विज्ञापन

NATO को टेंशन नहीं, चीन कर रहा चिल… होर्मुज पर ट्रंप की बढ़ती मुश्किल

ईरान ने रणनीतिक रूप से होर्मुज पर अमेरिकी दबदबे को चुनौती दी है. अब ट्रंप के सामने असली संकट यह है कि होमुर्ज के मुद्दे पर उसे अन्य देशों की मदद की जरूरत है. लेकिन ना तो नाटो और ना ही चीन अमेरिका को भाव दे रहे हैं. 

NATO को टेंशन नहीं, चीन कर रहा चिल… होर्मुज पर ट्रंप की बढ़ती मुश्किल
  • अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर हमला करने से पहले NATO और ब्रिटेन से कोई सलाह नहीं ली थी.
  • ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अवरुद्ध कर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर संकट पैदा किया है.
  • ट्रंप अब अंतरराष्ट्रीय समर्थन के लिए कई देशों को बुला रहे हैं, जिनकी पहले कोई परवाह नहीं थी.
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में लगातार बिगड़ते हालात के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को ऐसे मोड़ पर पाते हैं, जहां न NATO उनके साथ खड़ा दिख रहा है और न ही चीन किसी भी तरह की सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है. अमेरिका ने ईरान पर हमला करने से पहले न तो NATO से सलाह‑मशविरा किया, न ही अपने सबसे करीबी साझेदार ब्रिटेन से. और अब ये रणनीति उन्हीं पर उलटी पड़ती दिख रही है.

वेनेजुएला से ईरान तक: ट्रंप का 'ओवरकॉन्फिडेंस' बना मुसीबत?

वेनेजुएला में तेज सफलता ने वॉशिंगटन को विश्वास दिला दिया था कि ईरान में भी अमेरिका-इजरायल के साथ कुछ ही दिनों में अपनी शर्तें मनवा लेगा. सोचा गया कि ईरान जल्दी झुक जाएगा और चीन‑रूस को भी अमेरिकी शक्ति का संकेत मिल जाएगा.

लेकिन ईरान ने अमेरिकी रणनीति के सभी अनुमान ध्वस्त कर दिए. उसने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लगभग अवरुद्ध कर दिया, जिससे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर संकट मंडराने लगा. दुनिया का 20% तेल इसी मार्ग से गुजरता है, और बंदी की आशंका ने कीमतों को 102–106 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है. विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह हालात ना सुधरे तो 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है. इसका नतीजा यह हुआ कि अब ट्रंप को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन चाहिए. ऐसे में ट्रंप अब कई देशों से सपोर्ट की उम्मीद कर रहे हैं, जिसकी उन्होंने युद्ध से पहले परवाह नहीं की.

यह भी पढ़ें- US-Iran War: अमेरिका ने चाबहार में 'मुक्त व्यापार क्षेत्र' के पास सैन्य ठिकानों पर किया हमला

अब क्यों सबको बुला रहे ट्रंप?

युद्ध से पहले, ट्रंप ने किसी सहयोगी को भरोसे में नहीं लिया. लेकिन जैसे ही ईरान ने होर्मुज को झटका दिया, ट्रंप ने एक‑एक देश को पुकारना शुरू कर दिया. फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन… और हैरानी की बात-चीन भी. वही चीन जिसे घेरने के लिए ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ लगाए, सप्लाई चेन पुनर्गठन की कोशिश की, और वेनेजुएला‑पनामा‑ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्रों में बीजिंग के प्रभाव को चुनौती दी.

फिर भी ट्रंप कह रहे हैं कि 'चीन को मदद करनी चाहिए क्योंकि उसका तेल 90% इसी रूट से आता है.'  

अमेरिकी सेना ने भी कहा- यह मुमकिन नहीं

ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी नौसेना होर्मुज़ में सभी फंसे जहाज़ों को एस्कॉर्ट करेगी. लेकिन जल्द ही अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने कहा, 'अभी यह संभव नहीं.' यानी ट्रंप ने जो राजनीतिक घोषणा की थी, वो सेना की वास्तविक क्षमता से मेल नहीं खाती. इससे उनका दबाव और बढ़ गया, और उन्होंने 'टीम वर्क' का नैरेटिव आगे बढ़ाया.

