हाल ही में यह खबर सामने आई कि सिनेमा टिकट पर करीब 570 प्रतिशत के आसपास टैक्स बढ़ सकता है. इस खबर ने सिनेमा जगत में हलचल मचा दी है, क्योंकि कोविड के बाद से फिल्म निर्माता और सिनेमाघर मालिक उस दौरान हुए नुकसान से अब तक पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं. ऐसे में टैक्स बढ़ोतरी की खबर सिनेमा जगत के लिए एक और बड़ा झटका मानी जा रही है. सिनेमाघरों में दर्शकों की तादाद पिछले दशक के मुकाबले काफी कम हुई है और फिल्म निर्माताओं से लेकर सिनेमाघर मालिकों तक के सामने सबसे बड़ी चिंता यही है कि दर्शकों को दोबारा थिएटर तक कैसे खींचकर लाया जाए. इसी मुद्दे पर सिनेपोलिस इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MAI) के सदस्य देवांग संपत ने बात की.
देवांग संपत ने बताया कि सरकार की ओर से इस प्रस्ताव को लेकर अभी तक उन्हें कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है और उन्हें इसकी जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए मिली है. उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री सरकार के सामने अपनी बात रखते हुए मुख्य रूप से तीन मुद्दे उठाएगी.
उन्होंने कहा, “हम जो सरकार के पास अपनी बात लेकर जा रहे हैं, उसमें हमारे तीन मुख्य पॉइंट हैं. पहला यह है कि हम सभी ‘वन नेशन, वन टैक्स' की बात करते हैं. अलग-अलग तरह के टैक्स लगाने से ‘वन नेशन, वन टैक्स' का उद्देश्य ही कमजोर होता है. दूसरा मुद्दा यह है कि इससे भारत में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस भी प्रभावित हो सकता है, क्योंकि टैक्स का स्ट्रक्चर और जटिल हो जाएगा.”
देवांग संपत ने टिकट की कीमतों को लेकर दर्शकों की संवेदनशीलता पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा, “सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में टिकट की कीमत काफी संवेदनशील है. हमने अपनी रिसर्च में देखा है कि अगर औसत टिकट कीमत सिर्फ तीन-चार रुपये भी बढ़ती है, तो फुटफॉल कम हो जाता है.”
उन्होंने कहा कि अगर टिकट की कीमत बढ़ने से दर्शकों की संख्या कम होती है तो इसका असर सिर्फ सिनेमाघरों पर नहीं, बल्कि सरकार के राजस्व पर भी पड़ेगा. देवांग ने कहा, “हम जो टिकट प्राइस कलेक्ट करते हैं, उसमें राज्य और केंद्र सरकार को टैक्स का योगदान पहले से जा रहा है. लेकिन अगर टिकट की कीमत बढ़ने से कंज्यूमर बिहेवियर बदल गया और फुटफॉल कम हो गया, तो इसका असर अंततः सरकार के रेवेन्यू पर भी पड़ेगा.”
उन्होंने आगे कहा, “फुटफॉल कम होगा तो सरकार प्रभावित होगी, सिनेमा ऑपरेटर प्रभावित होगा और फिल्म मेकर्स भी प्रभावित होंगे.”
कोविड के बाद सिनेमाघरों में दर्शकों की वापसी अब भी एक बड़ी चुनौती है. देवांग संपत के मुताबिक, महामारी से पहले जिस स्तर पर दर्शक सिनेमाघरों में आते थे, उस स्तर तक अभी वापसी नहीं हुई है. उन्होंने कहा, “कोविड के बाद अभी तक सिनेमाघरों में फुटफॉल उस स्तर तक रिकवर नहीं हुआ है, जहां कोविड से पहले था. हम अलग-अलग ऑफर्स और दूसरे तरीकों के जरिए दर्शकों के बिहेवियर को बदलने और उन्हें दोबारा सिनेमाघरों तक लाने की कोशिश कर रहे हैं.”
मुंबई को लेकर उन्होंने कहा कि यह शहर सिर्फ एक बड़ा फिल्म मार्केट नहीं बल्कि बॉलीवुड का गढ़ है, इसलिए यहां लिया गया कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला दूसरे राज्यों पर भी असर डाल सकता है. उन्होंने कहा, “मुंबई जैसी सिटी, जो बॉलीवुड का गढ़ है, अगर यहां इस तरह का कोई कदम लिया जाता है तो उसका रिपल इफेक्ट दूसरे राज्यों में भी देखने को मिल सकता है.”
