- चीन ने पिछले दो वर्षों में सैंकड़ों वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को पदों से हटा दिया है, इससे सेना में खालीपन है
- शी जिनपिंग ने पीएलए को 2027 तक ताइवान जीतने का आदेश दिया है, जिससे सैन्य तैयारियों में तेजी लाई जा रही है
- अमेरिका-चीन सैन्य वार्ता लगभग समाप्त हो गई है, जिससे दोनों देशों के बीच संभावित संघर्ष के जोखिम बढ़ गए हैं
पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के कभी सबसे शक्तिशाली वर्दीधारी अधिकारी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भरोसेमंद सलाहकार रहे जनरल झांग यूक्सिया को चीन ने अचानक बर्खास्त किया तो चीन की सेना में उथल-पुथल मच गई है. एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है. बुल्गारिया स्थित मॉडर्न डिप्लोमेसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भ्रष्टाचार की फुसफुसाहट से शुरू हुआ मामला अब एक नए दौर में एंट्री कर गया है. इसके चलते पीएलए के शीर्ष रैंक में खालीपन आ गया है. इससे चीन की युद्ध-तैयारी, उसकी आंतरिक स्थिरता और बीजिंग-वाशिंगटन सैन्य वार्ता के भविष्य पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.
सैंकड़ों अधिकारी हटाए
रिपोर्ट में कहा गया है, “झांग का पतन कोई अलग-थलग घटना नहीं थी. पिछले दो वर्षों में, दर्जनों, संभवतः सैकड़ों वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पदों से हटाया गया है, जिनमें से कई रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों से थे. विश्लेषकों का कहना है कि हटाए गए कमांडरों में से एक बड़ी संख्या चीन के परमाणु बलों, ताइवान के लिए जिम्मेदार पूर्वी थिएटर कमांड और बीजिंग में स्थित एलीट यूनीट्स से थी.”
नेता मौजूद कमांडर गायब
विश्लेषण में इसे संदेह, एकीकरण और अनिश्चितता के मिश्रण के रूप में दर्शाया गया है. इसमें बताया गया है कि सात सदस्यीय केंद्रीय सैन्य आयोग अब राष्ट्रपति और सैन्य अनुशासन तंत्र के प्रमुख झांग शेंगमिन तक ही सीमित रह गया है. प्रकाशन की समाचार संपादक सना खान ने लिखा, "इसका परिणाम एक चौंकाने वाला असंतुलन है: नेता तो बने हुए हैं, जबकि पेशेवर कमांडर लगभग गायब हो गए हैं."
अमेरिका से रिश्ते और कार्रवाई
झांग को जनवरी में पद से हटा दिया गया, अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन द्वारा अगस्त 2024 में बीजिंग में उनसे मुलाकात के एक महीने बाद, जिसे लेखक ने "एक खतरनाक रिश्ते को स्थिर करने" के रूप में बताया.
वॉशिंगटन पीएलए के साथ संपर्क बनाए रखना चाहता था, ताकि गलत अनुमान, हवा या समुद्र में आकस्मिक झड़प, साइबर घटना के बेकाबू होने या मिसाइल परीक्षण को गलत समझने जैसे जोखिमों को कम किया जा सके. रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया, "आज, यह नाजुक प्रयास पतन के कगार पर दिख रहा है."
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि समय बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि शी जिनपिंग ने कथित तौर पर पीएलए को 2027 तक ताइवान को जीतने में सक्षम होने का आदेश दिया है, जिससे 2035 के लिए निर्धारित लक्ष्यों को गति दी जा रही है. इस समय सीमा के नजदीक आने के साथ, यह कार्रवाई शीर्ष स्तर पर गहरी असंतुष्टि और संभवतः अविश्वास का संकेत देती है.
कागजी सेना की स्वीकारोक्ति
चीन के आधिकारिक स्पष्टीकरण भ्रष्टाचार पर जोर देते हैं. अधिकारियों पर रक्षा बजट की लूट और भ्रष्टाचार को फैलने देने का आरोप लगाते हैं. पीएलए के कुछ प्रकाशनों ने तो सेना को "कागजी शेर" तक कह दिया है - बीजिंग द्वारा लंबे समय से आधुनिक और अजेय बताई जाने वाली सेना के लिए यह एक चौंकाने वाली स्वीकारोक्ति है. मतलब खुद चीन की सेना खुद को कागजी मान रही है.
लेखक का मानना है कि या तो शी जिनपिंग का मानना है कि भ्रष्टाचार ने पीएलए को बुरी तरह कमजोर कर दिया है, या बीजिंग जानबूझकर कमजोरी का प्रदर्शन करते हुए गुप्त रूप से अपनी ताकत बनाए हुए है.
विश्लेषण में निष्कर्ष निकाला गया, "दोनों ही व्याख्याओं में जोखिम हैं. अपनी सेना को अविश्वसनीय घोषित करना प्रतिरोध क्षमता को कमजोर करता है. संघर्ष की तैयारी करते हुए सेना को अविश्वसनीय बताकर रखना विनाशकारी गलतियों को न्योता देता है."
दुनिया के लिए खतरा
इस बीच, मिसाइल क्षेत्रों में कुप्रबंधन की खबरों के बीच चीन का परमाणु विस्तार जारी है. चाहे ये खबरें बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई हों या नहीं, ये सैन्य बलों के बीच संदेह और भय को बढ़ावा देती हैं.
खान ने लिखा, "शायद इसका सबसे तात्कालिक परिणाम अमेरिका-चीन सैन्य संबंधों का लगभग खत्म हो जाना है. वरिष्ठ जनरलों से जुड़े संपर्क अब सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गए हैं." उन्होंने आगे कहा, "वाशिंगटन जिन कमांडरों से संपर्क करने की उम्मीद कर रहा था, जिनमें ताइवान और दक्षिण चीन सागर की देखरेख करने वाले भी शामिल हैं, उन्हें भी पद से हटा दिया गया है."
उन्होंने कहा कि अगर पीएलए के भीतर पश्चिम से संवाद को खतरनाक या विश्वासघाती माना जाता है, तो भविष्य में संवाद असंभव हो सकता है. ऐसे में, बातचीत के बजाय खुफिया एजेंसियां ही जानकारी का प्राथमिक स्रोत बन जाएंगी, जो परमाणु हथियारों से लैस शक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता के प्रबंधन के लिए कहीं अधिक कमजोर आधार साबित होंगी.
चुप्पी खतरनाक
ताइवान के लिए, बीजिंग के जनरलों की चुप्पी उनकी धमकियों से कहीं अधिक चिंताजनक हो सकती है. वाशिंगटन के लिए, सैन्य वार्ता के विफल होने का अर्थ है केवल खुफिया जानकारी के माध्यम से प्रतिद्वंद्विता का प्रबंधन करना. शी जिनपिंग के लिए, यह शुद्धिकरण शक्ति और असुरक्षा दोनों का प्रतीक है - एक ऐसा दांव जिसमें वफादारी योग्यता का विकल्प बन जाएगी.
लेख का निष्कर्ष यह था, “सबसे बड़ा खतरा शायद यह नहीं है कि चीन कल युद्ध की तैयारी कर रहा है, बल्कि यह है कि वह एक ऐसे चरण में प्रवेश कर रहा है जहां गलत निर्णय लेना आसान हो जाता है और सुधार करना कठिन. दुनिया के लिए, और विशेष रूप से ताइवान के लिए, बीजिंग के जनरलों की यह चुप्पी उनकी धमकियों से कहीं अधिक चिंताजनक साबित हो सकती है.”
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