तुर्की ने साफ मना किया, 'हम जंग में नहीं कूदेंगे'

NATO के सदस्य तुर्की ने तो ट्रंप को सीधे‑सीधे झटका दे दिया.राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने कहा, 'तुर्की अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क है. रमज़ान के दौरान किसी जंग में शामिल नहीं होगा. ईरान से आए मिसाइल खतरे के बाद देश अपनी सीमाएं सुरक्षित करने में जुटा है.' ये तीसरी बार है जब ईरान की मिसाइल तुर्की क्षेत्र में घुसी और NATO बलों ने उसे नष्ट किया. लेकिन इसके बावजूद तुर्की ने साफ कर दिया कि वह अमेरिका की ईरान‑विरोधी लड़ाई का हिस्सा नहीं बनेगा.

बाकी NATO देशों ने तो अभी तक ट्रंप की 'होर्मुज़ दावत' पर औपचारिक प्रतिक्रिया देना भी जरूरी नहीं समझा.

Latest and Breaking News on NDTV

यह भी पढ़ें- 'भविष्य बहुत बुरा होगा', होर्मुज संकट पर ट्रंप की NATO को दो टूक

चीन: सबसे शांत और सबसे रणनीतिक खिलाड़ी

चीन इस पूरे तनाव में सबसे 'चिल मोड' में दिख रहा है.

क्यों?

वह सीधे युद्ध में कूदकर अमेरिका के एजेंडे को मजबूत नहीं करना चाहता. ईरान उसका बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता है, उससे रिश्ते खराब करना उसे नुकसान पहुंचा सकता है. बीजिंग जानता है कि अमेरिकी दवाब में झुकना उसे भू‑राजनीतिक रूप से कमजोर दिखाएगा. वह इंतजार कर रहा है कि अमेरिका कब अंतरराष्ट्रीय मंच पर अकेला पड़ जाए. ट्रंप बार‑बार चीन को बुला रहे हैं, लेकिन बीजिंग न जवाब दे रहा है और न उत्सुकता दिखा रहा है. यही कारण है कि ट्रंप के लिए यह सबसे बड़ी परेशानी बन गई है.

ट्रंप की NATO को दो टूक 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने NATO सहयोगी देशों को सख्त संदेश देते हुए कहा है कि अगर सदस्य देश स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा में सहयोग नहीं करते तो गठबंधन का भविष्य 'बहुत बुरा' हो सकता है. ट्रंप ने स्पष्ट किया कि होर्मुज से लाभ उठाने वाले देशों की जिम्मेदारी है कि वे क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने में सक्रिय योगदान दें.

Latest and Breaking News on NDTV

यह भी पढ़ें- ईरान से युद्ध के बीच वेस्ट बैंक में बसे फिलिस्तीनियों पर क्यों कहर बरसा रहा इजरायल? मौत के आंकड़े दे रहे गवाही

तो क्या अकेले पड़ गए ट्रंप? 

स्थिति साफ है: अमेरिका युद्ध में उतरा, लेकिन सहयोगियों को साथ नहीं लिया. अब जब होर्मुज बंद पड़ा है, तो मदद की जरूरत पड़ रही है. ऐसे में NATO चुप है. जबकि NATO के ही एक देश तुर्की ने साफ मना कर दिया है. चीन शांत बैठा है. अमेरिकी सेना भी ट्रंप के दावों से सहमत नहीं हैं. 

ईरान ने रणनीतिक रूप से होर्मुज पर अमेरिकी दबदबे को चुनौती दी है. अब ट्रंप के सामने असली संकट यह है होमुर्ज के मुद्दे पर उसे अन्य देशों की मदद की जरूरत है. लेकिन ना तो नाटो और ना ही चीन अमेरिका को भाव दे रहे हैं. 

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com