नेपाल के रसुवा जिले में आई विनाशकारी बाढ़ में लगभग 160 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 750 से ज्यादा लोग लापता हैं. भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ के बाद हालात गंभीर बने हुए हैं. इस भयावह तबाही के बाद वैज्ञानिकों ने एक और संभावित आपदा की चेतावनी जारी की है. काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) का कहना है कि नेपाल-चीन सीमा के ऊपरी हिस्से में अब भी एक पानी का अवरोध (वाटर ब्लॉकेज) मौजूद है, जो टूटने पर एक नया जलसैलाब पैदा कर सकता है. यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब हालिया बाढ़ ने व्यापक तबाही मचाई है और कई बस्तियों, सड़कों तथा बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया है. वैज्ञानिक अब इस आपदा के कारणों की जांच कर रहे हैं और साथ ही यह भी पता लगाने में जुटे हैं कि क्या आने वाले दिनों में खतरा और बढ़ सकता है.
हिमालयी क्षेत्र की प्रमुख संस्था ने जारी की चेतावनी
यह चेतावनी हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण, ग्लेशियर, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं पर शोध करने वाली प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने जारी की है. काठमांडू स्थित यह संस्था 1983 से हिंदूकुश-हिमालयी क्षेत्र के आठ देशों भारत, नेपाल, भूटान, चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और अफगानिस्तान के साथ काम करती है.

Nepal Flood : नेपाल में बाढ़ का दृश्य
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अचानक आई थी विनाशकारी बाढ़
ICIMOD के अनुसार 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ ने भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में भारी तबाही मचाई. कुछ ही मिनटों में पानी का स्तर तेजी से बढ़ गया और बड़ी मात्रा में पानी, तलछट तथा विशाल चट्टानें नदियों के साथ नीचे की ओर बहने लगीं. इस घटना के बाद वैज्ञानिक और अधिकारी लगातार यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर यह तबाही कैसे हुई और क्या आगे भी ऐसा खतरा बना हुआ है?
दूसरी बाढ़ की आशंका सबसे बड़ी चिंता
ICIMOD में जलवायु और पर्यावरणीय जोखिम विभाग के प्रमुख कियांगगोंग झांग ने कहा, 'पिछले वर्ष रसुवा बाढ़ से प्रभावित हुआ यही इलाका फिर खतरे में है. लेंधे खोला क्षेत्र में बर्फ के बड़े हिस्से के टूटकर गिरने (आइस एवलांच) को संभावित कारण माना जा रहा है, लेकिन इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है. नेपाल-चीन सीमा के ऊपरी हिस्से में अब भी एक अवरोध मौजूद है और दूसरी बाढ़ की आशंका बनी हुई है.'
पिछले साल भी इसी इलाके में आई थी बड़ी आपदा
वैज्ञानिकों ने बताया कि जिस नदी बेसिन क्षेत्र में 2024 में गंभीर बाढ़ आई थी, वही क्षेत्र दोबारा खतरे के केंद्र में आ गया है. प्रारंभिक आकलन के अनुसार, हालिया बाढ़ ने एक बार फिर बुनियादी ढांचे और जल विज्ञान निगरानी प्रणालियों को नुकसान पहुंचाया है. साथ ही नदी घाटी में बसे समुदायों और बस्तियों पर भी संकट गहरा गया है.
कुछ मिनटों में बढ़ गया कई मीटर पानी
रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 9 बजे भोटे कोशी बेसिन में जलस्तर तेजी से बढ़ना शुरू हुआ. बाढ़ का पानी भोटे कोशी नदी से होता हुआ त्रिशूली नदी तंत्र तक पहुंच गया. इसके चलते नुवाकोट और धादिंग जिलों में भी निगरानी बढ़ा दी गई है. हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों ने इस घटना की भयावहता को स्पष्ट किया है. वैज्ञानिकों के अनुसार इस बाढ़ की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गल्छी में त्रिशूली नदी का जलस्तर सिर्फ 30 मिनट में करीब 9 मीटर बढ़ गया, जबकि मालेखु में 7 मीटर तक वृद्धि दर्ज की गई.
