NDTV वर्ल्ड 27 अगस्त को काठमांडू में भारत-नेपाल की कई बड़ी हस्तियों को एक मंच पर लाने जा रहा है. इस कार्यक्रम का नाम है, 'एनडीटीवी अन्वीक्षा: आइडियाज अक्रॉस बॉर्डर्स'. यह एनडीटीवी की वैश्विक बातचीत की नई सीरीज है. इसमें हम एक-एक कर दुनिया भर में जाएंगे. इस दौरान हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि ये देश खुद को, अपने पड़ोसी देशों और बदलती दुनिया को किस नजर से देखते हैं. इस सीरिज का पहला पड़ाव नेपाल होगा. भारत-नेपाल डॉयलॉग में दोनों देशों के नेता, अधिकारी, डिप्लोमेट, कारोबारी, रणनीतिक विशेषज्ञ और कला-संस्कृति व खेल जगत की हस्तियां शामिल होंगी. इस बातचीत में नेपाल की बदलती राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के साथ भारत के साथ उसके रिश्तों और क्षेत्र में उसकी भूमिका पर भी चर्चा होगी. इसी क्रम में भारत-नेपाल संबंधों की ऐतिहासिकता और चुनौतियों पर आधारित यह लेख हम प्रकाशित कर रहे हैं.
काठमांडू में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. बेंगलुरु में रैप के अपने शब्दों को निखारा. फिर अपने ही शहर का कचरा साफ करके ऐसी राजनीतिक पहचान बनाई कि राष्ट्रीय राजनीति के सबसे बड़े मंच तक पहुंच गए. यह किसी फिल्म की कहानी नहीं है. यह कहानी है बालेंद्र शाह की, जिन्हें नेपाल में प्यार से बालेन कहा जाता है. 36 साल की उम्र में नेपाल के प्रधानमंत्री बनने वाले बालेन एक ऐसे राजनीतिक बदलाव का चेहरा हैं, जो केवल एक नेता या एक चुनाव तक सीमित नहीं है. नेपाल की नई पीढ़ी पुरानी राजनीतिक व्यवस्था से अलग अपेक्षाएं रखती है. वह बेहतर शासन, तेज विकास, राष्ट्रीय सम्मान और दुनिया के सामने अधिक स्वतंत्र पहचान चाहती है.
यहीं से भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल शुरू होता है. बदलते नेपाल को भारत किस नजर से देखे?
भारत का केवल पड़ोसी भर नहीं है नेपाल
नेपाल भारत का कोई सामान्य पड़ोसी नहीं है. दोनों देशों के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जो उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम से जुड़ती है. लेकिन भारत-नेपाल संबंधों को केवल सरकारी समझौतों और विदेश मंत्रालयों की भाषा में नहीं समझा जा सकता. सीमा के दोनों ओर लाखों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है. नेपाली छात्र भारत में पढ़ते हैं, यहां काम करते हैं. भारतीय व्यापारी नेपाल से कारोबार करते हैं. परिवार और रिश्तेदारियां सीमा के दोनों ओर फैली हैं. तीर्थयात्रा, रोजगार, शिक्षा और व्यापार ने दोनों समाजों को ऐसी असाधारण सामाजिक निकटता में बांधा है, जिसे सामान्य अंतरराष्ट्रीय संबंधों के ढांचे में पूरी तरह नहीं समझा जा सकता. यही इस रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत है और कभी-कभी इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी.
भारत-नेपाल संबंध कई बार कुछ-कुछ सास-बहू के रिश्ते जैसे लगते हैं. दोनों एक-दूसरे से बहुत दूर नहीं हो सकते, लेकिन निकटता इतनी अधिक है कि छोटी-छोटी बातों पर नाराजगी भी बड़ी हो जाती है. फर्क केवल इतना है कि यहां दो परिवार नहीं, बल्कि दो संप्रभु देश हैं. इसलिए असहमति जब राजनीतिक बयानबाजी में बदलती है तो उसका असर सीमा के दोनों ओर दिखाई देता है. इस रिश्ते को इस चक्र से बाहर निकलना होगा.
