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डोनाल्ड ट्रंप के लिए कितनी राहत लेकर आया है युद्ध विराम समझौता, कितने दबाव में थे अमेरिकी राष्ट्रपति

अमेरिका-इजरायल और ईरान दो हफ्ते के युद्ध विराम के लिए सहमत हो गए हैं. समझौते को पुख्ता करने के लिए अमेरिका और ईरान पाकिस्तान में बातचीत करेंगे. यह खबर दुनिया के लिए राहत लेकर आई. लेकिन यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी कम राहत वाली खबर नहीं है.

डोनाल्ड ट्रंप के लिए कितनी राहत लेकर आया है युद्ध विराम समझौता, कितने दबाव में थे अमेरिकी राष्ट्रपति
  • अमेरिका और ईरान ने दो सप्ताह के युद्ध विराम के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में सहमति बनाई है.
  • इस समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य का मार्ग फिर से खुलने की संभावना बन गई है.
  • राष्ट्रपति ट्रंप पर घरेलू आर्थिक दबाव और चुनावी चिंता के चलते युद्ध विराम समझौता हुआ है.
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नई दिल्ली:

अमेरिका और ईरान दो हफ्ते युद्ध रोकने के लिए सहमत हो गए हैं. इस युद्ध विराम पर इजरायल भी सहमत है. युद्ध रोकने के लिए पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने कहा है कि 10 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि इस्लामाबाद में मिलेंगे. इसके बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने का रास्ता साफ हो गया है. इस युद्ध विराम समझौते को दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत बता रहे हैं. यह  युद्ध विराम समझौता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से दी गई 48 घंटे की समय सीमा खत्म होने से ठीक पहले हुआ. ऐसे में यह समझौता राष्ट्रपति ट्रंप के लिए भी राहत लेकर आया है. वो इस युद्ध को लेकर चौतरफा आलोचनाओं का सामना कर रहे थे. 

डोनाल्ड ट्रंप के लिए कितना बड़ा संकट था होर्मुज जलडमरूमध्य

28 फरवरी से शुरू हुए इस युद्ध का प्रमुख बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य था. इस समुद्री रास्ते को ईरान ने बंद कर दिया था. इससे दुनिया के एक बड़े हिस्से को तेल की आपूर्ती रुक गई थी. राष्ट्रपति ट्रंप इस रास्ते को खुलवाने के लिए ही ईरान को धमकी दे रहे थे. लेकिन ईरान उनकी धमकी की परवाह नहीं कर रहा था. ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाए बिना युद्ध से निकलना डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका के लिए हार होती. इसलिए समझौते में ईरान जब होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने के लिए राजी हो गया तो ट्रंप ने इस समझौते को मानने में ही भलाई समझी.   

दरअसल ट्रंप तीन तरफा दुविधा में फंसे हुए थे.पहला यह कि वो 'अमेरिका फर्स्ट' का वादा कर चुनाव जीते हैं, इसमें उन्होंने विदेशी युद्ध में न फंसने और जारी युद्धों को खत्म करने का वादा किया था, दूसरी तरफ युद्ध की वजह से अमेरिका को हो रहे भारी आर्थिक नुकसान और घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़े रहे दवाब की चिंता थी तो तीसरी तरफ वो इस युद्ध में बड़ी जीत हासिल करना चाहते थे. इस युद्ध में बड़ी जीत हासिल करने की ट्रंप की इच्छा पूरी नहीं हुई. ईरान में न तो सत्ता परिवर्तन हुआ और न ही ईरान झुका. 

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घरेलू राजनीति के दबाव में आए डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिका यह युद्ध ऐसे समय लड़ रहा था, जब ईसी साल वहां मिड टर्म इलेक्शन होना है. इस चुनाव ने भी ट्रंप के लिए दबाव का काम किया. अमेरिका में हो रहे चुनाव पूर्व सर्वे में राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता में लगातार गिरावट आ रही है. अमेरिकी लोग भी इस युद्ध के समर्थन में नहीं हैं. सर्वे के मुताबिक केवल 25 फीसदी अमेरिकी ही इस युद्ध के समर्थन में हैं. अमेरिका में बढ़ती पेट्रोल कीमतें और आर्थिक दबाव भी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए चिंता का सबब बने हुए थे. 

अमेरिका को नहीं मिला सहयोगियों का साथ

युद्ध शुरू होने के अगले ही दिन ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया. उसके नौसैनिकों ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश कर रहे कुछ जहाजों को निशाना बनाया. इसके बाद से ही डोनाल्ड ट्रंप ने जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और नैटो के सदस्य देशों से अपने युद्ध पोत होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए भेजने की अपील की. यहां तक कि उन्होंने इसके लिए चीन तक से मदद मांग ली. लेकिन कोई भी देश इसके लिए सहमत नहीं हुआ. इससे ट्रंप काफी आहत हुए. उन्होंने नैटो को कागजी शेर और अवसरवादी तक बता डाला. दरअसल ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति पद संभालने के बाद से ही यूरोप के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं चल रहे हैं. वो यूरोप के नेताओं की आलोचलना करते रहे हैं. इसके साथ ही वो ग्रीनलैंड पर कब्जा भी करना चाहते हैं. उनकी इस सोच से यूरोप और नैटो के सदस्य देश खुश नहीं हैं. ट्रंप ने यह बात अभी मंगलवार को भी कही. उन्होंने कहा,''यह सब शुरू हुआ, अगर आप सच जानना चाहते हैं तो ग्रीनलैंड से. हम ग्रीनलैंड चाहते हैं. वे इसे हमें देना नहीं चाहते. और मैंने कहा, 'अलविदा'."  

खाड़ी के देशों ने भी पीछे खींचे कदम

राष्ट्रपति ट्रंप ने यूरोप, नैटो और एशिया में अपने साझीदार देशों की आलोचना तो की लेकिन खाड़ी के देशों सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर और संयुक्त अरब अमीरात की तारीफ भी की, जिन्होंने उनका समर्थन किया.  खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के ये वो देश हैं, जिन पर ईरान ने हजारों ड्रोन और मिसाइलें दागी हैं. ईरान ने इन देशों के ऊर्जा प्रतिष्ठानों को भारी नुकसान पहुंचाया. ईरान ने युद्ध के शुरुआत में ही कह दिया था कि वो इस क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा. इसके साथ ही उसने हवाई अड्डे, होटल, रिहायशी इलाकों जैसे नागरिक ठिकानों पर भी हमले किए. इससे अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. इसके बाद भी खाड़ी के ये देश ईरान के खिलाफ युद्ध लड़ने को तैयार नहीं हुए. हालांकि सऊदी अरब जैसे कुछ देशों ने ईरान पर जवाबी हमले की बात की, लेकिन यह जुबानी जमाखर्च से अधिक कुछ नहीं था. ये देश ईरान के खिलाफ युद्ध में नहीं उतरे. इसका एक कारण यह था कि उनकी सैन्य ताकत ईरान के सामने नगण्य थी और दूसरी यह कि अमेरिका ने इन देशों की सुरक्षा गारंटी ले रखी थी. लेकिन वह उनकी सुरक्षा कर पाने में नाकाम रहा. इस वजह से अमेरिका पर खाड़ी के देशों से भी इस युद्ध को खत्म करवाने का दबाव था. क्योंकि खाड़ी के देशों को इस युद्ध में भारी नुकसान उठाना पड़ा है.

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