वैज्ञानिक कई संभावित कारणों की जांच में जुटे
वैज्ञानिक इस आपदा के पीछे कई संभावित कारणों की जांच कर रहे हैं. पहली संभावना यह है कि कि पहाड़ों में बर्फ और चट्टानों का बहुत बड़ा हिस्सा टूटकर नदी में गिरा होगा, जिससे अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर बहा. प्रारंभिक वीडियो फुटेज के आधार पर माना जा रहा है कि बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा भोटे कोशी नदी की सहायक धारा लेंधे खोला में गिरा. ऐसी घटना नदी में मौजूद पानी को विस्थापित कर सकती है और बड़े पैमाने पर चट्टानों, तलछट और मलबे के साथ तेज बहाव पैदा कर सकती है. दूसरी संभावना यह है कि मलबे ने नदी के ऊपरी हिस्से में एक अस्थायी बांध बना दिया हो. इस अवरोध के पीछे पानी जमा हो रहा है. यदि यह प्राकृतिक बांध टूट गया तो दूसरी और अधिक खतरनाक बाढ़ आ सकती है.
भूकंपीय संकेतों की भी जांच
वैज्ञानिक आपदा के दौरान दर्ज हुए असामान्य भूकंपीय संकेतों का भी विश्लेषण कर रहे हैं. प्रारंभिक जांच में जिलोंग और झांगमु क्षेत्र के मॉनिटरिंग स्टेशनों ने असामान्य गतिविधियां दर्ज की थीं. प्रभावित क्षेत्र से जिलोंग की दूरी करीब 12 किलोमीटर बताई गई है. शोधकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ये संकेत हिमखंड ध्वंस, बड़े भूस्खलन या किसी अन्य भूवैज्ञानिक घटना से जुड़े थे. हालांकि ICIMOD ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल इन संकेतों और बाढ़ के बीच सीधे संबंध की पुष्टि नहीं हुई है.
बढ़ते क्रायोस्फियर खतरों पर जताई चिंता
ICIMOD के डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एक्सपर्ट सस्वत सान्याल ने कहा, "लेंधे खोला में 14 महीनों के भीतर दूसरी बार बाढ़ आई है. संभव है कि इस बार इसका कारण आइस एवलांच रहा हो, जिसने नदी को अवरुद्ध किया और बाद में अचानक पानी छोड़ा. हालांकि इसकी पुष्टि अभी बाकी है. यह एक ऐसी श्रृंखलाबद्ध आपदा है जिसमें क्रायोस्फियर से जुड़ी घटना कुछ ही घंटों में मानव बस्तियों को प्रभावित करने वाली बाढ़ में बदल जाती है." वहीं ICIMOD के वरिष्ठ क्रायोस्फियर विशेषज्ञ मोहम्मद फारूक आजम ने कहा, "क्रायोस्फियर से जुड़े खतरों की बढ़ती आवृत्ति अब पहले से कहीं अधिक दिखाई दे रही है. बदलाव इतनी तेजी से हो रहे हैं कि वर्तमान प्रयास पर्याप्त नहीं पड़ रहे हैं. यह आपदा क्षेत्रीय स्तर पर साझा और समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता को दर्शाती है."
नेपाल के साथ एकजुटता का संदेश
ICIMOD के महानिदेशक पेमा ग्याम्त्शो ने कहा, "इस दुखद आपदा से हम बेहद व्यथित हैं. यह घटना अचानक और अप्रत्याशित रूप से सामने आई. हम इस कठिन समय में नेपाल की जनता और सरकार के साथ एकजुटता से खड़े हैं. हमारी संवेदनाएं पीड़ितों, उनके परिवारों और सभी प्रभावित लोगों के साथ हैं."
फिलहाल खतरा पूरी तरह टला नहीं
वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों, बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट और पर्वतीय ढलानों को प्रभावित कर रहा है, लेकिन इस विशेष घटना में उसकी भूमिका क्या रही, इसका निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी. हाइड्रोलॉजिकल, भूकंपीय और सैटेलाइट आंकड़ों का विश्लेषण जारी है. फिलहाल सबसे बड़ी चिंता ऊपरी क्षेत्र में मौजूद संदिग्ध अवरोध की स्थिरता को लेकर है. भोटे कोशी और त्रिशूली नदी घाटियों के किनारे रहने वाले लोगों के लिए खतरा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. ICIMOD की दूसरी संभावित बाढ़ की चेतावनी के बाद निगरानी और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की प्रक्रिया और तेज कर दी गई है.
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