नेपाल की घरेलू राजनीति में सीमा का प्रश्न लंबे समय से संवेदनशील रहा है. कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दावे हैं, जिनकी जड़ें 1816 की सुगौली संधि की अलग-अलग व्याख्याओं में हैं. भारत का रुख स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों पर उसका प्रशासनिक नियंत्रण दशकों पुराना है और सीमा से जुड़े मतभेदों का समाधान दोनों देशों को द्विपक्षीय बातचीत से करना चाहिए.

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हाल में नेपाल के नए 100 रुपये के नोट ने इसी पुराने विवाद को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया. इस नोट पर नेपाल ने अपने उस मानचित्र को शामिल किया है, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने हिस्से के रूप में दिखाया गया है. भारत ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया है और इन क्षेत्रों पर अपनी स्थिति स्पष्ट रखी है. यह केवल एक नोट या नक्शे का विवाद नहीं है. यह बताता है कि सीमा का प्रश्न नेपाल की घरेलू राजनीति और राष्ट्रीय चेतना में कितनी गहराई से मौजूद है. भारत के लिए इसलिए जरूरी है कि वह अपनी स्थिति को पूरी दृढ़ता से बनाए रखे, लेकिन संवाद के रास्ते भी खुले रखे.
किधर झुका हुआ है नेपाल
जब भी सीमा विवाद काठमांडू की राजनीति में उभरता है, नई दिल्ली में नेपाल के चीन की ओर झुकने की चर्चा तेज हो जाती है. सवाल उठता है कि क्या भारत अपने सबसे करीबी पड़ोसी को चीन के प्रभाव में जाने दे रहा है? लेकिन शायद यहीं एक नए नजरिए की जरूरत है. नेपाल को हर बार केवल भारत और चीन के बीच की प्रतिस्पर्धा के चश्मे से देखना एक कूटनीतिक सीमा है. 2008 में जब नेपाल के पहले माओवादी प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल प्रचंड बीजिंग गए थे, तब भी यह आशंका पैदा हुई थी कि नेपाल अब स्थायी रूप से चीन की ओर झुक जाएगा. लेकिन नेपाल की राजनीति बदली और वे आशंकाएं भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ गईं. नेपाल की विदेश नीति किसी एक दिशा में हमेशा के लिए स्थिर नहीं रहती. नेपाल अपनी संप्रभुता को लेकर सजग है. वह किसी एक शक्ति के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय व्यापक और संतुलित संबंध चाहता है. भारत और चीन, दोनों उसके पड़ोसी हैं. इसलिए दोनों के साथ संबंध बनाए रखना नेपाल की भौगोलिक और राजनीतिक वास्तविकता है.
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाल के चीन से संबंधों को हर बार भारत के लिए नुकसान के रूप में देखने की जरूरत नहीं है. आत्मविश्वासी भारत को अपने सबसे करीबी पड़ोसी से यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह किसी दूसरे देश से संबंध न रखे. भारत की असली चुनौती और ताकत इस बात में है कि नेपाल के आम नागरिक के लिए भारत के साथ साझेदारी कितनी भरोसेमंद, उपयोगी और लाभकारी साबित होती है. भारत-नेपाल संबंधों का भविष्य चिंता की प्रतिस्पर्धा से नहीं, काम की प्रतिस्पर्धा से तय होगा.
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इस मोर्चे पर हाल के दिनों में कुछ महत्वपूर्ण प्रगति दिखाई भी दे रही है. भारत और नेपाल के बीच सीमा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के प्रयास तेज हुए हैं. संवेदनशील स्थानों पर आधुनिक निगरानी व्यवस्था, सीमा स्तंभों के रखरखाव, अतिक्रमण से जुड़े प्रश्नों और इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट के बेहतर इस्तेमाल पर दोनों देशों के बीच लगातार बातचीत हो रही है. भारत-नेपाल सीमा को बंद कर देना न तो संभव है और न ही आवश्यक. जरूरत इसे बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की है. तस्करी, मानव तस्करी और अपराध जैसी चुनौतियों से निपटते हुए परिवारों, व्यापारियों और आम लोगों की वैध आवाजाही को सहज बनाए रखना होगा.
