- इन 40 दिनों के दौरान सबसे दिलचस्प तस्वीर सामने आई वो यह कतई नहीं थी कि कौन किसके साथ खड़ा है.
- बल्कि असली कहानी तो यह है कि कौन इससे सबसे अधिक राहत महसूस कर रहा है. कोई खुल कर 'थैंक्यू' नहीं बोल रहा है.
- पर साइलेंट थैंक्यू बोलने वालों में एशियाई, यूरोपीय, सहयोगी, विरोधी सभी तरह के देश शामिल हैं.
बीते 40 दिनों से चल रहे अमेरिका-ईरान टकराव के बीच सीजफायर की खबर के बाद यह तो साफ महसूस होता है कि इससे वर्ल्ड ऑर्डर में एक बड़ा बदलाव आया है क्योंकि जिस ईरान को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी से अमेरिका और इजरायल मिल कर पूरी तरह झुकाने चले थे, उसने अमेरिकी ताकत की पोल खोल कर रख दी. 28 फरवरी को अयातुल्लाह अली खामेनेई को मारने के साथ इस युद्ध की शुरुआत शक्तिशाली हमले के रूप में भले ही हुई और दिखी भी, पर ईरान ने सत्ता हस्तांतरण से दिखाया कि वो इस हमले से हिला जरूर पर पूरी तरह विचलित नहीं हुआ. फिर लगातार हमलों के बावजूद आत्मसमर्पण नहीं करने और अमेरिका के दो-दो बार सीजफायर की एकतरफा घोषणा करने के बाद तो यह एक तरह से ईरान की मजबूती को ही दर्शाता है.
इजरायली शहरों, खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों और सऊदी अरब, यूएई , कुवैत और बहरीन में एनर्जी के अहम ढांचों को निशाना बना कर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों ने ईरान की क्षमता और इरादे दोनों के संकेत दिए और साथ ही यह भी बताया कि अमेरिका और इजरायल भले ही युद्ध भूमि पर मजबूत दिखते हों लेकिन ईरान जैसे देश भी उनकी कमर को निशाना बनाने में कामयाब हो गया जो मिलिट्री ताकत के तौर पर पहचान नहीं रखता है.
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तो इन 40 दिनों में वर्ल्ड ऑर्डर को लेकर जो बदलाव देखने को मिला वो कमोबेश यह है कि जहां अमेरिका और इजरायल जैसे ताकतवर देश मिलकर भी ईरान जैसे बतौर मिलिट्री ताकत की पहचान नहीं रखने वाले ईरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर नहीं कर सके. वहीं अमेरिका का ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों ने साथ दिया तो ईरान, चीन और रूस के साथ एक धुरी पर दिखा. ईरान के हमले करने के बावजूद अरब देशों ने उस पर सीधा हमला नहीं किया और न ही खुल कर अमेरिका-इजरायल का साथ दिया. मतलब, वो इन 40 दिनों के दरम्यान कूटनीतिक संतुलन बनाते दिखे.
'दुश्मन देश' को ट्रंप का धन्यवाद
डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के संघर्ष-विराम में मध्यस्थता करने में अहम भूमिका निभाने के लिए चीन और उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग का शुक्रिया अदा किया. भले ही ट्रंप ने इस समझौते को अमेरिका के लिए एक मुकम्मल जीत बताया पर ईरान को बातचीत की मेज तक लाने में चीन का प्रभाव निर्णायक रहा. ऐसे में जीत किसकी हुई?
इन 40 दिनों के दौरान जो सबसे दिलचस्प तस्वीर सामने आई वो यह कतई नहीं थी कि कौन किसके साथ खड़ा है बल्कि असली कहानी तो यह है कि कौन इससे सबसे अधिक राहत महसूस कर रहा है. कोई खुल कर थैंक्यू नहीं बोल रहा पर इस सीजफायर के फायदे उठाने वाले देशों की लंबी लिस्ट है. और यह साइलेंट थैंक्यू कूटनीति के शब्दों से नहीं बल्कि उन देशों में हो रही प्रतिक्रियाओं में दिख रही है. ये साइलेंट थैंक्यू बोलने वालों में एशियाई, यूरोपीय, सहयोगी, विरोधी सभी तरह के देश शामिल हैं.
