- ट्रंप ने 2026 के अंत तक इजरायल को दी जाने वाली चार अरब डॉलर की फंडिंग बंद करने की बात कही है
- 1960 में अमेरिकी अधिकारियों ने डिमोना परमाणु सुविधा के निर्माण को टेक्सटाइल फैक्ट्री बताकर छुपाने की कोशिश की
- अमेरिका और इजरायल ने पिछले साठ वर्षों से इजरायल के परमाणु हथियारों को आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया है
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में कहा कि 2026 के अंत तक इजरायल को दी जाने वाली 4 अरब डॉलर की अमेरिकी फंडिंग बंद कर दी जाएगी. अब इजरायल को इस फंडिंग की जरूरत नहीं है. इससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या ईरान को काबू करने के लिए ट्रंप अब इजरायल को कंट्रोल करने जा रहे हैं.
कहानी शुरू होती है 1960 से
1960 की शुरुआत में, अमेरिकी राजनयिकों का एक समूह एक इजरायली हेलीकॉप्टर में सवार था. तभी उनमें से एक की नजर नेगेव रेगिस्तान में, डेड सी से लगभग 20 मील पश्चिम की ओर, एक निर्माण स्थल पर पड़ी. अमेरिकी अधिकारी ने उस जगह की ओर इशारा करते हुए, उनके साथ मौजूद इजरायली प्रतिनिधि (वित्त मंत्रालय के एडी कोहेन) से पूछा कि वह क्या हो सकता है?
कोहेन ने अमेरिकियों को बताया कि वह एक "टेक्सटाइल फैक्ट्री" है. इस समूह में इजरायल में अमेरिकी राजदूत ओग्डेन रीड भी शामिल थे. जिस जगह को उस यात्री ने देखा था, वह असल में डिमोना परमाणु सुविधा (न्यूक्लियर फैसिलिटी) का निर्माण कार्य था. आज इसे मध्य पूर्व के एकमात्र परमाणु शस्त्रागार का जन्मस्थान माना जाता है. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा इस निर्माण स्थल की असल सच्चाई का पता लगाने के कुछ महीनों बाद, ओग्डेन ने कोहेन के साथ एक बैठक की मांग की.
नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों (जिनमें हेलीकॉप्टर यात्रा का विवरण भी शामिल है) में से एक गुप्त अमेरिकी राजनयिक टेलीग्राम के अनुसार, "शुरुआत में कोहेन ने इस मामले को हल्के में लिया, लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिला कि वे भी मानते थे कि इस रिएक्टर का इस्तेमाल आगे चलकर हथियारों के लिए किया जा सकता है."
पांच साल बाद, अमेरिकी परमाणु अधिकारियों को पता चला कि पेंसिल्वेनिया के एक यूरेनियम संयंत्र से सैकड़ों पाउंड 'हथियार बनाने लायक' (वेपन्स-ग्रेड) संवर्धित यूरेनियम गायब है. कुछ अमेरिकी खुफिया अधिकारियों का मानना था और हाल ही में आई एक डॉक्यूमेंट्री में भी यही सुझाव दिया गया कि इस यूरेनियम को इजरायली कार्यक्रम में इस्तेमाल करने के लिए भेज दिया गया था.
मगर अब वो बात नहीं रही
पिछले 60 सालों से, अमेरिका और इजरायल ने इस मामले पर चुप्पी साधे रखी है और इजरायल के परमाणु हथियारों के विकास को कभी स्वीकार नहीं किया है. जब भी इजरायल अधिकारी अपने हथियारों की ओर इशारा करना चाहते हैं, तो अमेरिकी राजनयिकों के सामने एडी कोहेन द्वारा दिए गए उस तात्कालिक जवाब का इस्तेमाल एक सांकेतिक भाषा के रूप में किया जाता है. 14 जुलाई को दिए गए अपने एक भाषण में, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने देश के परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रमुख के साथ हुई एक मुलाकात का जिक्र करते हुए उसे "कपड़ा मिल" (टेक्सटाइल फैक्ट्री) में हुई बैठक बताया.
समय के साथ, यह दुनिया का एक ऐसा "खुला राज" बन गया है, जिसे इजरायल-अमेरिकी इतिहासकार एवनर कोहेन ने इसी तरह परिभाषित किया है. लंबे समय से अमेरिका और इजरायल की नीति अस्पष्टता या दुविधा की स्थिति बनाए रखने की है, जिसमें इजरायल के परमाणु हथियारों की ओर इशारा तो किया जाता है, लेकिन कभी भी आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की जाती.
इस नीति ने अमेरिका को अन्य देशों द्वारा परमाणु हथियार विकसित करने के खिलाफ अपना सार्वजनिक रुख बनाए रखने में मदद की है, और इजरायल को इस सवाल से बचने में मदद मिली है कि उसे परमाणु बम कैसे मिला (या क्या उसके पास वास्तव में बम है भी या नहीं).
लेकिन अब यह स्थिति बदल सकती है, क्योंकि इस क्षेत्र के अन्य देश भी अपने परमाणु कार्यक्रमों को आगे बढ़ा रहे हैं. अमेरिका और इजरायल, ईरान के खिलाफ एक तरह की जंग लड़ रहे हैं, जिसका एक मकसद तेहरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है. मगर अमेरिका चाहकर भी अब तक इसमें कामयाबी नहीं हासिल कर सका. बातचीत की मेज पर इजरायल की सैन्य और परमाणु ताकत अक्सर आ जाती है. सऊदी भी इसे उठाता रहता है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या जिस तरीके से अमेरिका में इजरायल विरोधी बयान बढ़ते जा रहे हैं, तो क्या ट्रंप प्रशासन भी अब इजरायल की सैन्य ताकत को कमजोर करने का मन बना रहा है.
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