कनेक्टिविटी के क्षेत्र में भी बदलाव अब जमीन पर दिखाई देने लगा है. जुलाई के अंतिम सप्ताह में भारत की पहली सीधी वाणिज्यिक कंटेनर मालगाड़ी कोलकाता बंदरगाह से बिराटनगर पहुंची. 40 डिब्बों में माल पहुंचा और सीमा पर उसे दूसरी व्यवस्था में स्थानांतरित करने की जरूरत नहीं पड़ी. यह छोटी खबर लग सकती है, लेकिन बड़े बदलाव का प्रतीक है.
कैसे मजबूत हुए हैं भारत-नेपाल संबंध
भारत और नेपाल के बीच संपर्क केवल बैठकों और समझौतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. वह रेल की पटरियों पर दिखना चाहिए, सड़कों पर दिखाई देना चाहिए और सीमा पार व्यापार करने वाले लोगों के जीवन में महसूस होना चाहिए. डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भी नई संभावनाएं खुल रही हैं. भारत की यूपीआई और नेपाल की भुगतान व्यवस्था के बीच संपर्क से दोनों देशों के लोगों और व्यापारियों के लिए लेन-देन को आसान बनाने का रास्ता खुला है. ऐसी सुविधाएं शायद कूटनीति की सबसे बड़ी सुर्खियां न बनें, लेकिन लंबे समय तक रिश्तों को मजबूत करने का काम अक्सर यही करती हैं.
इतिहास हमें जोड़ता है, लेकिन आधुनिक रिश्ते केवल इतिहास के भरोसे नहीं चलते. उन्हें समय पर बने पुल, चलती रेल, भरोसेमंद बिजली, आसान व्यापार और लगातार संवाद चाहिए. ऊर्जा सहयोग इस रिश्ते को नई दिशा देने की सबसे बड़ी संभावना रखता है. भारत और नेपाल ने दीर्घकालिक बिजली सहयोग को आगे बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है, जिसके तहत अगले दशक में नेपाल से भारत को 10 हजार मेगावाट तक बिजली निर्यात करने की योजना है. 900 मेगावाट की अरुण-3 परियोजना इस साझेदारी का महत्वपूर्ण उदाहरण है. नेपाल के पास विशाल जलविद्युत क्षमता है. भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की ऊर्जा जरूरतें भी बढ़ रही हैं. यदि दोनों देश इस अवसर का सही उपयोग करते हैं, तो बिजली केवल व्यापार की वस्तु नहीं रहेगी. वह दोनों देशों को आर्थिक रूप से और गहराई से जोड़ सकती है.
लेकिन किसी भी मजबूत रिश्ते की असली परीक्षा केवल उसकी उपलब्धियां नहीं होतीं. उसकी परीक्षा इस बात में भी होती है कि वह अपने मतभेदों और अधूरे सवालों से कैसे निपटता है. नेपाल में 1950 की संधि को लेकर बहस होती रही है. एमिनेंट पर्सन्स ग्रुप की रिपोर्ट का प्रश्न भी समय-समय पर उठता है. व्यापार असंतुलन को लेकर नेपाल में चिंता व्यक्त की जाती है. कोसी, गंडक और महाकाली नदियों से जुड़े प्रश्न और पंचेश्वर जैसी बड़ी परियोजनाओं में देरी भी वहां असंतोष पैदा करती रही है. इन चिंताओं को नजरअंदाज करना समझदारी नहीं होगी. लेकिन इन्हें भारत-नेपाल संबंधों की पूरी कहानी मान लेना भी गलत होगा.

संबंधों में विश्वास बहाली के उपाय
इतने करीबी संबंधों में उम्मीदें भी बड़ी होती हैं. इसलिए कभी-कभी छोटे मतभेद भी जरूरत से ज्यादा बड़े दिखाई देने लगते हैं. भारत और नेपाल के रिश्तों को अगले चरण में ले जाने के लिए केवल नए समझौते पर्याप्त नहीं होंगे. जरूरी है कि परियोजनाएं समय पर पूरी हों, संवाद लगातार बना रहे और दोनों देश एक-दूसरे की चिंताओं को गंभीरता से सुनें. छोटी समस्याओं का समाधान समय पर हो जाए तो वे बड़े राजनीतिक विवादों में बदलने से बच सकती हैं.
