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14 साल पहले जहां हुई थी बेटे की हत्या, पिता ने वहीं किया सुसाइड; परिजन बोले- न्याय नहीं मिलने से थे परेशान

14 साल तक बेटे के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने वाले पिता के सुसाइड की खबर ने एक बार फिर 2012 के थानगढ़ पुलिस फायरिंग केस को चर्चा में ला दिया है. अब सवाल यही है कि इस मामले में न्याय कब मिलेगा? पढ़ें रावल राजेशकुमार माधवलाल की रिपोर्ट.

14 साल पहले जहां हुई थी बेटे की हत्या, पिता ने वहीं किया सुसाइड; परिजन बोले- न्याय नहीं मिलने से थे परेशान
थानगढ़ फायरिंग केस: बेटे को इंसाफ दिलाते-दिलाते हारा पिता, 14 साल बाद उसी जगह दी जान
NDTV Reporter

Gujarat News: गुजरात के सुरेंद्रनगर में एक व्यक्ति ने उसी जगह आत्महत्या कर ली, जहां 14 साल पहले उसके बेटे की हत्या हुई थी. 53 साल का शख्स, पुलिस फायरिंग में मारे गए अपने 16 साल के बेटे को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहा था. साल 2012 में हुई इस वारदात की जांच के लिए SIT का गठन किया था, लेकिन जांच पूरी होने के 14 साल बाद भी रिपोर्ट पब्लिक नहीं की गई, ना ही किसी दोषी को सजा मिली, जिससे वो काफी हताश थे.

'रक्षा बंधन पर बेटियों को रोते देख टूटी हिम्मत'

परिजनों के मुताबिक, इस रक्षा बंधन जब बेटियों को अपने मृतक भाई की याद में रोते देखा तो पिता अमरशीभाई सुमरा की हिम्मत टूट गई और उन्होंने रात के अंधेरे में बेटे के स्मारक के पास जाकर हापा से मुंबई जा रही ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली. थानगढ़ पुलिस फायरिंग केस से जुड़ी इस घटना की जानकारी मिलते ही रेलवे पुलिस मौके पर पहुंच गई और शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी.

क्या था 2012 का थानगढ़ पुलिस फायरिंग कांड?

बताते चलें कि सितंबर 2012 में थानगढ़ के मशहूर तरणेतर मेले के दौरान दलित और भरवाड़ समाज के लोगों के बीच बड़ा विवाद हुआ था, जिसके बाद बिगड़े हालातों को काबू करने के नाम पर पुलिस ने लोगों पर गोलियां चलाई थीं. इस फायरिंग में अमरशीभाई के 16 वर्षीय बेटे पंकज सुमरा, मेहुल राठौड़ और प्रकाश परमार नाम के तीन दलित युवकों की जान चली गई थी. इस घटना के बाद पूरे गुजरात में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठे थे.

SIT की रिपोर्ट आज भी फाइलों में दफ्न, न्याय का इंतजार

उस वक्त इस केस ने काफी तूल पकड़ा था, जिसके चलते तत्कालीन राज्य सरकार ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन किया था. SIT ने थानगढ़ पहुंचकर घटनास्थल, मेले के मैदान और रेलवे फाटक का बारीकी से निरीक्षण किया था. किस स्थान से फायरिंग हुई और उसकी दूरी कितनी थी, इसका मेजरमेंट लेकर पूरी वीडियोग्राफी भी कराई गई थी. हालांकि, 14 साल लंबा अरसा बीत जाने के बावजूद न तो पीड़ित परिवारों को इंसाफ मिला और न ही SIT की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई. इसी से निराश होकर अमरीशभाई ने आत्महत्या कर ली.

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