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ईरान के टॉप लीडर्स को मारने की अमेरिकी- इजराइली रणनीति बैकफायर कर सकती है- 5 वजहें हैं

US Israel War against Iran: खुद अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस की डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने कहा है कि ईरानी शासन कमजोर हुआ है, लेकिन खत्म नहीं हुआ है. अमेरिकी इंटेलिजेंस के अधिकारियों ने चेतावनी दी कि तेहरान के पास समय के साथ अपनी सैन्य ताकत को फिर से बनाने का इरादा और क्षमता दोनों हैं.

ईरान के टॉप लीडर्स को मारने की अमेरिकी- इजराइली रणनीति बैकफायर कर सकती है- 5 वजहें हैं
Iran Senior Leaders Killed in US Israel Attack: अमेरिका ने ईरान के लगभग सभी टॉप लीडर्स को मौत के घाट उतार दिया है

ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की जंग को शुरू हुए लगभग तीन हफ्ते गुजरने वाले हैं और शांति की उम्मीद दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है. अबतक की जंग में अमेरिका और इजरायल की तरफ से एक रणनीति तो साफ नजर आ रही है- ईरान शासन और उसकी मिलिट्री के टॉप लीडर्स को मौत के घाट उतारना. चाहें जंग के पहले ही दिन सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई को हमले में मार गिराना हो या फिर बैक-टू-बैक दो दिनों में ईरान के सिक्योरिटी चीफ अली लारिजानी और इंटेलिजेंस मिनिस्टर इस्माइल खातिब को मारना हो, ईरान के लगभग सभी बड़े चेहरे को मार गिराया गया है. हालांकि इसके बावजूद ईरान टूटा नहीं है, वो उस हद तक कमजोर नहीं दिख रहा है कि वह अमेरिकी सेना के सामने हथियार डाल दे. 

खुद अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस की डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने कहा है कि ईरानी शासन कमजोर हुआ है, लेकिन खत्म नहीं हुआ है. अमेरिकी इंटेलिजेंस के अधिकारियों ने चेतावनी दी कि तेहरान के पास समय के साथ अपनी सैन्य ताकत को फिर से बनाने का इरादा और क्षमता दोनों हैं. एक्सपर्ट भी मानते हैं कि ऐसी 5 वजहें हैं जो बताती हैं कि ईरान के टॉप लीडर्स को मारने की अमेरिकी- इजराइली रणनीति उल्टी साबित हो सकती है.

1- नेताओं को मारने से व्यवस्था खत्म नहीं होती

ईरान में तमाम पदों पर बैठें नेताओं के नीचे एक संस्थागत परतें हैं. ऐसे पद पर बैठे नेताओं को मारने से वो व्यवस्था खत्म नहीं होती है. उस संस्था में नीचे बैठे लोगों को प्रमोट करके नया हेड बना दिया जाता है. जैसे सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मरने के बाद उनके बेटे मुजतबा को नया सुप्रीम लीडर बना दिया गया था, जबकि कथित तौर पर अली उन्हें अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाना चाहते थे. इससे पूरे शासन को गिराने की रणनीति कमजोर पड़ जाती है.

2- जनता शासन के खिलाफ नहीं बल्कि बाहरी दुश्मन के खिलाफ एक हो जाती है

जंग से पहले ईरान में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और असंतोष बढ़ रहा था. लेकिन जब बाहरी ताकतें जैसे अमेरिका और इज़राइल हमले करती हैं, तो अक्सर जनता राष्ट्रीय भावना के कारण अपने ही शासन के साथ खड़ी हो जाती है. इससे वह राजनीतिक बदलाव रुक सकता है जो पहले संभव लग रहा था.

3- और ज्यादा कट्टर और लड़ाकू नेता ऊपर आ सकते हैं

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के हमलों से लोकतांत्रिक या उदार नेता नहीं उभरते. इसके बजाय वे लोग ऊपर आते हैं जो ज्यादा कठोर और प्रतिरोध की भावना वाले होते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने वरिष्ठों और साथियों को युद्ध में मारा जाते देखा होता है. इससे जंग और दशकों की कड़वाहट और ज्यादा तीखा हो सकती है.

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4- हमास, हिजबुल्लाह और इतिहास से सीख

इतिहास इसलिए पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि वह वर्तमान के लिए सीख है. इजरायल पहले भी हमास के नेता शेख अहमद यासीन और हिजबुल्लाह के प्रमुख हसन नसरल्लाह जैसे नेताओं को मार चुका है. लेकिन इन संगठनों ने समय के साथ खुद को फिर से संगठित कर लिया और संघर्ष जारी रखा. इससे पता चलता है कि केवल नेताओं को खत्म करना किसी आंदोलन या संगठन को पूरी तरह समाप्त नहीं करता.

5- ईरान अंदर से अस्थिर होकर दूसरी तरह की जंग और बढ़ा सकता है

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार इस रणनीति का परिणाम यह हो सकता है कि ईरान अंदर से अस्थिर तो हो जाए, लेकिन पूरी तरह कमजोर न हो. ऐसी स्थिति में वह साइबर हमलों, प्रॉक्सी समूहों और सीमा के बाहर हिंसक गतिविधियों के जरिए और ज्यादा आक्रामक प्रतिक्रिया दे सकता है. इससे क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा खतरे बढ़ सकते हैं.

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