Norway vs India education: बचपन की असल पहचान क्या है? क्या बचपन सिर्फ किताबों और भारी भरकम स्कूल बैग में सिमटा होना चाहिए या फिर मिट्टी, पेड़-पौधों और खुले आसमान के नीचे खिलना चाहिए. सोशल मीडिया पर इन दिनों इन्हीं सवालों को लेकर एक वायरल पोस्ट ने लोगों के बीच बहस छेड़ दी है. दरअसल, नॉर्वे में रह चुके एक भारतीय युवक ने वहां के बच्चों की परवरिश और भारत की शिक्षा व्यवस्था की तुलना करते हुए इंटरनेट पर अपना एक्सपीरियंस शेयर किया है, वो लोगों के दिलों को छू रहा है.
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नॉर्वे में कैसे सीखते हैं बच्चे (Nature based learning in Norway)
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर नॉर्वे में रह चुके एक भारतीय नागरिक विनोद ने लिखा है कि, वहां रहने के दौरान उनकी बच्चों को लेकर सोच काफी हद तक बदल गई. उनके मुताबिक, उन्होंने वहां के किंडरगार्टन का जो हाल देखा, वो भारत की मौजूदा स्थिति से बिल्कुल उलट है. उनका कहना है कि, किंडरगार्टन का मकसद बच्चों को किताबों में आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मविश्वासी और स्वतंत्र बनाना होता है. वहीं नॉर्वे में पढ़ाई का मतलब रटना नहीं है. वहां बच्चे बारिश और कड़ाके की ठंड में भी जंगलों और पहाड़ों के बीच अपना समय बिताते हैं. उन्हें पत्थरों पर चढ़ना, आपस में एक-दूसरे से मिल-जुल कर रहना और प्रकृति को रिस्पेक्ट देना सीखाया जाता है.
Living in Norway 🇳🇴 has quietly changed the way I think about children and their wellbeing.
— Vinod (@turiyatman) July 13, 2026
In Norway, kindergarten isn't seen as a place to get ahead academically. It's where children learn to become… children.
They spend hours outdoors in every season - through snow,…
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भारत की भागदौड़ और बच्चों पर पढ़ाई का प्रेशर (Academic pressure on kids in India)
विनोद के मुताबिक, भारत लौटने के बाद उन्होंने देखा कि महज तीन साल का बच्चा भी यहां कंधों पर भारी-भरकम स्कूल बैग टांगे हुए है. वे एक-एक शब्द लिखने से लेकर गिनती याद करने और वर्कशीट तैयार करने की दौड़ में रहते हैं. खिलखिलाकर हंसना भी भूल रहे हैं. उनका बचपन सिर्फ अगली क्लास की तैयारी पूरी करने में निकल जाता है, जबकि नॉर्वे में बच्चों को किताबी कीड़ा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और कुछ नया सीखने पर जोर देता है. विनोद का कहना है कि, आजकल के बच्चों का बचपन सिर्फ स्क्रीन और पढ़ाई के बीच सिमटता जा रहा है. माता-पिता को ये समझना चाहिए कि, उनका बचपन कीमती है. प्रेशर से ज्यादा सीखने पर जोर दिया जा सकता है.
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सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस (social media viral)
वायरल हो रही विनोद की इस पोस्ट पर यूजर्स तरह-तरह के रिएक्शन दे रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, 'बचपन में खेल, प्रकृति, जिज्ञासा और भावनात्मक विकास उतना ही जरूरी है, जितनी पढ़ाई.' वहीं कुछ लोगों का मानना है कि, 'इसकी जिम्मेदारी सिर्फ स्कूलों की नहीं, बल्कि माता-पिता की भी है.' एक अन्य यूजर ने लिखा कि, 'आज के बच्चों का बचपन मोबाइल फोन, स्क्रीन और सोशल मीडिया के बीच सिमटता जा रहा है, जबकि पहले की पीढ़ियां घंटों बाहर खेलती थीं.'
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(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)
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