सांस फूलने से राहत की सांस तक
28 फरवरी को जब ये युद्ध शुरू हुआ था तब से दुनिया भर के देशों की इंडस्ट्री की लागत बढ़ती गई. इसने सीधे तौर पर आम जनता को प्रभावित किया या नहीं पर सरकारों के राजस्व पर बड़ी चोट पहुंची. सबसे अधिक असर एशियाई देशों पर पड़ा. इनमें भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे वो देश हैं जिनकी खाड़ी के तेल पर भारी निर्भरता है. यहां महंगाई बढ़ी, करेंसी पर दबाव आया, उद्योगों पर लागत बढ़ी और शेयर मार्केट तेजी से नीचे आए. इन देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया. इसी वजह से एशियाई देशों ने तेजी से अपने विकल्प तलाशने शुरू किए.
हर लागत तेजी से बढ़ते जा रहे थे इसी बीच मंगलवार को सीजफायर और हॉर्मुज खुलने के एलान से इन सभी देशों को राहत मिली. तेल की कीमतों में गिरावट आई और सप्लाई चेन को लेकर डर कम हुआ. हालांकि अभी हॉर्मुज से चलने और इन देशों तक रसद, तेल पहुंचने में कुछ वक्त जरूर लगेगा पर यह निश्चिंतता आई कि बाजार में स्थिरता लौटेगी. यानी सभी ने राहत महसूस की, भले ही इन्होंने थैंक्यू नहीं कहा पर उनके हर कदम में राहत साफ दिखी.
ये भी पढ़ें: डोनाल्ड ट्रंप के लिए कितनी राहत लेकर आया है युद्ध विराम समझौता, कितने दबाव में थे अमेरिकी राष्ट्रपति
यूरोपीय देश से आया साइलेंट थैंक्यू
यूरोपीय देश ऊर्जा के संकट से पहले ही जूझ रहे थे, मिडिल ईस्ट में तनाव ने उनके लिए डबल झटके का काम किया. तेल और गैस की कीमतें और बढ़ीं तो वहां की इंडस्ट्री पर भारी असर पड़ना शुरू हो गया था. फरवरी के अंत से सीजफायर तक PNG की कीमतें 60% तक बढ़ चुकी थीं. तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो आम जीवन के अन्य वस्तुओं के दाम कैसे बढ़ते हैं यह तो सभी जानते हैं. तो इससे यूरोप में आर्थिक मंदी के और गहराने के आसार साफ झलक रहे थे. लेकिन सीजफायर ने यूरोप की अटकी सांसे लौटा दीं और यह कहें कि ईरान के साथ अमेरिका का यह डील यूरोप के लिए राहत पैकेज से कम नहीं है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

Photo Credit: ANI
शेयर बाजार का धमाकेदार थैंक्यू
मंगलवार देर रात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान के बाद कि उन्होंने ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले हमलों को दो हफ्ते के लिए टालने पर सहमति दे दी है, दुनिया भर के शेयर बाजारों में तेजी आई और तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई. पूरी दुनिया के शेयर मार्केट में तेजी देखी गई. जापान का निकेई 225 करीब 4.5 प्रतिशत चढ़ गया, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी लगभग 5.5 प्रतिशत उछल गया.
तो भारतीय शेयर बाजारों में भी रौनक लौट आई. शुरुआती कारोबार में ही सेंसेक्स 2700 अंकों से अधिक चढ़ गया. वहीं निफ्टी 800 अंक बढ़कर 23,900 के पास पहुंच गया. यह खबर लिखे जाने तक सेंसेक्स में करीब 3.80% की उछाल देखने को मिली है, जो 2837 अंकों की बढ़त के साथ 77,454 पर तो निफ्टी भी 3.64% की तेजी और 841 अंकों की बढ़त के साथ 23,965 पर बना हुआ है.
संकेत स्पष्ट है कि शेयर बाजार अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर की डील से खुश है और वो थैंक्यू शब्दों में नहीं बल्कि पैसे के फ्लो में दिखा रहा है.
