 'अनुशासन' की चाह होनी ही चाहिए, और इस अनुशासन का वादा 'हिंदुत्व' के रंग में रंगे एक मजबूत एकजुटता के जरिए किया जा रहा है.
तो इस तरह, दोनों ही पक्षों ने एक जैसा ही दांव खेला. राजनीतिक सवालों को नैतिक पहचानों में बदल दिया. TMC ने कहा- बंगाल का असली दिल है- महिलाओं की भलाई, मुसलमानों की सुरक्षा, वोट देने के अधिकारों में संवैधानिक निष्पक्षता, और बाहरी लोगों के मुकाबले बंगाली संस्कृति की रक्षा करना. वहीं BJP ने कहा- देश का असली केंद्र है- हिंदुओं की एकता, सीमाओं की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था के जरिए महिलाओं की सुरक्षा, और पूरी तरह से कायापलट करके बंगाल को फिर से उसका पुराना गौरव दिलाना.

इस बार 92% मतदान
इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों ने इतनी तीव्रता से भाग लिया कि यह आम चुनाव प्रचार से कहीं बढ़कर था. चुनाव में अभूतपूर्व 92 प्रतिशत मतदान हुआ. यह आंकड़ा न केवल प्रशासनिक भागीदारी बल्कि भावनात्मक तत्परता को भी दर्शाता है. लोगों ने सिर्फ वोट नहीं डाला, बल्कि अपना नाम दर्ज कराया. उन्होंने अपनी पहचान को अपना भाग्य मान लिया.
फिर 4 मई को मतगणना होगी. चुनाव रिपोर्टिंग के लिहाज से, जनादेश से पता चलेगा कि कौन सा नारा जीता: टीएमसी का बांग्ला नारा या भाजपा का हिंदुत्व नारा? लेकिन इससे भी गहरे अर्थों में, मतगणना से पता चलेगा कि बंगाल ने खुद को किस नजरिए से देखने का फैसला किया है.
क्या बंगाली पहचान को मुख्य रूप से एक जीवंत नागरिक घर के रूप में परिभाषित किया जाता रहेगा- भाषा, कल्याण और गिनती का अधिकार? या इसे हिंदुत्व के पुराने राष्ट्रीय स्वरूप के माध्यम से फिर से परिभाषित किया जाएगा- धार्मिक-सांस्कृतिक चिह्नों के माध्यम से एकता, खतरे के डर और पुनर्स्थापना के वादे से मजबूत? दोनों पक्ष अपनेपन का दावा कर रहे हैं; दोनों पक्ष इस बात पर जaर दे रहे हैं कि उनका अपना नाता सच्चा है.
घर जैसा महसूस करने के दो अलग-अलग तरीकों के बीच संघर्ष
और शायद इस समय को समझने का सबसे अच्छा तरीका यही है. इसे दो पार्टियों के बीच संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि घर जैसा महसूस करने के दो अलग-अलग तरीकों के बीच संघर्ष के रूप में देखना. एक तरीका कहता है कि घर प्रांत की भाषा, उसकी महिलाओं का जीवन और तनावग्रस्त स्थानीय गरिमा है. दूसरा तरीका कहता है कि घर राष्ट्र की आध्यात्मिक सीमा है, जिसकी रक्षा सामूहिक एकजुटता और वैध माने जाने वाले लोगों के पुनर्मूल्यांकन के माध्यम से की जाती है.
4 मई को, आंकड़े कहानियां बन जाएंगे. फिर कहानियां सबक बन जाएंगी. और यह सबक चाहे इसका परिणाम "बांग्ला की जीत" हो या "हिंदुत्व की जीत" इस बारे में होगा कि आधुनिक मतदाता कितनी जल्दी पहचान को भाग्य में बदल देते हैं.
(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)
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