देवांग संपत ने भारत में स्क्रीन की कम संख्या का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा, “भारत में अभी भी स्क्रीन डेंसिटी कम है. हमें और स्क्रीन बढ़ानी चाहिए, मनोरंजन और कल्चर को प्रमोट करना चाहिए. अगर नीतियां निवेश के अनुकूल नहीं होंगी तो लोग आगे निवेश नहीं करेंगे और लोग सिनेमा से दूर होते जाएंगे.”
सरकार की ओर से टैक्स बढ़ाने की जरूरत को लेकर उन्होंने सीधे तौर पर टिप्पणी करने से इनकार किया, लेकिन कहा कि उनकी मांग साफ है कि जो भी नीति बनाई जाए, वह ‘वन नेशन, वन टैक्स' की भावना के अनुरूप हो. उन्होंने कहा, “सरकार को शहर और राज्य कैसे चलाना है, यह उनका विषय है. वे क्यों टैक्स बढ़ाना चाहते हैं और किस तरह बढ़ाना चाहते हैं, वे इसके सबसे अच्छे जज हैं. लेकिन हमारी मांग यही रहेगी कि जो भी किया जाए, ‘वन नेशन, वन टैक्स' को फॉलो किया जाए.”
देवांग संपत ने यह भी कहा कि जब भी सरकार ने सिनेमा क्षेत्र को सपोर्ट किया है, उसका फायदा पूरे इकोसिस्टम को मिला है. उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत को भी स्क्रीन बढ़ाने और निवेश को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों की जरूरत है.
उन्होंने कहा, “अगर आप चीन का उदाहरण देखें तो वहां स्क्रीन की संख्या में बहुत बड़ी बढ़ोतरी हुई है. भारत में अभी भी हमारे पास करीब 10 हजार स्क्रीन हैं. दूसरी तरफ सिंगल स्क्रीन लगातार बंद हो रहे हैं. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि अभी हमारे पास उतनी फ्रेंडली सरकारी पॉलिसीज नहीं हैं, जो सिनेमा में नए निवेश को प्रोत्साहित करें.”
फिल्म निर्माताओं पर पड़ने वाले असर को लेकर उन्होंने कहा कि टैक्स बढ़ने का प्रभाव पूरे फिल्म कारोबार पर पड़ेगा. उनके मुताबिक, “सिनेमाघर सिर्फ कलेक्टिंग एजेंट है. बॉक्स ऑफिस से जो रकम आती है, वह कई स्टेकहोल्डर्स के बीच जाती है. इसलिए इसका असर फिल्म प्रोड्यूसर, सिनेमा ऑपरेटर, मॉल ओनर और सरकार सभी पर पड़ेगा.”
छोटे बजट की फिल्मों को लेकर देवांग ने खास चिंता जताई. उन्होंने कहा, “अगर छोटी फिल्मों में दर्शक नहीं आ रहे हैं और हमें शो पर टैक्स देना है, तो आखिरकार हमें उन फिल्मों के शो भी कम करने पड़ेंगे. इसलिए कोई भी अतिरिक्त टैक्स किसी भी स्टेकहोल्डर के लिए फ्रेंडली कदम नहीं है.”
विदेशों में सिनेमा कारोबार को बढ़ावा देने वाली नीतियों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारत को भी इसी दिशा में सोचना चाहिए. उन्होंने कहा, “कई विकासशील देशों में स्क्रीन डेंसिटी बढ़ाने के लिए टैक्स हॉलिडे, टैक्स रिबेट और निवेश के लिए सरकारी जमीन उपलब्ध कराने जैसी फ्रेंडली पॉलिसीज हैं. भारत में भी सिनेमा बिजनेस को एक्सपैंड करने के लिए ऐसी नीतियां लाई जा सकती हैं.”
देवांग संपत के मुताबिक, अतिरिक्त टैक्स लगाने के बजाय सरकार को ऐसी नीतियां बनाने पर ध्यान देना चाहिए जो सिनेमाघरों में निवेश बढ़ाएं और दर्शकों को थिएटर तक वापस लाने में मदद करें. उन्होंने कहा, “भारत को इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि मनोरंजन और सिनेमा को कैसे प्रोत्साहित किया जाए. ऐसी नीतियां लाना और उन्हें लागू करना जरूरी है, बजाय इसके कि कोई और अतिरिक्त टैक्स लगाया जाए.”
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