अब यूरोपीय स्टॉक मार्केट में जबरदस्त तेजी के साथ शुरुआत होने की उम्मीद है. यूके का एफटीएसई 100 इंडेक्स 3% की तेजी के साथ खुलने की उम्मीद है, जबकि जर्मनी का डीएएक्स 5%, फ्रांस का सीएसी-40 4.5% और इटली के एफटीएसई एमआईबी के 5.3% ऊपर खुलने की संभावना है.
अमेरिकी सहयोगियों से मिला 'साइलेंट थैंक्यू'
मिडिल ईस्ट में अमेरिका के कई सहयोगी देश हैं, जो सुरक्षा के लिए उस पर निर्भर हैं. लेकिन वो भी नहीं चाहते थे कि हालात पूरी तरह बेकाबू हो जाएं. ऐसे में ट्रंप के सीजफायर के फैसले ने उन्हें दो फायदे दिए हैं. पहला ये की उनकी सुरक्षा का भरोसा अमेरिका में बढ़ा तो दूसरा यह कि फिलहाल आर्थिक संकट टल गया है. तो उन्होंने खुल कर अब तक बयान भले ही नहीं दिया हो पर अंदर ही अंदर राहत जरूर महसूस कर रहे हैं.

Photo Credit: AFP
सबसे बड़े लाभार्थी कौन?
इस सीजफायर से सबसे अधिक लाभ उठाने वाले देशों में आर्थिक रूप से वो कमजोर देश शामिल हैं जिनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तेल के आयात पर निर्भर हैं और चूंकि वो विकासशील देश हैं तो वहां तेल के भंडारण के बुनियादी ढांचे भी पर्याप्त नहीं हैं. यानी अगर ये युद्ध कुछ और खिंचता तो उनकी अर्थव्यवस्था के पूरी तरह चरमराने की पूरी संभावना थी. उनके बजट बिगड़ जाते हैं. वहां महंगाई तेजी से बढ़ती और इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ता. ऐसे में यह सीजफायर और हॉर्मुज के खुलने की खबर से तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट ने उन्हें सबसे अधिक राहत दी है. भले ही वैश्विक मंचों पर इन देशों की आवाजें कम ही सुनाई दें पर आज उनके देश के हुक्मरान और वहां की जनता दोनों थैंक्यू जरूर बोल रहे होंगे.
रूस जैसे खिलाड़ी को मिला दोतरफा फायदा
अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध से उपजे संकट में कुछ देश ऐसे भी हैं जिन्हें दो-तरफा फायदा मिला है. इस युद्ध की शुरुआत में तेल संकट से निपटने के लिए ट्रंप ने रूसी तेल की खरीद से एक महीने के लिए प्रतिबंध हटा लिया था. इसकी वजह से कई देशों ने रूस से तेल खरीदे. रूस ने भी उस दौरान इसका लाभ उठाया और कीमतें बढ़ा दीं और कई वर्षों के बाद अपने कच्चे तेल पर प्रीमियम हासिल किया. उसे तेल के निर्यात से पहले से कहीं अधिक कमाई हुई. रूस पर ईरान को टेक्नोलॉजी देने का आरोप भी लगा लेकिन इस दौरान वो खुल कर सामने नहीं आया.
इसके अलावा रूस और चीन ने इस संकट का इस्तेमाल व्यापार के लिए चीनी युआन को और बढ़ावा देने के लिए भी किया. ईरान ने तो हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की शर्त यह रखने पर भी विचार किया है कि कार्गो का व्यापार युआन में ही हो. यह कदम पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों को दरकिनार करने के रूस के लक्ष्य के मुताबिक है. यानी ऐसे कई देश भी थे जो खुलकर किसी एक के पक्ष में नहीं आए, लेकिन हर स्थिति में अपना फायदा निकालते रहे.
कुल मिलाकर 'थैंक्यू' शब्द सुनाई तो नहीं दिया, पर उसकी गूंज हर जगह महसूस हुई.
ये भी पढ़ें: ईरान संग युद्ध से अमेरिका के बजाय रूस और चीन को कैसे हुआ फायदा?
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