एक और पुराना रिश्ता आज विशेष ध्यान मांगता है. अग्निपथ योजना लागू होने के बाद भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती का प्रश्न अटका हुआ है. यह केवल भर्ती का मामला नहीं है. गोरखा सैनिकों की परंपरा भारत और नेपाल के साझा इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है. पीढ़ियों से नेपाली परिवारों ने भारतीय सेना के साथ एक गहरा रिश्ता बनाया है. यह संबंध रोजगार, परिवार, पहचान और विश्वास से जुड़ा हुआ है. इतनी पुरानी और महत्वपूर्ण सैन्य परंपरा को नई नीतियों और पुरानी व्यवस्थाओं के बीच उलझा रहने देना किसी के हित में नहीं होगा. दोनों देशों को मिलकर ऐसा समाधान खोजना चाहिए, जो इस ऐतिहासिक परंपरा का सम्मान करे और आज की नीतिगत जरूरतों के अनुरूप भी हो.
काठमांडू में सरकारें बदलती रहेंगी. भारत-नेपाल संबंधों में मतभेद भी आते रहेंगे. कभी नेपाल में भारत को लेकर आलोचना होगी और कभी नई दिल्ली में नेपाल की विदेश नीति को लेकर चिंता व्यक्त की जाएगी. लेकिन इतने गहरे संबंधों को किसी एक सरकार, किसी एक नेता या किसी एक विदेश दौरे के आधार पर नहीं मापा जा सकता. अब जरूरत यह है कि हर नई सड़क, हर रेल लाइन, बिजली का हर तार और हर डिजिटल संपर्क इस रिश्ते को नई पीढ़ी के सामने फिर से साबित करे.
नए नेपाल के साथ कैसे बेहतर हो संबंध
बालेन शाह ने काठमांडू का कचरा साफ करके अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी. अब उनके सामने नेपाल की राजनीति और विदेश नीति की पुरानी उलझनों को संभालने की चुनौती है. भारत के सामने चुनौती अलग है, लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है. भारत को अपने सबसे करीबी पड़ोसी के साथ ऐसा संबंध बनाना है जिसमें इतिहास का सम्मान हो, लेकिन भविष्य की तैयारी भी हो; संप्रभुता का सम्मान हो, लेकिन साझेदारी भी मजबूत हो; और मतभेद हों तो बातचीत का रास्ता कभी बंद न हो.
भारत और नेपाल की असाधारण सामाजिक निकटता उनकी साझा ताकत है. लेकिन भरोसा विरासत में मिलने के बाद भी हर पीढ़ी को नया बनाना पड़ता है. भारत और नेपाल के रिश्ते का भविष्य केवल हिमालय की ऊंचाइयों में तय नहीं होगा. वह उन सड़कों पर तय होगा जिन्हें दोनों देश मिलकर बनाएंगे, उन रेल पटरियों पर जिन पर व्यापार चलेगा, उन बिजली लाइनों में जो घरों और उद्योगों को ऊर्जा देंगी और उस भरोसे में जो हर नई पीढ़ी को इस रिश्ते से जोड़ेगा.
पुरानी निकटता को नई जरूरतों के साथ जोड़ना ही अब दोनों देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है और शायद सबसे बड़ा अवसर भी. क्योंकि भारत और नेपाल के रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि वे सदियों से करीब रहे हैं. सबसे बड़ी ताकत यह होगी कि बदलती दुनिया में भी वे एक-दूसरे के लिए कितने उपयोगी, कितने भरोसेमंद और कितने जरूरी बने रहते हैं.
नेपाल बदल रहा है. उम्मीद है कि भारत और नेपाल मिलकर एक अर्थपूर्ण और समृद्ध भविष्य रचेंगे.
(डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ से पीएचडी और एमफिल हैं. इस समय वो एमिटी यूनिवर्सिटी के नोएडा कैंपस के एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल) हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)